Friday, April 22, 2016

क्या अब हमे नए मंदिर बनाने की जरूरत है ?

उत्तराखंड के ये 'चीफ जस्टिस के. एम. जोसफ' ने कल उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन को लेकर जो निर्णय दिया है उस पर मुझे कुछ नहीं कहना है | पिछले कई दशकों से न्यायलय और वहां कुर्सी में बैठे न्यायाधीशों ने ऐसे ऐसे निर्णय दिए है की संविधान के दरवाजे में दीमक लगी दिखने लगी है |

मुझे कहना सिर्फ इस निर्णय को देते समय लेचीफ जस्टिस के.एम. जोसफ की राष्ट्रपति पर की गयी टिपण्णी पर है, जहाँ उन्होंने लोकतंत्रीय व्यवस्था के राष्ट्रपति को छिड़कते हुए, उन पर सामंतशाही व्यवस्था के 'राजा' का शब्द टांका है | वैसे यह न्यायधीश महोदय अपने केरला कार्यकाल में काफी नाम कमा चुके है और भ्रष्टाचार के मसलों में काफी उदारवादी रहे है किन यहाँ उनकी शब्दों के साथ उदारवादिता बिलकुल भी स्वागत योग्य नही है | खैर उनके निर्णय की समीक्षा तो सर्वोच्च न्यायलय में होगी लेकिन उनकी टिप्पणी यही दर्शाती है की न्यायाधीश जोसफ साहब गुस्सा में है |

दरअसल न्यायमूर्ति जी, सोनिया गाँधी के प्रभाव के पच्छम में चले जाने से आहात है | उनको अच्छी तरह पता है की भारत की सत्ता में में जो क्रिश्चियनिटी का असंवैधानिक कब्ज़ा था वह वेटिकन और भारत में चर्च की माता के सत्ता से बेदखल होने से कमजोर होता जारहा है और उनके चर्च को हिन्दुओं को ईसाई बनाने में भविष्य में प्रतिकार का सामना करना पड़ेगा |

न्यायाधीश के न्याय या अन्याय पर कुछ नहीं कहना है लेकिन यह जरूर कहना है की न्यायलय अब चर्च हो सकता है, मस्जिद हो सकती है लेकिन मंदिर बिलकुल भी नहीं हो सकता है |
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Thursday, April 21, 2016

उत्तराखंड H.C.का "आँख मारकर "दिया गया फैसला !! - पीतांबर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो.न. - +919414657511.

कंही भी अगर कोई बात-विवाद का फैसला  "आँख मारकर "कहा या किया जाए तो उसके पीछे छिपा सत्य ये होता है कि बात कहने वाला या तो मज़ाक कर रहा है,या फिर वो जिसकी तरफ देखकर आँख मार रहा है , उससे वो मिला हुआ है !उस जज के ऐसा करने के कई कारण हो सकते हैं , जैसे एहसान तले दबे होना,मित्रता होना या फिर जज का उस जैसी प्रकृति का ही होना हो सकता है जिसके पक्ष में "आँख मारकर" फैसला सुनाया गया हो ! आजकल तो H.C.-S.C.का जज बनने हेतु किसी राजनितिक दल से जुड़ा होना आवश्य्क माना जाता है !और नेता लोग तो कई बार कह भी चुके हैं कि हम "राजनीतिज्ञ"हैं कोई "संत"के व्यवहार की हमसे अपेक्षा ना करे ! ऐसा हर नेता ने साबित भी कर दिया है अपने राजनितिक "कर्मों"से !
                तो क्या उत्तराखंड के ये जज साहिब जिन्होंने राष्ट्रपति शासन को हटाने का निर्णय आज सुनाया है , उनकी भी जांच नहीं होनी चाहिए ? क्या ये नहीं देखा जाना चाहिए की उन्होंने पिछले चुनावों में किस पार्टी को अपना मतदान किया ?क्या वो किसी आरक्षित श्रेणी से आते हैं ?जिस प्रकार से माननीय हरीश रावत जी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उस जज साहिब को धन्यवाद दिया है उस से तो यही शंका मन में उठ रही है कि वे विधायक नहीं खरीद पाए तो जज साहिब को "ऑब्लाइज"करके अपना काम करवा ले गए !कांग्रेस एवं सेकुलर नेता बड़े ही चालाक हैं खुद पर जब कोई आरोप लगता है तो वो कहते हैं कि जब तलक सुप्रीम-कोर्ट फैसला ना दे दे तब तलक हमें दोषी ना कहो लेकिन वो ही नेता जब भाजपा पर कोई छोटी अदालत या कोई छोटा अफसर भी आरोप लगा दे तो सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का त्यागपत्र मांगने लग जाते हैं ?क्यों ? 
                 आज कॉंग्रेसी मित्र बड़े ही नाच रहे हैं ! अपनी पीठ को खुद ही ठोक रहे हैं !तो क्या ये समझा जाए कि हाई-कोर्ट के एक निर्णय से कांग्रेस+सेकुलरनेताओं+मीडिया के सारे पाप धुल गए हैं ??तो क्या अब सोनिया,राहुल,या नीतीश जैसों में से किसी एक को देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए ??मुंगेरी लाल के हसीं सपने कभी सफल नहीं होंगे !मैंने तो कल ही एक ट्वीट में मोदी जी को लिखा था कि "आप अपने सिपाहियों की जांच करवाएं ,वो मोदी जी आप की तरह मेहनत नहीं कर रहे हैं" !यही बात आज सिद्द हो गयी है ! सरकार द्वारा निर्धारित सॉलिसिटर जनरल आदि ने उच्तम न्यायालय में म्हणत नहीं करी जिससे मोदी सरकार को ये "धक्का"सहना पड़ रहा है !
                    अंत में मैं तो यही कहूंगा की ये कांग्रेस और उनके "ज़मूरे"नासिर्फ हिन्दुओं के दुश्मन हैं बल्कि हिंदुस्तान के भी दुश्मन हैं ! ये लड़ाई लम्बी है ! षड्यंत्रों से भरी है ! ये एक महाभारत है जिसमे भारतवासी ही भारतवासियों के खिलाफ लड़ रहे हैं !दुश्मन तो हमारा फायदा बाद में उठाता है मित्रों !!समय आ गया है जब हमें अपनी आँखें और बुद्धि को खुला और चौकन्ना रखना है अन्यथा देश के साथ साथ हम भी बर्बाद हो जाएंगे !अब चुप नहीं रहना है !
जय-हिन्द !! जय भारत !! भारत माता की जय ! 
                  " 5TH PILLAR CORRUPTION KILLER " THE BLOG .


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मेरा मोबाईल नंबर ये है :- 09414657511. 01509-222768. धन्यवाद !!आपका प्रिय मित्र ,
पीताम्बर दत्त शर्मा,
हेल्प-लाईन-बिग-बाज़ार,सूरतगढ़ !!


Friday, April 15, 2016

"जिहाद" की सफलताएं नज़र आने लगी हैं !! -पीतांबर दत्त शर्मा मो. न. - +919414657511

लाहोर में आज सिख नहीं बचे हैं,काश्मीर में हिन्दू नहीं बचा है,मुल्तान और अफगानिस्तान में हिन्दू नहीं बचा है , ईरान में पारसी नहीं बचे हैं और सऊदी अरब में यहूदी नहीं बचे हैं !ये उस जिहाद की बड़ी सफलताएं हैं जिस पर पूरी दुनिया को तो सोचना ही चाहिए , लेकिन हिंदुस्तान को अपना अस्तित्व अगर बचाना है तो 'कमरकस कर "जिहाद के खिलाफ युद्ध छेड़ देना चाहिए अन्यथा परिणाम भुगतने हेतु हमें और हमारी आनेवाली पीढ़ियों को तैयार रहना चाहिए !
                  भारत ने अपने टुकड़े केवल इसीलिए होने दिए ताकि वो शान्ति से रह सके ! लेकिन आज हम देख रहे हैं कि केवल 10 - 15 आतंकवादी आकर हमारे सारे सिस्टम को फ़ैल कर जाते हैं हमें आतंक वादियों की संख्या से नहीं बल्कि हमें इसके मूल भाव से सीखना होगा !हम ये भी जानते हैं की वो हमारी गलियों,शहरों और हमारी सरकारों पर कब्ज़ा नहीं कर सकते !जिहादी आतंक हमारे गणतंत्र,व्यक्ति की जड़ों,उसके स्वतंत्र विचारों, बोलने की आज़ादी और महिलाओं के अधिकारों पर चोट करता है !
          इन दिनों मोलवियों द्वारा आतंकवाद के खिलाफ फतवे भी ज़ारी किये जा रहे हैं !जिसके खिलाफ isis ने भी कह दिया है कि खबरदार मोलवियों अगर फतवे दिए तो गले काट दिए जाएंगे !मोलवी और मुस्लिम प्रस्त मीडिया चुप !!एक बड़े ही पते की बात है कि आतंकवादी सिर्फ लोकतंत्र के सिस्टम से डरते हैं ! वो इसको नहीं तोड़ पाते !इसीलिए जिहाद की काट अगर कोई है तो वो लोकतंत्र ही है !
                  भारत को एक ऐसा कठोर कानून भी बनाना चाहिए जो मुस्लिम युवाओं को सम्बोधित करता हो ! ताकि कोई नवयुवक आतंकवादी संगठन में शामिल ना हो सके !भारत को भी fbi की तरह ऐसे स्टिंग ऑपरेशन करने चाहिए जिसमे आतंकवादी संगठनों का अत्याचार दिखाया गया हो !भारत के सभी धार्मिक संगठनों के आय-स्रोत सरकार को ज्ञात होने चाहिए और उसे कौन से नेता चला रहे हैं ये भी  चाहिए !भारत में समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए !सभी राजनेता मुस्लिम तुष्टिकरण से दूर रहें तो ही भारत का भला हो सकता है !
                     आज हर मुसलमान को ये सोचना चाहिए की वो अपने बच्चे को कौन से माहौल में रखना चाहता है ??उसे आतंकवाद से ग्रसित देश या इलाके पसंद हैं या फिर भारत जैसे बढ़िया देश जो हर धर्म के लोगों को खुली सांस लेने देता है !फैसला उनके ही पास है !मुसलामानों को ही निर्णय करना है की वो आतंकवादियों के नक़ली जिहाद को सफल होने देंगे या लोकतंत्र की खुली हवा में सास लेना चाहेंगे ! 
 जय-हिन्द !! जय- भारत !! भारत मात की जय !
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Wednesday, April 13, 2016

पानी के संकट को नहीं इसके धंधे को समझे

तो पानी का संकट भारत के लिये खतरे की घंटी है। क्योंकि दुनिया में जिस तेजी से जनसंख्या बढी और जिस तेजी से पानी कमा उसमें दुनिया के उन पहले देशों में भारत शुमार होता है, जहां सबसे ज्यादा तेजी से हर नागरिक के हिस्से में पानी कम होता चला जा रहा है। आलम यह है कि आजादी के वक्त यानी 1947 में 6042 क्यूबिक मीटर पानी हर व्यक्ति के कोटे में आता था। जो कम होते होते 2001 में 1816 क्यूबिक मीटर हो गया। तो 2011 में 1545 क्यूबिक मीटर पानी ही हर हिस्से में बचा । और आज की तारीख में यानी 2016 में 1495 क्यूबिक मीटर पानी हर व्यक्ति के हिस्सा का है। लेकिन विकसित होते देशों के कतार में भारत ही दुनिया का एक ऐसा देश है जहां पानी का कोई मैनेजमेंट है ही नहीं। यानी उपयोग में लाये जा चुके 90 फीसदी पानी को नदियों में पर्यावरण को और ज्यादा नुकसान करते हुये बहाया जाता है। 65 फीसदी बरसात का पानी समुद्र में चला जाता है। और इसके साथ साथ खेती और बिजली पैदा करने के लिये थर्मल पावर पर भारत की 90 फीसदी जनसंख्या टिकी है। यानी बिजली का उत्पादन बढाने के लिये पानी ही चाहिये । और सिंचाई के लिये बिजली से जमीन के नीचे से पानी निकालने की सुविधा चाहिये। और इस पूरी प्रक्रिया में विकसित होने का जो ढांचा भारत में अपनाया जा रहा है वह पानी को कही तेजी से खत्म कर रहा है। क्योंकि जनसंख्या पर रोक नहीं है । सूखे से निपटने के उपाय नहीं हैं। प्रदूषण फैलाते खाद के उपयोग पर रोक नहीं हैं। डैम और जलाशय के नुकसान पर कोई ध्यान नहीं है। उपजाऊ जमीन पर क्रंकीट खड़ा करने में कोई कोताही नहीं है। फसल बर्बादी से आंखें फेर आनाज आयात करने में कोई परेशानी नहीं है। और पानी से होती बिमारी को रोकने के कोई उपाय नहीं है । यानी भारत का रास्ता पानी को लेकर एक ऐसी दिशा में बढ़ रहा है, जहां खेती की अर्थव्यवस्था भी ढह जायेगी और थर्मल पावर सेक्टर भी बिजली देने में सक्षम महीं हो जायेगी ।

यानी जिस इकनॉमी को नेहरु ने हवाई उड़ान दी। वह इकनॉमी ही नहीं बल्कि देश भी 2050 में उसी इकनॉमी तले खत्म होने के कगार पर होगा क्योंकि 2050 में देश में प्रति व्यक्ति पानी का कोटा 1000 क्यूबिक मीटर से नीचे आ जायेगा । यानी चकाचौंध का वह पूरा ढांचा ही डगमगा रहा है। और चकाचौंध भी ऐसी जमीन पर कि एक तरफ पानी का संकट तो दूसरी तरफ संकट को ही धंधे में बदलने के कवायद। क्योंकि डेढ़ बरस बाद बोतलबंद पानी का धंधा 160 अरब रुपये का हो जायेगा। वह भी तब जब आज के हालात में पानी बेचने की दिशा में जो धंधा अपना चुके हैं। यह आंकडा उसका है। यानी अगले डेढ बरस में पानी का संकट और बढेगा तो तो यह 160 अरब के पानी का धंधा 200 अरब भी पार कर सकते हैं। यानी जो संविधान जीने का अकार हर नागरिक को देता है । उस संविधान की शपथ लेने वाली सरकारें हर नागरिक को मुफ्त में पीने का पानी भी दे पाने में सक्षम नहीं हो पा रही है। और जो पानी दिया भी जा रहा है उसमे भी 60 फीसदी पानी साफ नहीं है । और असर इसी का है कि देश में 72 फीसदी बिमारी साफ पानी ना मिलने की वजह से हो रही है। और इन्हीं बीमारियों के इलाज के लिये देश में स्वास्थ्य सेवा भी मुनाफा वाला धंधा इस तरह बन चुका है कि आज की तारिख में निजी हेल्थ सेक्टर 10 लाख करोड़ रुपये पार कर चुका है। और पानी के इस मुनाफे वाले धंधे से अगला जुड़ाव खेती की जमीन पर कंक्रीट खड़ा करने का है । कोई भी रियल इस्टेट खेती की जमीन इसलिये पंसद करता है क्योंकि वहा जमीन के नीचे पानी ज्यादा सुलभ होता है । और खेती की जमीन को कैसे क्रिकट के जंगल में बदला जाये इसका खेल अगर क्रोनी कैपटलिज्म का एक बडा सच है तो दूसरा सच यह भी है कि कि बीते 10 बरस में 47 फीसदी कंक्रीट के जंगल खेती के जमीन पर खडे हो गये । और कंक्रीट के इस जंगल का मुनाफा बीते दस बरस में 20 लाख करोड से ज्यादा का है । यानी भारत जैसे देश में पानी का संकट कैसे मुनाफे वाले धंधे में बदलता जा रहा है । और इसे ही विकास का अविरल धारा माना जा रहा है । यह वाजपेयी सरकार के दौर में तब कही ज्यादा साफ हो गया जब 2002 में नेशनल वाटर पॉलिसी में सरकार ने पानी को निजी क्षेत्र के लिये खोल दिया । यानी जल संसाधन से जुड़ी परियोजनाओं को बनाने, उसके विकास और प्रबंधन में निजी क्षेत्र की भागीदारी का रास्ता खुलते ही पानी से बाजार में मुनाफा कमाने की होड़ में कंपनियां टूट पड़ीं। जबकि इसी दौर में सरकार पीने का पानी उपलब्ध कराने के अपने सबसे पहले कर्तव्य से ही पीछे हटती चली गई। नतीजा यह हुआ कि आज भी साढ़े सात करोड़ से ज्यादा लोगों को पीने का साफ पानी उपलब्ध ही नहीं है । करोडो रुपयो के विज्ञापन इसपर फूके जा रहे है कि बोतलबंद पानी का कोई मुकाबला नहीं है। लेकिन सच यह भी है कुकरमुत्ते की तरह बोतलबंद पानी बेचने वाली कंपनिया उग तो आई लेकिन उसमें भी कीटनाशको की मिलावट है । और यह सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट की रिसर्च में सामने आया । यानी मानकों से कोई लेना देना नहीं। बीते साल नवंबर में मुंबई में 19 ऐसी कंपनियों पर रोक लगाई गई थी। और सूखे के बीच ही इस आखरी सच को भी जान लीजिये कि एक लीटर बोतलबंद पानी तैयार करने में पांच लीटर पानी खर्च होता है। तो सरकार के पास कोई नीति है नहीं इसलिये कैबिनेट की बैठक हो या आल पार्टी मीटिंग या सूखे पर चर्चा हो या पानी के संकट पर सरकार चर्चा करें । सभी के सामने वही बोलतबंद पानी होता है। जिसका धंधा अरबों-खरबों में पहुंच चुका है।

Tuesday, April 12, 2016

नक्सलवादियों और वामपंथियों के बारे में इतना कैसे जानते हैं , हमारे पूण्य प्रसुन वाजपेयी जी !!??

नक्सलबाड़ी से जंगलमहल

बंगाल में सत्ता परिवर्तन के लिये "युद्ध क्षेत्र" होना चाहिये


साल की पत्तियों को जमा करते हैं । पांच पत्तियों को जोडकर प्लेट थाली जितना बड़ा बनाते हैं । फिर उसे धूप में सुखाते हैं । और सूखने के बाद सौ सौ के बंडल बनाते हैं । फिर सौ सौ के दस बंडल मिलाकर कर बेचते हैं । और इसकी कीमत मिलती है सौ रुपया । इसे करने में तीन दिन लग जाते है । और कोई काम तो जंगल में है नहीं । चिडिया पकड़ने के लिये इस तरह लकड़ी के छिलके को धागे से बाध कर बनाते हैं । रात में पेड़ पर लटकाते हैं तो सुबह दो चिड़िया तो फंस ही जाती है । जंगल में घूम कर सूखी लकड़िया जमा करते हैं । जिससे खाना बनाने के इंतजाम हो जाये । ममता दीदी ने यह राशन कार्ड बनवा दिया है । जो हमारे जिन्दा होने की निशानी भी है और जिन्दा रहने की जरुरत भी । क्योंकि इसी से दो रुपये किलो चावल मिलता है । हर हफ्ते छह किलों चावल और
आधा लीटर घासलेट । जिन्दगी जीने की यह कहानी उसी जंगलमहल के आडवडिया गांव की है । जिस जंगलमहल के सैकड़ों गांव की आग ने ममता बनर्जी को पांच बरस पहले सत्ता दिला दी । जंगलमहल के तीनों जिलों पश्चिमी मिदनापुर, पुरुलिया और बांकुरा के किसी भी गांव में घुसकर , किसी के घर के आंगन में खटिया पर बैठकर कुछ देर सुस्ता लीजिये तो ममता बनर्जी की सत्ता पाने की अनकही कहानी आपके आंखो के सामने रेंगने लगेगी । और वामपंथी सत्ता के खिलाफ हिंसक आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई । उन तारीखो को अब भी ममता के साथ जुड चुके माओवादियो को याद है । क्योंकि उस दौर में संघर्ष और मौजूदा वक्त में सत्ता का सुकून कुछ माओवादियो को परेशान करता है । तो कुछ माओवादियो को सुकून देता है । यह हालात ठीक वैसे ही है जैसे कभी नक्सबाडी में कांग्रेस की सत्ता के खिलाफ माओवादी खडे हुये थे और सत्ता परिवर्तन के बाद सीपीएम ने हर उस माओवादी को निशाने पर लिया जिसने वाम सत्ता से जुडने से इंकार कर दिया । अंतर इतना ही है कि 1970-72 के बीच नक्सबाडी में माओवादियों का खून ज्यादा बहा । और 2011-13 के बीच जंगलमहल में माओवादियों के खिलाफ मामले ज्यादा दर्ज हुये । कानूनी फाइले ज्यादा बनी। और जो ममता के साथ जो आया उसकी फाइले बंद हुई । दर्ज मामले वापस लिये गये ।

जहां  ममता पर भरोसा कम है वहां माओवादी ममता बनर्जी के साथ आकर भी हथियार अपने पास छुपाये
हुये है । कि पता नहीं कब इसकी जरुरत पड़ जाये । लेकिन 2016 के विधानसभा चुनाव ने पहली बार उन हालातों को सामने नक्सलबाडी से लेकर जंगलमहल तक के ग्रामीण आदिवासियों के सामने ला खडा किया है जहां वह इस सच को समझने लगे है कि 50 बरस पहले काग्रेस के खिलाफ वामपंथियों ने नही नक्सलियो ने संघर्ष किया था। और उसी संघर्ष को राजनीतिक ढाल बनाकर सीपीएम सत्ता में आई । और 50 बरस बाद सीपीएम के खिलाफ ममता ने भी माओवादियो के संघर्ष को अपना राजनीतिक ढाल बनाया और सत्ता में  गई । इसीलिये 2016 के चुनाव प्रचार के बीच 7 अप्रैल को जब सिलिगुडी में प्रधानमंत्री मोदी रैली करने पहुंचते हैं तो भीड़ के बीच में 78 बरस के बेटे प्राण सिंह भी मिल जाते है । जो बात बात में यह बोलने से नहीं चूकते कि नक्सलबाड़ी ही आखिरी रास्ता है । क्योकि तब और अब के हालात में अंतर सिर्फ इतना आया है कि तब सत्ता का चरित्र साफ दिखायी देता था और अब सत्ता ने बहुत सारे तंत्र को अपने अनुकूल बना लिया है । और तंत्र में जुड़े लोग नौकरी करते हुये । सत्ता को ही जनता का नुमाइंदा करने वाला मानते है । प्राण सिंह उसी धनेश्वरी देवी के बेटे है जिन्हे 24 मई 1967 में पुलिस ने मारा था । उस वक्त कुल नौ माओवादी मारे गये थे । और उसके बाद ही नक्लबाडी संघर्ष की शुरुआत हुई थी । खुद प्राण सिंह ने 1967 में बंदूक उठायी थी । लेकिन अब वह साफ कहते है बदलाव बंदूक से नहीं विचारधारा से आयेगा । और नक्सलबाडी विचारधारा थी । लेकिन हालात कैसे बदल गये इसका एहसास चुनावी गहमा गहमी में अगर कांग्रेसी उम्मीदवार के पीछे खडे वामपंथियों को देखकर समझा जा सकता है तो बीजेपी दफ्तरों को सुरक्षा देती तृणमूल कांग्रेस से भी समझा जा सकता है ।  और इसके सामानांतर नक्सलबाडी के आंदोलन को खड़ा करने वाले जंगल संथाल की पत्नी नीलमणि के तील तील मरने वाले हालात कोई पूछने वाला नहीं से देखकर भी समझा जा सकता है । नीलमणि भूलने वाली बीमारी से ग्रसित है और घर में कोई संभालने वाला नहीं है तो अधनंग-अधमरी हालत में घर की चौखट पर दिनभर पडी रहती है । और जंगलसंथाल के घर से सटे कानू सन्याल के घर को देखती शांति मुंडा है तो अस्सी पार लेकिन उनके भीतर बदलाव की ललक अब भी धधकती है । महिला विंग की कमांडर रह चुकी शांति मुडा का अब भी मानना है कि ‘नक्सलबाडी” कहीं गलत नहीं था । हां उस वक्त चीन के चैयरमैन को हमारे चैयरमैन कहना गलत था । तो गलती तो होती है । लेकिन जब किसान-मजदूर आदिवासी भूखे मरने लगेंगे तो फिर कौन सा रास्ता बचेगा । शांति मुंडा का मानना है कि सत्ता ही नहीं बल्कि मौजूदा वामपंथियों के पास कोई इकनॉमिक माडल नही है । जिससे देश में हर किसी को दो जून की रोटी मिल सके । और राजनीति दे जून की रोटी छीन कर ही रईसी का नाम है । इस लिये वह सत्ता बंदूक की नली से निकलती है के नारे पर चोट करने वालो पर यह कहकर चोट करती है कि नक्सेबाजी  में वामपंथियों ने अपना उम्मीदवार क्यों खडा नहीं किया । कांग्रेसी उम्मीदवार को वामपंथी क्यों समर्थन कर रहे है ।

वैसे खास बात यह भी है कि जंगलसंथाल और कानू सन्याल के गांल हंसदिया को बीजेपी सांसद अहलूवालिया ने गोद लिया है। और शांति मुंडा के मुताबिक अहलूवालिया उनसे मिलने भी आये थे । और कह गये थे कि बुलेट से नहीं बेलेट से सत्ता चलती है तो पिर गांव की सड़क पर एक रोड़ा तक क्यों नहीं गिरा । और शांति मुंडा के इसी सवाल पर जब हमने अहलूवालिया से पूछा तो उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी किसी योजना को लीक होने नहीं देती । और बीडीओ से लेकर कलेक्टर तक तो ममता से डरता है कही बीजेपी सांसद से बात करने की जानकारी लीक ना हो जाये । तो इस खौफ में कोई काम के होगा । कह सकते हैं हर किसी के सवाल दूसरे के सवालों से टकराते हुये ही दिखते हैं । लेकिन नक्सलबाडी अगर राजनीतिक तौर पर वामपंथियों की प्रयोगशाला के तौर पर रही । तो बंगाल का दूसरा सच जंगलमहल है । जहा सत्ता बदलने के महज पांच बरस बाद ही नक्सलबाडी की तर्ज पर सवाल है । क्योंकि ममता बनर्जी ने उन माओवादियो को बदल दिया जो सत्ता में समा गये । सालबानी के विधायक जो इस बार भी टीएमसी के टिकट पर चुनाव लड रहे हैं उनकी जिन्दगी ममता ने बदल दी । यह अलग बात है कि किशनजी के साथ रहते हुये वह जंगलमहल की जिन्दगी बदलने की बात करते थे । जिस वक्त श्रीकांतो महतो जंगल महल के लिये संघर्ष कर रहे थे । तब उनके जहन में ग्रामीण आदिवासी की जिन्दगी में परिवर्तन लाना था । लेकिन ममता ने उन्हीं 2011 में सालबानी से टिकट दिया और चुनाव जीतने के बाद जो श्रीकांतो महतो साल के पत्तो पर खाना खाते थे । वह विधायक श्रीकांतो महतो करोड़पति बन गया । और जो माओवादी मनोज महतो पांव में गोली लगने से घायल गो गया वह ममता की सत्ता तले जीने को बिना किसी पद भी मजबूर हो गया क्योकि पुलिस जब उसे दौडाती तो वह कहा भाग कर कहा जाता और कैसे संघर्ष करता । ऐसे अनकहे सच जंगलमहल के बेलपहाडी से लेकर कांटा पहाडी और सालबानी से लेकर लालगढ में पटे पडे है । लेकिन चुनाव के वक्त पहली बार सत्ता से सटे माओवादी जब यह सवाल उठाते है कि बंगाल में सत्ता परिवर्तन की नींव सिंगूर या नंदीग्राम से नहीं बल्कि तत्कालीन सीएम बुद्ददेव भट्टचार्य  को बारुदी सुरहग से उडाने की घटना से पड़ी । यानी लालगढ से  शुरुआत हुआ तो ममता की राजनीति के उलझे तार खुद ब खुद खुलते चले जाते हैं । क्योंकि टीएमसी कैडर बन चुके माओवादी बकायदा तारीख सहित बताते हैं कि 2 नवंबर 2008 को पश्चिमी मिदनापुर में लालगढ की सीमा के करीब से जा रहे बुद्ददेव भट्टचार्य को बारुदी सुरंग से उडाने का प्लान मई-जून से ही बनने  गे था । क्योंकि जिंदल की फैक्टरी का उद्घाटन करने बुद्ददेव जायेंगे और किस रास्ते से जायेंगे । इसका जानकारी के बाद जंगल महल से गुजरते रेलवे पटरी से ही तार बिछा कर नेशनल हाइवे तक लायी गई थी । और जब बुद्ददेव बच गये तो उसके बाद से पुलिस और सीपीएम कैडर ने समूचे लालकगढ को खंगालना शुरु किया । और एक माओवादी के घर तक पुलिस पहुंची । जहा चीताभाई मूर्मू को मारा –पीटा गया । और उस घटना ने गांव वालो के भीतर गुस्सा बढाया तो सीपीएम कैडर ने हथियारों के साथ मौर्चा संभाल लिया ।

इस घटना से लेकर 2010 में जब लालगढ के नेताई गांव में जब सीपीएम हथियारबंद कैडर हरमत वाहिनी ने नौ लोगों को मारा तो उस घटना ने बंगाल में सत्ता परिवर्तन की नींव पुखत्क र दी । क्योकि पहली बार बंगाल पुलिस और सीपीएम कैडर के बीच लकीर कैसे मिट चुकी है य.ह साफ साफ दिखायी देने लेगा । और ममता बनर्जी ने राजनीतिक तौर पर माओवादियो के समूचे संघर्ष को ही साधना शुरु कर । वजह भी यही है टीएमसी सांसद शुभेन्दु अधिकारी शुरु से जंगलमहल के हालातो से दो चार हो रहे थे । तो वही आज की तारिख में ममता बनर्जी और टीएमसी में शामिल हुये माओवादियों के बीच कडी है । और सीपीएम की हरमद वाहिनी से दो दो हाथ करने
वाले माओवादियों को साथ खडा कर ममता बनर्जी ने अपना राजनीतिक घेरा ठीक उसी तरह बढाया और मजबूत किया जैसे 1970-72 के दौर में वामपंथियों ने नक्सलबाडी में बनाया था । तो सिर्फ तरीका ही नहीं बल्कि वैचारिक तौर पर भी वामपंथियों से लेकर ममता बनर्जी ने अपने पने राजनीतिक बिसात पर प्यादा वाम
सोच को ही बनाया । इसलिये नक्सलबाडी में घूमते हुये आप आज भी मार्क्स, लेनिन, चिन ली पाओ से लेकर माओ तक की प्रतिमा देख सकते हैं । तो जंगलमहल के पश्चिमी मिदनापुर के शहरी बाजार के सबसे व्यस्तम चौराहे पर कार्ल मार्क्स की प्रतिमा भी आपका स्वागत करेगी । और तस्वीरो की नींव बुलंद दिखायी दे इसके लिये ज्योति बसु ने लाल पत्थर कटवाया । तो ममता ने लाल पत्थर के सफेद-नीले से रंग कर इस एहसास को जंगम महल में जगाया कि तृणमूल कांग्रेस वाम से भी ज्यादा वाम है । लेकिन अतीत के हालातो का ककहरा दोनों भूल गये हैं तो यह भी भूल गये कि बंगाल में सत्ता परिवर्तन के लिये एक “ युद्द-क्षेत्र “हमेशा चाहिये । और 2016 के विधानसभा चुनाव के वक्त ना तो 1967 वाला नक्सलबाडी है,  ना ही 2011 का जंगल महल सरीखा कोई “ युद्द-क्षेत्र “ है । सिर्फ ढहते मूल्यों की सियासत को लेकर गुस्सा है । इसलिये सिर्फ पांच बरस में वाम और  ममता में कोई अंतर किसी को नजर आ नहीं रहा है ।
नक्सलवादियों और वामपंथियों के बारे में इतना कैसे जानते हैं , हमारे पूण्य प्रसुन वाजपेयी जी !!??
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Monday, April 11, 2016

"ग़ज़ल"कहीं खो गयी !प्यार कहीं बिक गया !- पीतांबर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. + 919414657511.

कल मैंने टीवी के एक कार्यक्रम में पीनाज़ मसानी जी के साथ-साथ कई ऐसी हस्तियों को देखा , जो आजकल के "बिकाऊ"कार्यक्रमों में नहीं दिखाई जातीं !आजकल ना तो वो पुराना प्यार रहा है ना ही पुराने गीतकार और गायक !या यूं कहें कि आजकल वो गीत-संगीत नहीं गवाया-बजाया जा रहा जिसमे "देवीय-गुन"होते हैं !यानि "शास्त्रीय-संगीत"के अनुसार किसी "राग"पर आधारित गहरे-चोट खाये लेखक द्वारा लिखी गयी रचनाओं का आजकल जैसे कोई अकाल सा पड़ गया हो !
                            पुराने संगीतकारों की रचनाएँ कहीं सुनने को मिल जाती हैं तो ऐसे लगता है जैसे तन-मन में कोई लहर सी दौड़ गयी हो ! "सा-रे-गा-मा पा" नामक कार्यक्रम आजकल जी टीवी पर दिखाया जा रहा है !जहां संगीत से जुडी कई ऐसी हस्तियां नज़र आ जाती हैं जिससे मन को एक शान्ति का सा आभास होता है !इसी तरह कल जी टीवी पर ही "मिर्ची"म्युज़िक-एवार्ड"घोषित किये गए !आदेश श्री वास्तव जी को भी याद किया गया , तो सब की आँखों में आंसू आ गए !हमारे परिवार के सदस्य भी भावुक हो गए !एक अजीब सा जुड़ाव हो जाता है जब भी संगीत का कोई कार्यक्रम दिखाई पड़ता है !!
                       ये महत्त्व-पूर्ण नहीं होता कि अवार्ड बांटने की "प्रक्रिया"कैसी है और किसे पुरुस्कृत किया जा रहा है , मतलब तो संगीत की स्वर-लहरी छिड़ने से है !आजकल के गीतों की गन्दी शब्दावली को यहां लिख कर मैं अपने लेख को गंदा नहीं करना चाहता हूँ , क्योंकि आप सब गंदे गाने सुन ही चुके होंगे !इनको सही ठहराने का ऐसे गंदे गीत बनाने वालों के पास एक ही तर्क होता है कि देश की जनता यही चाहती है तभी तो ऐसे गीत हिट होते हैं ,तभी तो सभी शादी-ब्याहों में यही गीत गाए और बजाये जाते हैं !!इसीलिए हम जैसे लोगों को भी चुप रहना पड़ता है जी !
                          समय का चक्र अवश्य घूमेगा ! फिर से रास भरे गीत और ग़ज़लें अच्छे संगीत हमें सुनने को अवश्य मिलेंगीं ऐसी मुझे सम्पूर्ण आशा है ! और आपको........?????????????????  अपने विचारों से हमें अवश्य अवगत करवाएं , हमारे ब्लॉग पे अपने अनमोल कॉमेंट्स लिख कर !!अंत में एक गीत की दो लाइनों के साथ अपनी बात को समाप्त करना चाहूँगा  कि -- "हम हैं मताए कुचाओ  , बाज़ार की तरह , उठती है हर नज़र खरीदार की तरह........ !!!!!
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Thursday, April 7, 2016

भारत माता की जय और जय-हिन्द बाद में बोलना नेताओ , पहले ज़रा जनता के दुःख हरने का प्रयास करो !- पीतांबर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो.न. - +919414657511

  कोई कहता है कि भारत में यदि रहना होगा , "वन्दे-मातरम्"कहना होगा ! कोई कहता है कि भारत देश सिर्फ हिन्दुओं का नहीं , उनका भी है जिन्होंने भारत को लूटा-खसोटा है !और कोई कहता है भारत के सभी पैसे वालों को मारकर भगा दो ! यहां सिर्फ "मजदूर""लाल-सलाम"करेंगे आदि-आदि !लेकिन इस देश की जनता 1952 से सिर्फ यही सोच कर अपनी "बागडोर"कभी किसी को सम्पति है कभी किसी को कि कोई तो उनकी सुरक्षा,रोटी-कपडा और मकान के बारे में सोचेगा या इंतज़ाम करने की कोशिश करेगा !
                           लेकिन अफ़सोस !! होता इसके बिलकुल उल्ट है !सभी "विचारधारा"वाले अपनाकर देख लिए इन 68 वर्षों में भारत की जनता ने ,लेकिन सबने अपनी व्यवस्था अच्छे से करली है लेकिन आम जनता आज भी विभिन्न शंकाओं से जूझ रही है !कुछ लोगों को सरकार और जनता को इतना बेवकूफ बनाना आ गया है कि पूछिए मत !ये "नटवर लाल"  सम्पत्ति का "दोहन" कर लेते हैं !और इनको देश का कोई संविधान और सिस्टम रोक नहीं पाता है !लेकिन इन दोनों की तारीफ़ में तरह-तरह के गीत बहुत गाए जाते हैं इन्हीं लुटेरों द्वारा !! हद्द है मित्रो !!
                     हम जैसे विचारवान भी अब तो एक जैसे लेख लिखकर परेशान हो गए हैं !सोचते हैं कि कोई हमको सारे ऐसे साधन उपलब्ध करादे जिससे हम "शहंशाह"की तरह रोज़ रातों को निकले और किसी ना किसी "पापी"की बलि भारत-माता को चढ़ाकर सोएं ! सुबह होते ही फिर लेखक बन जाएँ !बिलकुल हमारे धर्म जी और अमित जी की तरह !किसी "गब्बर सिंह"को मार दें और हमें भी हेमा जी और जाया जी जैसी कोई सुप्रसिद्ध हस्ती इनाम में मिल जाए !
                       क्या बताएं मित्रो !! कसम से हमारे दिमाग का तो दही हो गया है आज के हालात देख कर !जो भारत माता की जय नहीं बोलकर हीरो बना जा रहा है तो कोई यही बोलकर डंडे खा रहा है !नेता ससुर के नाती टीवी पर आकर हँसते और बहसते फिरते हैं !
 धिक्कार है !! 
                           जनता उठो !किसी भी राजनितिक दल को वोट मत दो ! केवल निर्दलीयों को वोट करो ! ताकि देश से गब्बर सिंह के गैंगों का खात्मा हो सके !ये सभी राजनितिक दल गैंग ही तो हैं !विचारधाराएं तो कब की खत्म हो चुकीं हैं !
 जय-हिन्द !! जय-भारत ! वन्दे - मातरम !!
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Monday, April 4, 2016

भारतीय सनातन धर्म में नववर्ष का शुभारंभ सोमवार को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा) से हो रहा है।

चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा कहते हैं। यहीं से हिंदू नववर्ष का आरंभ माना जाता है। माना जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। उन्होंने इस प्रतिपदा तिथि को 'प्रवरा' अथवा 'सर्वोत्तम' तिथि कहा था। यही वजह है कि इसे सृष्टि का प्रथम दिन कहा जाता है।
इस दिन ब्रह्माजी सहित उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के समस्त तत्वों का पूजन भी किया जाता है। चैत्र के महीने में प्रकृति में नवीनता का संचार होता है। नए जीवन के संकेत चारों ओर से मिलते हैं। शुक्ल प्रतिपदा को चंद्रमा की कला का प्रथम दिन माना जाता है और चूंकि वनस्पतियों को सोमरस चंद्रमा ही प्रदान करता है तो इसलिए इस दिन को वर्षारंभ माना जाता है।
इस वर्ष का राजा शुक्र: चूंकि इस वर्ष 8 अप्रैल से नव विक्रम संवत्सर 2073 का प्रारंभ हो रहा है और यह दिन शुक्रवार है तो इस वर्ष का राजा शुक्र ग्रह होगा। ज्योतिषीय गणना में जिस दिन को नव संवत्सर आरंभ होता है उस दिन का स्वामी ग्रह ही वर्ष का राजा होता है। इस संवत्सर का नाम होगा 'सौम्य।
इस वर्ष का मंत्री बुध है। जब वर्ष का राजा शुक्र होता है तो यह खाद्यान्ना के मामले में आत्मनिर्भरता का सूचक है। तब अनाज और मौसमी फल वगैरह पर्याप्त मात्रा में होंगे। गाय-भैंस और पशुओं की वृद्धि होगी। शासक और प्रजा दोनों सुखी रहेंगे। शुक्र वैभव, विलासिता व भौतिक सुख देने वाले देव हैं तो इस स्थितियां अच्छी रहेंगी। फैशल के क्षेत्र में नए ट्रेंड देखने को मिलेंगे। आध्यात्मिक प्रवृत्तियों का विकास होगा। हर क्षेत्र में स्त्रियों का दखल और दक्षता बढ़ेगी।
8 अप्रैल, शुक्रवार से हिंदू नववर्ष विक्रम संवत्सर 2073 प्रारंभ हो रहा है। इस संवत्सर का नाम सौम्य है। इस संवत्सर के राजा शुक्र व मंत्री बुध हैं। ज्योतिषियों की मानें तो इस हिंदू नव वर्ष में शनिदेव का विशेष प्रभाव सभी राशियों पर अलग-अलग देखने को मिलेगा।
वर्तमान में शनि वृश्चिक राशि में वक्रीय स्थिति में है, जो 13 अगस्त को पुन: मार्गी हो जाएगा। इस समय तुला, वृश्चिक व धनु राशि शनि की साढेसाती की पीड़ित है, वहीं सिंह व मेष पर शनि की ढय्या का प्रभाव है।
शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016 से हिन्दी नववर्ष शुरू हो रहा है। इसी दिन से चैत्र माह की नवरात्रि भी प्रारंभ होगी। शास्त्रों के अनुसार हिन्दी नववर्ष का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा-पाठ के लिए ये सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त में से एक है। इस मुहूर्त में किए गए उपायों से अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति हो सकती है, घर की गरीबी दूर हो सकती है और मान-सम्मान मिल सकता है।

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अगर कोई मोदी को गालियाँ दे रहे है ... तो वह महाशय अवश्य इन लिस्ट में से एक है : ---------------------- . 1. नम्बर दो की इनकम से प्रॉपर्...