Saturday, December 31, 2016

"चूहे - चुहियाँ "- पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो.न. +9414657511

माननीय मुलायम सिंह जी का "मान"अभिमान बनकर सामने एकबार फिर से आ गया है !चचा शिवपाल और अमर सिंह जी हमेशां की तरह दोषी ठहराए जा रहे हैं !तो रामगोपाल यादव जी भतीजे के साथ जाँघों पर हाथ मारकर "दंगल" को तैयार खड़े हैं ! आजमखान जी अपनी डूबती लुटिया को बचाने हेतु अतीक अहमद के इशारे पर "सेकुलर ताकतों "को मजबूत करने वास्ते  अखिलेश को एक बार फिर मुलायम जी के चरण पकड़वाकर माफ़ी मंगवाने हेतु ले गए हैं !
                         देखते हैं "ऊँट किस करवट बैठता"है जी !लेकिन ये तो मानना ही पड़ेगा कि "समाजवादी"बड़ी ही "चतुराई"से काम ले रहे हैं !जनता और बाकी की राजनितिक पार्टियां शायद "गच्चा" खा जाएँ !"अंदर की बात"ये है कि ये सब एक नाटक का हिस्सा है जो शोर शराब जनता को पत्रकारों के ज़रिये दिखाया जा रहा है !असल में इनका मानना है कि जितनी सीटें समाजवादी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर मिल जाएँ वो भलीं, और बाकी की कमीं अखिलेश और कोंग्रेस से समझौता-गठबंधन करके मिलजाएं वो और ज्यादा बेहतर होगा ! यानिकि "चित भी मेरी और पट भी मेरी", दोनों हाथों में लड्डू होंगे जब विरोध के वोट अखिलेश को और समर्थन वाले मुलायम को मिल जाएंगे !बाप-बेटे में समझौता तो कभी भी हो सकता है जी !
                 चूहे-चुहियाँ यानिकि "समर्थक" तो पीछे आ ही जाएंगे जिंदाबाद करने को !बाकी रही बात समाजवाद के नियमों की , सिद्धांतों की ,वो तो सब कागज़ी बातें हैं जी, बातों का क्या ?आजकल राजनीती में भी वो ही कामयाब है जो सबसे बड़ा "ड्रामेबाज़ और सफल अभिनेता" हो !ये सभी नेता कोंग्रेस की ही पैदाइश हैं !
                         "चूहे-चुहियों"का ज़िक्र हमारे मोदी जी ने भी बड़े चटकारे ले कर किया है जी !वो भी कहते हैं कि मैंने तो देश का "माल"खाने वाले चूहों को ही पकड़ना था !वो किसी को शायद "चुहिया"भी कह रहे थे ! पता नहीं किसे ???कुछ का मानना है कि उनका ईशारा सोनिया जी की तरफ था !लेकिन मैं ये मानने को तैयार नहीं कि मोदी जी "बड़े-बड़े चूहों"को छोड़कर अपना ध्यान एक "चुहिया" पर केंद्रित करेंगे !या फिर उस "चुहिया" के कहने पर ही "मोटे-चूहों" की हिम्मत हुई देश का धन खाने हेतु?
                                  बात जनता की है , वो कहाँ जाए?अपनी मुसीबतें किसे सुनाये?क्या वो केवल "कृपा-पात्र"बनकर ही अपना जीवन व्यतीत करती रहे ?क्या यही उसके भाग्य में है ?मुझे बचपन में पढ़ी "पुनः मूषको भव" वाली कहानी याद आ रही है जी !जिसमें एक चुहिया को ऋषि का कोई "वरदान"भी फिट नहीं बैठता , आखिर में वो वापिस चुहिया ही बन जाती है !क्या हमें भी उसी तरह से "बेईमानी" से ही अपना जीवन चलना होगा ?जो कोंग्रेस ने हमें 60 सालों में सिखाया है ?क्या भगवान् विष्णु के 24 अवतार ,हज़ारों सच्चे गुरुओं की शिक्षा और लाखों ग्रंथों की बातों का हमपर कोई असर नहीं होगा ? बात सोचने वाली है हज़ूर !!
चोर शरेआम ये गीत गाकर हमारा मजाक उड़ा रहे हैं कि "अजी हमसे बचकर कहाँ जाइयेगा,जहां जाइयेगा , हमें पाइयेगा "...................!!!!!



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Wednesday, December 28, 2016

"यादें - 2016 की ,कुछ अच्छी ,तो कुछ कड़वीं "!? - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो.न. - +9414657511

मित्रो !! सादर प्यार भरा नमस्कार स्वीकार करें !ये जो जीवन है , चलने का ही नाम है !कोई कहता है , "ज़िन्दगी सिग्रेट का धुंआ ", तो कोई कहता है कि ,"ज़िन्दगी हर कदम , इक नयी जंग है "! किसी ने तो जिंदगी को एक नाटक का ही नाम दे दिया !सबने अपने जीवन के अनुभव के अनुसार इसको अपनी उपमाएं दी हैं !इसलिए सभी सच लगती हैं !
                            तो मित्रो ! चलते चलते  वर्ष 2016 भी समाप्त होने जा रहा है और अंग्रेजों द्वारा प्रचलित 2017 आने वाला है !आप सबको इस आने वाले वर्ष की हार्दिक शुभ-कामनाएं ! सुखभरी घटनाएं रोज़ आपके जीवन में आती रहें !प्रकृति माता आपके ऊपर मेहरबान रहे !आइये कुछ चित्रों द्वारा वर्ष 2016 की यादों को आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ !जिसमे सामजिक,राजनितिक,प्राकृतिक और विश्व की मुख्य घटनाएं चित्रों द्धारा आपको दिखने का प्रयास करता हूँ ! 















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Thursday, December 22, 2016

" क्या पत्रकारिता, केवल चाटुकारिता,दलाली,और "घटिया नेताओं के स्तरहीन कार्यों" पर मिले "तंज"पर "अनर्गल प्रलाप" का ही नाम है " ??


मुझे इतने दिनों तलक कोई विषय ही नहीं मिल पा रहा था ,अपने विचार आप तक पहुंचाने हेतु !लेकिन परसों जैसे ही "महान पार्टी कोंग्रेस के महान नेता राहुल गांधी"ने गुजरात में जाकर अपना स्पेशल लिखवाया हुआ भाषण एक विशेष अंदाज़ में हमें सुनाकर हमें अनुग्रहित किया , पूछिए मत !हम धन्य हो गए कि चलो , भाई कुछ सीखना चालु तो कर रहा है !चाहे केजरी-प्रशांत के पुराने आरोप,जिन्हें न्यायालय खारिज कर चुका था , को ही पढ़ा गया !हम और हमारे जैसे बिकाऊ,चाटुकार,दलाल टाइप के पत्रकार प्रसन्न हुए और "वारे-वारे-जा"रहे थे !लेकिन कल मोदी जी ने जो उनके भाषण की बखिये उधेड़ीं,और उनको-हम जैसों को नँगा किया ,हमारा सभी प्रकार का "कालापन" बाहर आ गया !
                     तो कल ही "रविश कुमार"ने सारा प्राइम-टाइम अभय दूबे और नीरिजा जी के साथ मिलकर राहुल को बड़ा नेता बताने और भ्रष्ट नेताओं को बचाने में बर्बाद कर दिया ! जनता पर उनके घूम-फिराकर चमचागिरी करने की चाल को अच्छी तरह से समझ लिया !लेकिन सवाल ये उठता है कि ये पत्रकार ऐसा सब करने को क्यों मजबूर हो जाते हैं ,जो पत्रकारिता के मूल नियम-क़ानून को ही उजाड़ कर रख दे ! शर्म आणि चाहिए ऐसे पत्रकारों को !लेकिन साहेब "आती नहीं,आती नहीं.....वाला गीत गाकर ये फिर चालु हो जाते हैं कुछ दिनों के ठहराव के बाद , जो ये खुद कबूलते भी हैं की तरह-तरह की गालियां इनको सुननी पड़तीं हैं !  मोदी जी ने एक उदाहरण देकर समझाया था की संसद में शोर-शराबा करके ये चोरों को "कवर"करते हैं पाकिस्तानी फौजियों की तरह , लेकि ये पत्रकार विपक्षी नेताओं को ही पाकिस्तानी बताने पर तुले हुए थे !उन्होंने तो नहीं कहा लेकिन इन्होंने कह दिया ! वाह भाई वाह !! क्या चतुराई है पत्रकारों की !
                       लेकिन इतना तो अब मेरा भी मानना है कि भाजपा के प्रवक्ता,नेता मंत्री और माननीय प्रधानमंत्री जी को अब विपक्षी नेताओं को गरियाना,धमकाना और दुत्कारना छोड़ देना चाहिए , क्योंकि बिना वजह से इनको "बेचारगी"का भाव मिल जाएगा !   अब बस , आप सब केवल "मुद्दे" की बात "टु  द पॉइन्ट "ही बात करें जी !बाकी आप सोशियल मीडिया वालों पर छोड़ दीजिये श्रीमान !

एक मित्र ने ये भी लिखा कि
                                              पाकिस्तान पर जब से भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक किया है, यह शब्द तब से सोशल मीडिया पर सामाजिक बीमारी को जड़ से समाप्त कर देने का मुहावरा बन गया है। लेकिन अब तक किसी ने सर्जिकल स्ट्राइक खुद अपने घर में कराने की मांग नहीं की। अब मीडिया जगत की बड़ी हस्ती चाहती है की एक सर्जिकल स्ट्राइक मीडिया घरानों और पत्रकारों पर भी होना चाहिए।
पत्रकारिता जगत में आलोक मेहता परिचय के मोहताज़ नहीं है। आउट लुक के संपादक आलोक मेहता ने जब नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट के कार्यक्रम में पत्रकारिता की गिरती साख पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि अब वक्त आ गया है एक सर्जिकल स्ट्राइक मीडिया पर भी हो! उनकी इस बात पर उपस्थित पत्रकारों ने ताली बजाकर स्वीकृति की मुहर लगा दी। मेहता का मानना है कि इस धंधे में ऐसा क्या है जो मालिक करोड़ों में खेलने लगता है। कुछ पत्रकार ने रातों रात पेशे की साख बेच दी! उन पर कभी कारवाही क्यों नहीं हुई? वे कहते है क्यों सिर्फ नेताओं के भ्रष्टाचार की बात हो? पत्रकारों की क्यों न हो?
कुछ मछलियां पूरे समंदर को गन्दा कर रही है। दूसरों के ऊपर उंगली उठाना जितना आसान है,खुद के गिरेबान में झांकते हुए कटघरे में खड़ा होना उतना ही मुश्किल। पत्रकारों की चिंता इस बात को लेकर ज्यादा रही कि आज मीडिया संजय की भूमिका छोड़ कर बस मोदी विरोध और मोदी समर्थन के धंधे में लिप्त है। टीवी मीडिया खुद एक पार्टी बन गई है! टीवी पत्रकारिता ने पेशे की दलाली की जड़ पर भी हमला किया! सच तो यह है कि जब से टीवी 24 घंटे का हुआ, संपादको ने स्ट्रिंगरो की एक जमात पैदा की जो मूलतः पत्रकार न हो कर जिले के ठेकेदार और दुकानदार ज्यादा होते थे। उन्हें टीवी चैनल के पैसे से नहीं केवल ‘गन माइक’ और ‘कार्ड’ से मतलब था लेकिन जब लोकल स्तर पर पत्रकारों को भी संपादकों ने दलाली का ठेका दे दिया तो वे रिपोर्टर को पांच सौ की स्टोरी भेज कर पाँच- दस हज़ार की कमाई में लिप्त हो गए! बीमारी यहीं से शुरू हुई।
मेहता कहते हैं सिर्फ व्यापारी और नेता ही क्यों? आज तक किसी भी अखबार वाले या पत्रकार के घर छापा क्यों नहीं। फेरा में कोई पत्रकार क्यों नहीं फंसा। हम सिर्फ नेताओं के खिलाफ क्यों बोले? सनसनी सिर्फ टीवी नहीं,अखबार भी करता है! कई बार तो अखबार नग्न तस्वीरें भी छापता है। यह एक अलग तरह का धंधा है। वहां सर्जिकल स्ट्राइक क्यों नहीं? मेहता का कहना है यह स्ट्राइक खबर को लेकर कतई नहीं होना चाहिये! भ्रष्टाचार को लेकर होना चाहिए। आलोक मेहता पत्रकरिता में परिचय के मोहताज़ नहीं है। लेकिन पेशे के अन्दर शुद्धिकरण की उनकी मांग ने नई बहस को जन्म दिया है! यह बहस आगे चलनी चाहिए। खेमेबाजी में बंटी मीडिया के किसी शब्द का मोल कैसे हो सकता है, जब हमें पहले से पता हो कि कौन सा चैनल और उसका पत्रकार किसका पक्षकार है?
इसके लिए तो सोशल मीडिया आ गया है जनाब। फिर जनता आम जन की इस मीडिया पर भारोसा क्यों न करे? मेनस्ट्रीम मीडिया यदि खुद की सफाई न करे तो उसका सर्जिकल स्ट्राइक क्यों न हो ताकि जनता इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पत्रकार और उस मीडिया हॉउस के पीछे के धंधेबाज पक्षकार की पहचान कर सके। सवाल सिर्फ नेताओं पर क्यों? सवाल करने वालों पर सवाल क्यों नहीं?

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Wednesday, December 21, 2016

करप्शन की गंगोत्री राजनीति से निकलती है, अब तो मान लीजिए........!!!! - पुण्य प्रसून बाजपेयी

हफ्ते भर पहले ही चुनाव आयोग ने देश में रजिस्टर्ड राजनीतिक दलों की सूचीजारी की। जिसमें 7 राष्ट्रीय राजनीतिक दल और 58 क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का जिक्र है। लेकिन महत्वपूर्ण वो सूची है, जो राजनीतिक तौर पर जिस्टर्ड तो हो चुकी है और राजनीतिक दल के तौर पर रजिस्टर्ड कराने के बाद इस सूची में हर राजनीतिक दल को वह सारे लाभ मिलते है जो टैक्स में छूट से लेकर। देसी और विदेशी चंदे को ले सकते हैं। बीस हजार से कम चंदा लेने पर किसी को बताना भी नहीं होता कि चंदा देने वाला कौन है। और इस फेहरिस्त में अब जब ये खबर आई कि चुनाव आयोग 200 राजनीतिक दलों को अपनी सूची से बाहर कर रहा है। सीबीडीटी को पत्र लिख रहा है। क्योंकि ये पार्टियां मनीलान्ड्रिंग में लगी रहीं। तो समझना ये भी होगा कि चुनाव आयोग की इस फेहरिस्त में सिर्फ दो सौ या चार सौ राजनीतिक दल रजिस्टर्ड नहीं है जिन्होंने चुनाव नही लड़ा और सिर्फ कागज पर मौजूद है। बल्कि ऐसे राजनीतिक दलों की फेहरिस्त 13 दिसंबर यानी पिछले हफ्ते तक 1786 राजनीतिक दलों की थी। और इन राजनीतिक दलो की फेहरिस्त में इक्का दुक्का या महज दो सौ राजनीतिक दल नहीं है जो टैक्स रिटर्न तक फाइल नहीं करतीं। बल्कि चुनाव आयोग सूत्रों के मुताबिक एक हजार से ज्यादा रजिस्टर्ड राजनीतिक दल इनकम टैक्स रिटर्न फाइल नहीं करती। तो इस फेरहिस्त को देखकर कोई भी सवाल कर सकता है कि क्या राजनीतिक दल कालाधन खपाने के लिये बनाये जाते हैं। क्या चुनाव लड़ने वाली राजनीतिक पार्टियां अपने काले चंदे को खपाने के लिये भी पार्टियां बनाती है। क्योंकि चुनाव आयोग आर्टिकल 324 के तहत चुनावी प्रक्रिया पर कन्ट्रोल तो कर सकता है। लेकिन चुनाव आयोग किसी राजनीतिक दल को अपने तौर पर हटा नहीं सकता। तो क्या जिन 200 राजनीतिक दलों के रजिस्ट्रेशन रद्द करने का जिक्र चुनाव आयोग अब कर रहा है उसके लिये सीबीडीटी जांच जरुरी है। यानी राजनीति पाक साफ हो । इसके लिये पहल सरकार को ही करनी होगी। क्योंकि कायदे कानून अगर कड़े होंगे। राजनीतिक दलों के खिलाफ आरोप साबित होने पर कानून अपना काम करते हुये दिखे। जांच एजेंसियां स्वतंत्रता के साथ काम करने लगे। तो फिर चुनाव आयोग से राजनीति को पाक साफ करने की गुहार पीएम को भी करने की जरुरत पडेगी नहीं । क्योकि कानून सरकार को बनाना है। लागू जांच एंजोसियों को करना है। समझना होगा कि चुनाव आयोग सिर्फ पार्टियों को रजिस्टर्ड कर सकती हैं। रद्द करने का अधिकार उसके पास नहीं है। तो बड़ा सवाल यहीं से शुरु होता है कि क्या देश में भ्रष्टाचार की गंगोत्री राजनीतिक दल बनने के साथ ही शुरु होती है। तो आईये इसे भी परख लें। क्योंकि राजनीति का सच तो यही है कि कॉरपोरेट,कालाधन और दागियों ने भारतीय राजनीति को बंधक बना लिया है। या कहें कि भारतीय राजनीति की दशा-दिशा उसी कॉरपोरेट की मर्जी से तय होती है, जिसे विपक्ष में रहते हुए हर दल निशाने पर लेता है और सत्ता में आते ही खामोश हो जाता है । और सत्ता खिसक जाये तो सत्ता के करप्शन पर सीधे अंगुली उठती है ।यानी कालाधन इस राजनीति को वो ऑक्सीजन देता है,जो ईमानदारी के पैसे से मुमकिन ही नहीं। और दागी वो औजार हैं, जो संसदीय राजनीति की तमाम कमियों को ढाल बनाकर राजनीति के मायने ही बदल देते हैं। तो क्या ये इसलिए है क्योंकि देश की नीतियां कॉरपोरेट तय करता है। और कॉरपोरेट इसलिए तय करता है क्योंकि बीते 12 बरस में हुये तीन लोकसभा चुनाव में 2355 करोड़ रुपये कारपोरेट ने चंदे के तौर पर दिये। और कारपोरेट को टैक्स में छूट के तौर पर 40 लाख करोड़ से ज्यादा राजनीति सत्ता ने दिये । इसी तरह -बीते 10 बरस में विधानसभा चुनावो में कारपोरेट ने 3368 करोड टैक्स के तौर पर दिये। राज्यों ने कारपोरेट को योजनाओं के जरीये 50 लाख करोड़ से ज्यादा का लाभ दे दिया। तो राजनीति करप्ट है या देश में विकास के नाम पर जो भी काम कोई उघोगपति या कारपोरेट करना चाहता है मुनाफे के लिये उसे राजनीतिक सत्ता का आसरा लेना ही होता है। तो क्या राजनीतिक दल अगर करप्ट ना हो तो देश में विकास या इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर जितना खनिज संसाधन लुटाया जाता है वह सही मायने में देश को विकसित कर दें। यह सवाल इसलिये क्योंकि जब कैशलेस देश का जिक्र हो रहा है तो बीते दस बरस में 10 बरस में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों ने 1039 करोड रुपये कैश में चंदे के तौर पर लिये। क्षेत्रीय पार्टियों ने 2107 करोड रुपये कैश में चंदे के तौर लिये। और असर इसी का है कि एनपीए यानी डुबा हुआ कर्ज लगातार बढ़ रहा है और मनमोहन सिंह के बाद प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने के बाद भी थमा नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि 2014-15 में बैंकों का एनपीए 5.43 फीसदी था, जो अब बढ़कर 9.92 फीसदी हो चुका है। हद तो ये कि हाल में सरकार ने शीर्ष 100 विलफुट डिफाल्टरों में से 60 से अधिक पर बकाया 7,016 करोड़ रुपए के लोन को डूबा हुआ मान लिया । और अब विपक्ष में रहते हुए इस मुद्दे को अगर कांग्रेस उठा रही है, तो कांग्रेस का सच ये है कि कांग्रेस के कार्यकाल में करीब 1 लाख करोड़ का कॉरपोरेट कर्ज माफ किया गया था । और कॉरपोरेट या बड़े उद्योगपतियों को सरकार की छाया का लाभ कैसे मिलता है-इसका पता इस बात से भी लग सकता है कि कालेधन पर विदेशी बैंकों के 627 खाताधारकों में इक्का दुक्का को छोड़कर आज तक सबके नाम सामने नहीं आए। और नाम सामने आने चाहिये इसके लिये अब राहुल गांधी कहते है नाम क्यों नहीं बताते और जब मनमोहन सिंह की सत्ता थी तो बीजेपी पूछती थी मनमोहन सिंह नाम क्यों नहीं बताते। तो राजनीतिक भ्रष्टाचार के सामने कैसे हर भ्रष्टाचार छोटा है ये अमेरिकी की नामी सर्वे कंपनी आईपीएसओएस के सर्वे में सामने आ गया तो दुनिया के 25 देशो के सामने मुख्य मुद्दा हो, कौन सा इसे लेकर किया गया ।भारत में नोटबंदी से एन पहले 25 अक्टूबर से 4 नवंबर तक जो सर्वे किया गया। उसमें सामने यही आया कि अमेरिका के सामने सबसे बडा मुद्दा आतंकवाद का है। रुस के सामने सबसे बडा मुद्दा गरीबी और समाजिक असमानता है। चीन के सामने सबसे बडा मुद्दा पर्यावरण का है। फ्रांस के सामने सबसे बड़ा मुद्दा रोजगार का है। लेकिन भारत के सामने सबसे बडा मुद्दा वित्तीय और राजनीतिक करप्शन है। और इस सर्वे में ये साफ तौर पर उभरा कि भारत के लोग आंतक, गरीबी,हेल्थ, शिक्षा या फिर अपराध से भी उपर पॉलिटिकल करप्शन को ही महत्वपूर्ण मानते हैं। सर्वे के मुताबिक 46 फिसदी लोगों की राय है कि पॉलिटिकल करप्शन ना हो तो हर हालात ठीक हो सकते हैं। तो क्या ये भी कहा जा सकता है कि राजनीति से बडा सांगठनिक अपराध और कोई नहीं है। या फिर राजनीतिक पार्टी का ठप्पा लगते ही कानून-व्यवस्था कोई मायने नहीं रखता। या राजनीति से बड़ा रोजगार और कोई नहीं है। क्योंकि मोदी सरकार ही जिस कैशलेस व्यवस्था की दिशा में देश को ले जाना चाह रही है उसमें कोई राजनीतिक दल कहने को तैयार नहीं है कि अब कैश से एक पैसा भी चंदा नहीं लिया जायेगा और चंदा देने वाले को राजनीतिक सत्ता कोई लाभ नहीं देगी ।तो क्या 30 दिसंबर को देश अफसल साबित होगा ? सवाल ना तो किसी चौराहे का है ना ही पीएम के वचन का। सवाल है कि आखिर 30 दिसंबर के बाद देश के सामने रास्ता होगा क्या। क्योंकि इन्फ्रास्ट्रक्चर जादू की छड़ी से बनता नहीं है। और नोट छापने से लेकर कैशलेस देश की जो परिभाषा बीते 36 दिनो से गढ़ी जा रही है, उसके भीतर का सच यही है कि मनरेगा से लेकर देशभर के दिहाड़ी मजदूर जिनकी तादाद 27 करोड पार की है उनकी हथेली खाली है। पेट खाली हो चला है। तीन करोड़ से ज्यादा छात्र जो घर छोड़ हॉस्टल या शहरों में कमरे लेकर पढ़ाई करते है उनकी जिन्दगी किताब छोड़ बैंक की कतारों में जा सिमटी है। मिड-डे मील की खिचड़ी भी अब गाव दर गांव कम हो रही है। और दुनिया में सबसे ज्यादा भूखे भारत की तादाद जो 19 करोड़ की है । अब इस कतार में 11 करोड़ से ज्यादा लोगों की तादाद शामिल हो चुकी है। गुरुद्वारों के लंगर में बीते 35 दिनो में तीस फीसदी का इजाफा हो चुका है । यानी आगरा मे गजक बनाने वाला हों या गया के तिलकुट बनाने वाले या फिर कानपुर में चमडे का काम हो या सोलापुर या सूरत में सूती कपडे का काम । ठप हर काम पड़ा है। पं बंगाल समेत नार्थ इस्ट में जूट का छिटपुट काम भी ठप है और असम के चाय बगानो से मजदूरो से पहले अब ठेकेदार और बगान मालिकही मजदूरों को भुगतान के डर से भाग रहे हैं। तो सवाल ये नहीं है कि 30 दिसंबर के बाद क्या कोई जादू की छड़ी काम करने लगेगी। सवाल ये है कि जिस स्थिति में देश नोटबंदी के बाद आ खड़ा हो गया है, उसमें अब रास्ता है कौन सा। क्योंकि नोटो की मांग पूरी ना कर पाने के हालात कैशलेस का राग जप रहे हैं। तो दूसरी तरफ 65 फिसदी हिन्दुस्तान में मोबाईल-इंटरनेट-बिजली संकट है तो कैशलेस कैसे होगा। और एक कतार में हर नेता के निशाने पर प्रधानमंत्री मोदी का नोटबंदी का निर्णय है लेकिन रास्ता किसी के पास नहीं है। और ये कोई अब समझने को तैयार नहीं है कि 30 दिसंबर के बाद पीएम नहीं देश भी फेल होगा। लेकिन राजनीतिक बिसात आरोपों की है तो निर्णय भी अब घोटाले के अक्स में देखा जा रहा है। तो वाकई हालात बिगड़े हैं। या बिगड रहे हैं। तो कोई भी कह सकता है तब 30 दिसंबर के बाद रास्ता होना क्या चाहिये। क्योंकि सवाल ना तो देश के सब्र में रहने का है ना ही एक निर्णय के असफल होने का। सवाल है कि अब निर्णय कोई भी सरकार क्या लेगी। क्योंकि नोटों के छपने का इंतजार रास्ता नहीं है। कैशलेस होने के लिये इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने तक के वक्त का इंतजार रास्ता नहीं है। बैंकिंग सर्विस के जरिये आमजन तक रोटी की व्यवस्था कराने की सोच संभव नहीं है। -लोगों की न्यूनतम जरुरतों को सरकार हाथ में ले नहीं सकती। शहरी गरीबो के लिये सरकार के पास काम नहीं है। और फैसले पर यू टर्न तो लिया ही नहीं जा सकता। अन्यथा पूरी इकनॉमी ही ध्वस्त हो जायेगी। तो क्या पहली बार देश उस मुहाने की तरफ जा रहा है जहा आने वाले वक्त में राजनीतिक सत्ता को ही बांधने की व्यवस्था राजनीतिक और संवैधानिक तौर पर कैसे हो अब बहस इसपर शुरु होगी। क्योंकि चुनावों की जीत-हार से कहीं आगे के हालात में देश फंस रहा है और असमंजस के हालात किसी भी देश को आगे नही ले जाते इसे तो हर कोई जानता समझता है। तो दो हालातों को समझना जरुरी है। पहला ढहती भारतीय व्यवस्था। दूसरी ढहती व्यवस्था के अक्स पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को जनता की राय मान ली जाये। तो दोनों स्थिति त्रासदीदायक है क्योंकि एक तरफ जिस मनरेगा के आसरे देश के साढ पांच करोड़ परिवारों के पेट भरने की व्यवस्था 15 बरस पहले हुई उसका मौजूदा सच यही है कि नोटबंदी ने मनरेगा मजदूरों की रीढ़ तोड़ दी है। आलम ये है कि मनरेगा के तहत अक्टूबर के मुकाबले नवंबर में 23 फीसदी रोजगार घट गया। और पिछले साल नवंबर की तुलना में तो इस बार मनरेगा में 55 फिसदी रोजगार कम रहा। और ये हाल अभी का है और इससे पहले का मनरेगा का सच ये था कि वित्तीय साल 2015-16 में कुल 5.35 करोड़ परिवारों ने मनरेगा के तहत रोजगार की मांग की लेकिन केवल 4.82 करोड़ परिवारों को ही रोजगार दिया जा सका यानी 9.9 फीसद परिवारों को मांग के बावजूद रोजगार नहीं हासिल हुआ। और ये रोजगार भी सिर्फ 100 दिन के लिए था । और अब हालात और बिगड़े हैं क्योंकि पैसा नहीं है। तो दो सवाल सीधे हैं कि देश के करोडो मजदूरों के पास अगर काम ही नहीं होगा तो वो जाएंगे कहां ? और अगर काम बिना खाली पेट सरीखे हालात बने तो क्या आने वाले दिनों में अराजकता का माहौल नहीं बनेगा? जवाब कम से कम सरकार के पास नहीं है अलबत्ता इंतजार चुनाव का ही हर कोई करने लगा है। क्योंकि देश चौराहे पर तो खड़ा है। एक तरफ नोटबंदी पर ईमानदारी के दावे । दूसरी तरफ नोटबंदी से परेशान कतार में खडा देश । तीसरी तरफ संसद के भीतर बाहर घोटाले की तर्ज पर नोटबंदी को देखने मानने पर हंगामा। और चौथी तरफ पांच राज्यों के विधानसभा की उल्टी गिनती। और अब सवाल ये कि क्या यूपी, उत्तराखंड, पंजाब , गोवा और मणिपुर में चुनाव मोदी के नोटबंदी के फैसले पर ही हो जायेगा। क्योंकि हालात बताते हैं कि खरगोश से भी तेज रफ्तार से देश चल पड़े तो भी अप्रैल बीत जायेगा। और चुनाव आयोग संकेत दे रहा है कि चुनाव फरवरी में ही निपट जायेंगे। तो क्या प्रधानमंत्री मोदी का सबसे बडा जुआ या कहें दांव पर ही देश चुनाव में फैसला करेगा। यानी ईमानदारी का राग सही या गलत । भ्रष्टाचार राजनीति का ही पालापोसा बच्चा है या नहीं। नोटबंदी से क्रोनी कैपटिलिज्म की जमीन खत्म हो जायेगी या नहीं। नोट बदलने से ब्लैक-मनी खत्म हो जायेगी या नहीं। या फिर चुनाव की हार जीत से गरीब देश फिर हार जायेगा। यानी पहली बार देश की इकनॉमी से राजनीतिक खिलवाड़ हो रहा है और आज संसद तो कल विधानसभा चुनाव इसकी बिसात के प्यादा साबित होंगे। और परेशान देश में जीत उसी राजनीति की होगी जिसने देश को खोखला भी बनाया और खोखले देश को ईमानदारी से भरने का राग भी अलापा। पहले सिस्टम करप्ट था अब करप्शन ही सिस्टम तो नहीं हो चला ? वेल्लूर 24 करोड़ तो दिल्ली 15 करोड़ 65 लाख। चेन्नई 10 करोड़ तो चित्रदुर्ग 5 करोड़ 70 लाख। गोवा डेढ़ करोड़ और उसके बाद मुंबई से लेकर कोलकाता और जयपुर से लेकर पुणे तक और गाजियाबाद से लेकर गपडगांव यानी गुरुग्राम तक लाखों के नये नोट जब्त किये गये हैं। और देश के सिर्फ 16 हीनहीं बल्कि 32 जगहों से जो अवैध नये नोटों को पकड़ने का सिलसिला जारी है या कहे 500 और 2000 के नये नोट निकल कर सामने आये हैं, उसमें सवाल यही बड़ा है कि पकड़ने वालों की पीठ थपथपायी जाये या फिर नोट पहुंचाने वालों को सजा दी जाये। संयोग से जिन्होने नोट पहुंचाये और जिन्होंने नोट पकड़े दोनों ही सरकारी मुलाजिम हैं। या कहें उसी सिस्टम का हिस्सा है जिस सिस्टम पर भरोसा कर देश को कैशलेस बनाकर बैकिंग सर्विस से जोडकर करप्शन मुक्त या कालाधन मुक्त होने का सपना देखा दिखाया जा रहा है। तो क्या ये वाकई सपना है। क्योंकि नोटबंदी से पहले जो सिस्टम था वही करप्ट था और नोटबंदी केबाद जिस साफ सिस्टम की वकालत की जा रही है उसी में करप्शन है और बैंकिंग सर्विस में भ्रष्टाचार है, इसे पीएमओ भी अगर मान रहा है और उसे स्टिंग करानेकी जरुरत पड़ रही है तो देश के तीन सच से आंखे किसी को नहीं मूंदनी चाहिये। पहला, सिस्टम ठीक तभी होगा जब देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर होगा। दूसरा, इन्फ्रास्ट्रक्चर तभी होगा जब जनता सिस्टम का हिस्सा होगी। तीसरा, जनता सिस्टम में शामिल तभी होगी जब सत्ता जनता के बीच होगी। और ध्यान दें तो अभी तक सत्ता का मिजाज जनता को सरकार के रहमोकरम पर रखने वाला है। यानी देश का किसान मानामाल नहीं हो सकता। देश का मजदूर दो जून के लिये भटकना छोड़ नहीं सकता। 70 करोड़ की आबादी के लिये सरकार के पास सिर्फ मदद या राहत पैकेज है जिसे वही सरकारी कर्मचारी या संस्थान पहुंचाते है, जो करप्ट है। तो फिर नोटबंदी के बाद सिस्टम का दायरा जब बैंकिंग सर्विस और तकनीक पर आ टिका है और नोटों के उत्पादन से ज्यादा नोटों की मांग है तो फिर सिस्टम को और ज्यादा करप्ट होने से कौन सा सिस्टम रोक पायेगा। क्योंकि नोटबंदी से पहले सिस्टम करप्ट था। नोटबंदी के बाद करप्शन ही सिस्टम हो रहा है। क्योंकि देश के एक लाख तीस हजार बैंक शाखाओं में से पांच सौ बैंकों में स्टिंग और किसी ने नहीं पीएमओ ने कराया। और खबर आ गई कि जहां जहां स्टिंग हुआ वहां वहां गड़बड़ी हुई है। तो अब उन्हें बख्शा नहीं जायेगा। यानी जो भ्रष्टाचार होना नहीं चाहिये था, वह भ्रष्टाचार देश की सफाई के लिये उठाये गये सबसे बडे कदम के दौर में वही बैक कर रहा है, जिस बैंकिंग सर्विस पर सरकार को भरोसा है कि आने वाले वक्त में यही तरीका देश को बचा सकता है । यानी भ्रष्टाचार खत्म कैसे हो इसका उपाय किसी के पास नहीं। तो क्या देश स्टिंग आपरेशन के आसरे चल सकता है। ये सवाल कल भी था और आज भी है। कल केजरीवाल के लिये ये हथकंडा था और प्रधानमंत्री मोदी के लिये। तो ये मान भी लिया जाये कि हर जगह कैमरा लगा होगा । हर जगह पर सीधे सत्ता नजर रखेगी । यानी कोई भ्रष्ट ना हो या बैक इस तरह कैश ना बांटे जैसा स्टिंग ऑपरेशन में नजर आया होगा । तो अगला सवाल है कि कैशलेस करप्शन पर रोक के लिये कौन सा स्टिंग होगा । क्योंकि जनता का ही बैंकों में जमा रुपया कारपोरेट को बांटा गया। जो कैश नहीं चैक या खातों में ट्रांसफऱ कर दिखाया जाता है और उसी कड़ी में नॉन परफोर्मिंग एसेट यानी एनपीए की राशि बीते 10 बरस में 10 लाख करोड़ से ज्यादा की हो चुकी है। तो क्या जिन बैंक मैनेजरों ने जिन राजनेताओं के कहने पर जिन कारपोरेट को करोड़ों रुपया कर्ज दिया । और जो कारपोरेट जिन राजनेताओ के कंघे पर सवार होकर बैंकों को कर्ज की रकम नहीं लौटा रहे हैं, क्या वह करप्शन नहीं है। और है तो उसके लिये कौन सा कानून किस तरह देश में काम कर रहा है। यानी मौजूदा वक्त में भी करीब सवा लाख बैंकों में क्या हो रहा है-इसका सरकार को कुछ पता नहीं या कहें कि सरकार चाहकर भी कुछ कर नहीं सकती। और अगर सरकार ये सोच रही है कि आने वाले वक्त में बैकिंग सर्विस के दायरे में समूचा दगेश होगा और बैकिंग सर्विस पर निगरानी रखकर उक्नामी के करप्शन को खत्म किया जा सकता है। तो ये नजरिया कब कैसे पूरा होगा कोई नही जानता। क्योंकि फिलहाल 97 बैंकों की 1लाख 30 हजार शाखायें देश भर में हैं और 10 बरस पहले यानी 2005 में 284 बैंकों की 70373 शाखायें देश भर में थीं। यानी दस बरस में करीब दुगनी शाखायें देश भर में खुलीं। लेकिन देश का सच यही है कि 93 फिसदी ग्रामीण भारत में बैंक है ही नहीं । शहरो में प्रति बैक शाखा औसतन 10 हजार लोग हैं। और मौजूदा वक्त में प्रतिदिन नोट बांटने की कैपिसिटी प्रति शाखा सिर्फ 500 लोग है। यानी मौजूदा सिस्टम को ही पटरी पर लाने के लिये जो इन्फ्रास्ट्रक्चर चाहिये उसमें कई गुना सुधार की जरुरकत है। और ये जरुरत कितने दिनों में कैसे पूरी होगी कोई नहीं जानता। तो अगला सवाल ये हो सकता है कि क्या स्टिंग ऑपरेशन सिर्फ ये बताने के लिये है कि सरकार काम कर रही है । क्योंकि सरकार को बखूबी मालूम है कि उसके पास वक्त सिर्फ 30 दिसंबर तक का है,क्योंकि फिर दांव पर प्रधानमंत्री मोदी का वचन होगा। ऐसे में अगर पीएम मोदी संसद में कहेंगे तो क्या कहेंगे और अगर राहुल गांधी ही संसद में कहेंगे तो क्या कहेंगे। जाहिर है बैकिंग सर्विस,तकनालाजी और कैशलेस पेमेंट के जरीये कालेधन, भ्रष्टाचार पर नकेल से आगे पीएम क्या कह सकते हैं। और राहुल गांधी नये हालातो में इन्ही सब से पैदा हुये मुश्किल हालात से आगे क्या कहेगें। यूं जब रैलियो में पीएम के तेवर के अक्स में संसद में मोदी के कहने के इंतजार करें तो मोदी सीधे देश के बिगडे हालात के लिये नेहरु गांधी परिवार को कटघरे में खडा कर सकते हैं। भ्रष्टाचार और कालेधन को आश्रय देने वाली व्यवस्था के लिये गांधी परिवार को सबसे भ्रष्ट बता सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी मुश्किल हालात में प्रदानमंत्री मोदी को नीरो करार दे सकते हैं। जो देश के जलने पर ईमानदारी की बांसुरी बजा रहे हैं । क्योंकि देश के राजनेताओ की भाषा तो फिलहाल यही हो चली है । लेकिन सवाल यह भी है कि संसद में क्या कोई नेता ये कहने की हिम्मत दिखा गा कि संसद ही जिस जमीन पर खड़ी है और उसमें बैठकर देश के नाम संबोधन का जो जुमला हर राजनीतिक दल गढ रहा है क्या उस जमीन से जमता का वाकई कुछ लेना देना है । यानी सवाल सिर्फ प्रदानमंत्री मोदी या राहुल गांधी भर का नहीं है । सवाल है कि बीते 34 दिनो में क्या किसे ने इमानदारी से संसद में बताया कि उनकी राजनीतिक पार्टी चलती कैसे है । कारपोरेट को अरबो रुपये की टैक्स रियायत क्यो दी जाती है । और गरीबो के लिये सिर्फ सरकारी पैकेज ही क्यों चलता -दौडता है ।यानी जिस कालेधन और भ्रष्टाचार की खोज नोटबंदी के बाद कतारो में खडे लोगो के मुशकिलो में टटोला जा रहा है उसके भीतर का सच यही है कि राजनीतिक व्यवस्था ने खुद को जनता के प्रति जिम्मेदार माना ही नहीं है । कारपोरेट या निजी पूंजी की इक्नामी का इन्फ्रास्ट्रक्रचर ही देश चला रहा है । सत्ता पूंजी के आसरे व्यवस्था चलाती है ना कि मानव-संसाधन के आसरे । यानी भ्रष्टाचार कौन करता है ये बताने के लिये किसी सिस्टम की जरुर नहीं है और कालाधन किसके पास है ये जानने के लिये बैंकिंग सर्विस की जरुरत भी नहीं है । जरुरत सिर्फ इस सच के साथ खड़े होने की है कि कानून और संवैधानिक संस्धान अपनी जगह अपना काम करे । जो है नहीं तो करप्शन ही सिस्टम कैसे हो जाता है ये कहां किसी से छुपा है । "5th पिल्लर करप्शन किल्लर" "लेखक-विश्लेषक पीताम्बर दत्त शर्मा " वो ब्लॉग जिसे आप रोजाना पढना,शेयर करना और कोमेंट करना चाहेंगे ! link -www.pitamberduttsharma.blogspot.com मोबाईल न. + 9414657511

Friday, December 9, 2016

Disabled man spreading message of 'Beti bachao Beti padhao'

प्रिय मित्रो !! मेरी होनहार बेटी सुकृति शर्मा ,जो आजकल "पत्रिका-राजस्थान"के नए शुरू होने जा रहे टीवी चेनेल में प्रोड्यूसर एवम एंकर के पद पर जयपुर में कार्यरत है , ने ये बड़ा ही शानदार प्रोग्राम बनाया है ! इसे आप भी देखिये और अपने मित्रों को भी दिखाइए ! अपना आशिर्वाद स्वरूप कॉमेंट भी लिखिए ! सधन्यवाद !- आपका अपना , पीताम्बर दत्त शर्मा !!

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Wednesday, December 7, 2016

हर आंख में एक सपना है...!!!

पानी, बिजली, खाना, शिक्षा, इलाज,घर, रोजगार बात इससे आगे तो देश में कभी बढी ही नहीं । नेहरु से लेकर मोदी के दौर में यीह सवाल देश में रेगते रहे। अंतर सिर्फ इतना आया की आजादी के वक्त 30 करोड में 27 करोड लोगो के सामने यही सवाल मुहं बाये खडे थे और 2016 में सवा सौ करोड के देश में 80 करोड नागरिको के सामने यही सवाल है । तो ये सवाल आपके जहन में उठ सकता है जब हालात जस के तस है तो किसी को तो इसे बदलना ही होगा । लेकिन इस बदलने की सोच से पहले ये भी समझ लें वाकई जिस न्यूनत की लडाई 1947 में लडी जा रही थी और 2016 में उसी आवाज को नये सीरे से उठाया जा रहा है उसके भीतर का सच है कया । सच यही है कि 80 लाख करोड से ज्यादा का मुनाफा आज की तारिख में उसी पानी, बिजली,खाना, शिक्षा, इलाज घर और रोजगार दिलाने के नाम पर प्राईवेट कंपनियो के टर्न ओवर का हिस्सा बन जाता है ।

यानी जो सवाल संसद से सडक तक हर किसी को परेशान किये हुये है कि क्या वाकई देश बदल रहा है या देश बदल जायेगा । उसके भीतर का मजमून यही कहता है कि 150 अरब से ज्यादा बोतलबंद पानी का बाजार है । 3 हजार अरब से ज्यादा का खनन-बिजली उत्पादन का बाजार है । 500 अरब से ज्यादा का इलाज का बाजार है । ढाई हजार अरब का घर यानी रियल इस्टेट का बाजार है ।सवा लाख करोड से ज्यादा का शिक्षा का बाजार है । अब आपके जहन में ये सवाल खडा हो सकता है कि फिर चुनी हुई सत्ता या सरकारे काम क्या करती है । क्योकि नोटबंदी के फैसले से आम आदमी कतार में है लेकिन पूंजी वाला कोई कतार में क्यो नदर नहीं आ रहा है और देश में बहस इसी में जा सिमटी है कि उत्पादन गिर जायेगा । जीडीपी नीचे चली जायेगी । रोजगार का संकट आ जायेगा । तो अगला सवाल यी है कि जब देश में समूची व्यवस्था ही पूंजी पर टिकी है । यानी हर न्यूनतम जरुरत के लिये जेब में न्यूनतम पूंजी भी होनी चाहिये और उसे जुगाडने में ही देश के 80 फिसदी हिन्दुस्तान की जिन्दगी जब इसी में खप जाती है तो फिर नोटबंदी के बाद लाइन में खडे होकर अगर ये सपना जगाया गया है कि अच्छे दिन आयेगें तो कतारो में खडा कोई कैसे कहे कि जो हो रहा है गलत हो रहा है ।

लेकिन क्या सपनो की कतार में खडे होकर 30 दिसबंर के बाद वाकई सुनहरी सुबह होगी । तो आईये जरा इसे टटोल लें । क्योकि 70 बरस में कोई बदलाव आया नहीं और 70 बरस बाद बदलाव का सपना देखा जा रहा है तो इस बीच में खडी जनता क्या सोचे । आदिवासी , दलित, महिला, किसान , मुस्लिम ,बेरोजगार । संविधान में जिक्र सभी का है । संविधान मे सभी को बराबर का हक भी है । लेकिन संविधान की शपथ लेने के बाद जब राजनीतिक सत्ता के हाथ में देश की लगाम होती है तो हर कोई आदिवाली हो या दलित । महिला हो या मुस्लिम । किसान हो या बेरोजगारो की कतार । सभी से आंख क्यो और कैसे मूंद लेता है । और चुनाव दर चुनाव वोटबैक के लिये राजनीतिक दल इन्हे एकजूट दिखाते बताते जरुर है लेकिन हर तबका अलग होकर भी ना एकजूट हो पाता है ना ही कभी मुख्यधारा में जुड पाता है । और इन सभी की तादाद मिला तो 95 फिसदी तो यही है ।मुख्यधारा का मतलब महज 5 फिसदी है । यानी जो सपने आजादी के बाद से देश को राजनीतिक सत्ताओ ने दिखाये क्या उसके भीतर का सच सिवाय देश को लूटने के अलावे कुछ नहीं रहा । क्योकि किसानो की तादाद 18 करोड बढ गई और खेती की जमीन 12 पिसदी कम हो गई । मुस्लिमो की तादाद साझे तीन करोड से 17 करोड हो गई लेकिन हालात बदतर हुये । दलित भी 3 करोड से 20 करोड पार कर गये । लेकिन जिस इक्नामी के आसरे 1947 में शुरुआत हुई उसी इक्नामी के आसरे 2016 में भी अगर देश चल रहा है तो फिर ये सवाल जायज है कि देश में किसी भी मुद्दे को कोई भी कैसे उठाये ।

समाधान निकल नहीं सकता जब तक पूंजी पर टिकी व्यवस्था को ही ना बदला जाये । यानी उत्पादन, रोजगार , नागरिको के हक और राजनीतिक व्यवस्था की लूट से लेकर मुनाफे के सिस्टम को पलटा ना जाये । तो क्या मोदी पूंजी पर टिकी व्यवस्था बदलने की सोचेगें । क्या पानी-बिजली-शिक्षा-हेल्थ से निजी क्षेत्र को पूरी तरह बेदखल कर सरकार जिम्मेदारी लेगी । यानी जो तबका कतार में है । जो तबका हासिये पर है । जो तबका निजी क्षेत्र से रोजगार पाकर जिन्दगी चला रहा है । उनकी जिन्दगी से इतर नोटबंदी को आधार कालेधन और आंतक पर नकेल कसने को बनाया गया । लेकिन भ्ष्ट्रचार, नकली नोट , आंतकी हमले भी अगर नोटबंदी के बाद सामने आये । तो क्या कहॉ जाये कि 70 बरस के दौर में पहली बार देश में सबसे बडा राजनीतिक जुआं सिर्फ यह सोच कर खेला गया कि इसके दायरे में हर वह तबका आ जायेगा जो परेशान है और कतार की परेशानी बडे सपने के सामने छोटी हो जायेगी । लेकिन ये रासता जा किधर रहा है । क्योकि इसी दौर में भ्,्ट्रचार और ब्लैक मनी का दामन साथ कैसे जुडा हुआ है ये बेगलूर में 4 करोड 70 लाख रुपये जब 2 कन्ट्रेकटर और सरकारी अधिकारी के पास से जब्त किये गये तो सभी के पास नये 2 हजार के नोट थे । वही मोहाली में तो दो हजार के नकली नोट जो करीब 42 लाख रुपये थे । वह पकड में आ गये । और गुजरात तो दो हजार रुपये के छपते ही 17 नवंबर को पोर्ट ट्रस्ट के दो अधिकारी के पास से दो लाख 90 हजार रुपये जब्त हुये ।

इन सबके बीच नगरोटा की आंतकी घटना ने भी ये सवाल खडा किया कि आंतकवाद क्या नोटबंदी के बावजूद अपने पैरो पर खडा है । यानी सवाल इतने सारे की हर जहन में वाकई ये सवाल ही है कि क्या वाकई 30 दिसबंर के बाद सबकुछ सामान्य हो जायेगा । या फिर देश में जिन चार जगहो पर नोट छपते है । -नासिक, देवास, सलबोनी , मैसूर । इन जगहो में किसी भी रफ्तार से नोट छापे जाये अगर इनकी कैपेसिटी ही हर वर्ष 16 अरब छापने की है । और नोटबंदी से करीब 22अरब नोट बंद हुये है . तो फिर हालात लंबे खिचेगें । या फिर दो की जगह चार शिफ्ट में भी काम शुरु हो जाये तो फिर जिसने नोट निकले रहे है और जितने नोट लोगो को मिल रहे है । सबकुछ सामान्य हालात में आने में कितने दिन लगेगें । ये अब भी दूर की गोटी है ।

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Friday, December 2, 2016

"मोदी जी से ,पूछे हर दिहाड़ी करनेवाला ,मेरा धन क्यों काला "?? - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक-विचारक) मो.न.- +9414657511.

परम् भक्त सूरदास जी के अनुसार , यशोमति मैया से एक बार कान्हा ने पूछा था कि हे मैया मैं काला क्यों हूँ ,तो मैया ने बड़े प्यार से उन्हें समझाया था !ठीक उसी तरह आज हर भारत वासी हमारे लोकप्रिय प्रधानमंत्री जी के नोटबन्दी कार्यक्रम का समर्थन करते हुए ,बड़ी विनम्रता से ये भी पूछना चाह रहा है कि मेरा मेहनत से कमाया हुआ धन "काला" कैसे हो गया ? कौन जिम्मेदार है इस के लिए?क्या मैं अकेला जिम्मेदार हूँ ? अगर हाँ तो मुझे आर्थिक और शारीरिक दण्ड अवश्य दिया जाए !लेकिन अगर इस सबके पीछे कंही हमारे पूर्व भृष्ट शासकों और  निक्कमी व्यवस्था  भी जिम्मेदार है तो हर उस व्यक्ति को माफ़ी मिलनी ही चाहिए जो चाहे-अनचाहे इस भ्रष्ट - व्यवस्था का हिस्सा बन गया ! उसे इतनी सज़ा ही बहुत है जितनी उसे लाइनों में लगकर खड़े होने से,और अस्पतालों में धक्के खाकर मिल चुकी है !
                         उसकी गलती केवल ये है कि वो अपनी मेहनत से कमाए हुए धन को भारत के क़ानून अनुसार आयकर विभाग को बता नहीं पाया या बैंकों में     समयानुसार जमा नहीं करवा पाया  !लेकिन आपके आदेशानुसार मोदी जी आज हर मेहनतकश ने अपनी सारी पूँजी बैंकों में जमा करवादी है !अब आपका भी ये फ़र्ज़ बनता है कि आप दस लाख तक के आदमी को आम माफ़ी प्रदान करें !आज के जमाने में दस लाख कुछ भी नहीं होते जी ! आप बड़े ही दयालु भी हो मोदी जी !मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप मेरी ये "जनहित-याचिका"पर गौर करके निर्णय सुनोगे ! 
                        इस सबके साथ मैं ये भी कहना चाहता हूँ की आज विपक्ष जी बेशर्मी से देश को नुक्सान पहुंचा रहा है जनता उसको भी मुंह तोड़ जवाब अवश्य देगी ! आने वाले काम से काम दस साल आपको ही देश की बागडोर सौंपना चाहेगी !क्योंकि आप जिस एकाग्रता से देश की सेवा कर रहे हैं जनता आपकी आभारी भी रहेगी !
                       सधन्यवाद !
                                           आपका 
                                               समर्थक-कार्यकर्ता 
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Tuesday, November 29, 2016

काश ! मोदी जी के समाजवाद का सपना सच हो जाए...??

देश के शहर दर शहर घूम लीजिये। बाजारों में चकाचौंध है। दुनिया भर के ब्रांडेड उत्पाद से भरी दुकान\मॉल हैं। देखते देखते बीते 20 बरस में भारत का बाजार इतना ब़डा हो गया कि दुनिया के बाजार में भारत के बाजार की चकाचौंध की धूम तले हिन्दुस्तान का वह अंधेरा ही छुप गया जो बाजार में बदलते भारत से कई गुना ज्यादा बड़ा था। लेकिन सच यही है हिन्दुस्तान के अंधेरे की तस्वीर कभी संसद को डरा नहीं सकी। नेताओं के ऐश में खलल डाल नहीं सकी। अंधेरे में समाया हिन्दुस्तान अपनी मौत लगातार मरता रहा। और इनकम और कैलोरी की लकीर पर खड़ा होकर गरीबी की रेखा को पार करने के लिये ही छटपटाता रहा। तो हिन्दुस्तान की इस दो तस्वीरों को पाटने के लिये ही क्या नोटबंदी का जुआ प्रदानमंत्री मोदी ने चला है। या फिर उस राजनीति को साधने के लिये यह जुआ खेला, जिसमें वोटबैक जाति-धर्म की लकीर को छोड़ दें। यानी एक तरफ 45 करोड उपभोक्ता। जो दुनिया के किसी भी विकसित देश से कहीं ज्यादा। दूसरी तरफ 80 करोड भूख से बिलबिलाते नागरिक। जो दुनिया के कई देशो को खुद में समा लें। तो पहली बार खरीदारों या कन्ज्यूमर के हाथ बंध गये हैं। चकाचौंध बाजार की रईसी थम गई है। खरीद कम हो गई है ।

तो हर जहन में सवाल है कि क्या बाजार अर्थव्यस्था के दिन पूरे हो गये। यानी फिक्की और पीड्ल्यूसी की सितहबंर की रिपोर्ट जो भारत के बाजार को 2020 तक 3.6 ट्रिलियन डॉलर यानी 240 खरब रुपये की देख रहे थे । वह अब ढहढहाकर गिर जायेगी। क्योंकि भारत के उपभोक्ताओ की ताकत को दुनिया के बाजार में कंजमशन की हिस्सेदारी 5.8 फीसदी तक देखी जा रही थी । तो क्या वाकई भारत 80 करोड की गरीबी को ढोने के लिये बाजार अर्थव्यस्था की कमाई को उठाये हुआ था। या फिर भारत को बाजार में बदलने की जो सोच 1991 से चल रही थी, उसे बदलना पलटना इसलिये जरुरी था क्योंकि भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत पश्चिमी इकनॉमी को अपनाने की इजाजत देती नहीं है। इसीलिये संसद के सरोकार तक देश से मेल नहीं खाते है। कानूनी व्यवस्था तक में 80 करोड नागरिकों के लिये कोई जगह नहीं है। शिक्षा-स्वास्थ्य। बिजली -पानी। तक कन्जूयमर के लिये है लेकिन 80 करोड़ नागरिकों के लिये कुछ भी नहीं है। तो क्या प्रधानमंत्री मोदी का कदम सफल हो या असफल देश हमेशा के लिये एक ऐसे चक्र में जा खड़ा हुआ है, जहां से आगे का रास्ता अब मौजूदा हिन्दुस्तान में व्यापक बदलाव लायेगा ही। तो आइए देखते हैं अगर हिन्दुस्तान बदलेगा तो आने वाला हिन्दुस्तान होगा कैसा। लोकतंत्र का मंदिर ही माना जाता है संसद को। लेकिन ये भी अजीब बिडंबना है कि देश की ये एकमात्र इमारत है जो वोट लेने के लिये समूचे देश की नुमाइन्दगी करती है लेकिन उसके अपने सरोकार हिन्दुस्तान के नागरिकों से ही मैच नहीं करते। इतनी ही नहीं लोकतंत्र के इस मंदिर में बैठे सांसदों की आय किसी भी कारपोरेट या किसी भी जनहित वाली इमारत से कहीं ज्यादा महंगी है।

तो दो सवाल आपके जहन में आयेंगे। पहला, कैसे जनता के दर्द को ये बांट सकते है और अगर जनता के दर्द को ये आजादी के बाद से ही बांट नहीं पाये तो फिर दूसरा सवाल-क्या वक्त आ गया है कि उनकी जरुरतों की सीमायें बांध दी जाये। यानी नोटबंदी के बाद अगर उपभोक्ताओं की राशनिंग हो गई। तो नेताओं और सांसदो की राशनिंग क्यों नहीं होनी चाहिये । सांसदों को भी देशहित में सेवक की तर्ज पर क्यों नहीं रहना चाहिये । यानी लुटियन्स की दिल्ली जो सबसे महंगी है वहां रहने वाले मंत्री या संवैधानिक संस्थानों के प्रमुखों के लिये देश का इतना पैसा क्यो व्यर्थ हो। मसलन -पीएम का घर यानी 7 रेसकोर्स ही छह घरो को मिलकर बनाया गया है। बंगला नं 1,3,5,7, 9 और 11 को मिलकर बनाये गये पीएम निवास करीब सौ एकड़ में फैला हुआ है । जबकि घर की इमारत सिर्फ 12 एकड़ में है । वहीं राष्ट्र्पति का निवास 4 हजार एकड़ में फैला हुआ है । जबकि तीन सौ कमरे का राष्ट्रपति के घर का फ्लोर एरिया 2 लाख स्कॉयर फीट है । इसी तर्ज पर दुनिया का सबसे महंगा इलाका लुटियन्स की दिल्ली में मंत्रियों और संवैधानिक सस्थानों के प्रमुखों के घर भी औसतम 12 एकड़ में फैले हुये हैं। जाहिर है रहने के तौर तरीके अंग्रेजों के दौर के ही हैं। तो फिर आजादी के बाद जब भ्रष्टाचार का कच्चा चिट्टा खोलने का जिक्र हो रहा है और देश में गरीबों का जिक्र हो रहा है तो फिर ये क्यों ना मान लिया जाये कि सत्ता और राजनेताओं की रईसी भी अब खत्म होगी। जो कि जनता और देश के पैसे की खुली लूट है। और इस दायरे को अगर बड़ा करें तो फिर करोड़पति सांसद और करोड़पति विधायकों की जो लंबी फौज है, क्या वह राजनीति में आने से पहले भी करोड़पति थे। एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि 72 फिसदी नेता का करोड़पति होना सत्ता में आने के बाद हो पाता है। 44 फिसदी लोग नेतागिरी शुरु करने के बाद करोड़पति हो जाते हैं। देश के 34 फिसदी नेताओं के अपने धंधे होते हैं। तो क्या नोटबंदी का मंथन अब देश में बराबरी ककहरा सुना पायेगा। क्योकि देश बदलेगा तो फिर करोडों स्वाहा कर होने वाले चुनाव के तौर तरीके भी बदल जायेंगे। क्योंकि याद कीजिये 2014 के लोकसभा चुनाव को। चुनाव आयोग ने 38 अरब 70 करोड खर्च किये तो राजनीतिक दलों ने पैंतिस अरब रुपये। इसके अलावा करोडों- अरबों रुपया कालाधन कैसे चुनाव के वक्त फूंका जाता है ये 1993 में वोहरा कमेटी की रिपोर्ट में खुले तौर पर कह दिया गया था कि कैसे ब्लैक मनी . करप्शन का पैसा और अपराधियो का मनी पावर भी चुनाव में जुड जाता है । तो क्या 2019 तक आते आते चुनाव के तौर तरीके बदल जायेंगे। यानी जब बाजार अर्थव्यवस्था ही ढह जायेगी तो फिर कारपोरेट और उद्योगपति राजनीतिक दल को चंदा क्यों देंगे। और जब कैशलैस समाज बनाने की दिशा में मोदी सरकार बढ़ चुकी है । तो फिर चुनाव के लिये एवीएम मशीन की जरुरत क्यों होगी। एप के जरीये या अलग अलग तरह के कार्ड के जरीये लोग घरों में बैठकर ही वोट क्यों नहीं पायेंगे। यानी चुनाव आयोग को चुनाव ने 2014 के चुनाव में जिस तरह 3870 करोड रुपये खर्च किये और उसके अलावा सुरक्षा बंदोबस्त, रेलवे का खर्चा, राज्यों में सुरक्षा का बाकि खर्चा । ये सभी खत्म हो जायेगा। क्योंकि चुनावी खर्च भी बढ़ रहा है और चुनाव लड़ने में जितना खर्चा उम्मीदवार करते है उससे लगता यही है कि अगर आप करोड़पति नहीं है तो चुनाव लड ही नहीं सकते है । क्योकि हर चुनाव इतना महंगा हो चला है कि अगर वह कालाधन ना हो या क्रोनी कैपटलिज्म का हिस्सा ना हो तो भारत अमेरिका से ज्यादा रईस लगेगा । लेकिन सच तो यही है कि चुनाव ही वह तंत्र है जब कालाधन बाहर निकलता है । अपराधी, कारपोरेट सभी अपने भ्रष्टाचार का बंदरबांट राजनीतिक दलों के साथ करते हैं। एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 2006 से 2016 के दौरान 8163 उम्मीदवारों की औसत संपत्ति एक करोड़ 57 लाख रुपये थी। चुने गये 596 सासंद विधायकों की औसत संपत्ति 5 करोड 45 लाख रुपये थी । यहीं से सवाल पैदा होता है कि क्या कैशलैस समाज की कोशिशों का एक सिरा वर्चुअल इलेक्शन से भी जुड़ता है। क्योंकि-इंटरनेट और मोबाइल एप्लीकेशन के आसरे मोदी जिस तरह कैशलैस समाज बनाने की कोशिश कर रहे हैं, और प्रधानमंत्री कार्यालय के कर्मचारियों तक को तकनीक की ट्रेनिंग देकर बताने की कोशिश की जा रही है कि भविष्य मोबाइल एप्लीकेशंस का ही है तो क्या मोदी का नया मंत्र वर्चुअल इलेक्शन भी होगा। 

वर्चुअल इलेक्शन यानी न लंबी कतारों का झंझट, न फर्जी वोटों का खतरा, न ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप, न पोलिंग स्टेशनों पर धमकाए जाने की खबरें और वोटरों को प्रभावित करने के लिए लाखों का पेट्रोल फूंकती उम्मीदवारों की गाड़ियां। क्योंकि-वर्चुअल इलेक्शन होंगे तो चुनाव इंटरनेट और मोबाइल एप्लीकेशंस के जरिए ही होंगे। यानी आप अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर या ईमेल या ऐसी ही किसी व्यवस्था से सीधे घर बैठे वोट कीजिए । अब सवाल ये कि क्या 2019 के चुनाव में वर्चुअल इलेक्शन का हाईटेक प्रयोग किया जा सकता है ? दरअसल,इंटरनेट से वोटिंग का सवाल कोई नया नहीं है। सवाल है बुनियादी ढांचे का। और जिस तरह कैशलैस सोसाइटी बनाने की कवायद की जा रही है-उसमें मोदी इवोल्यूशन के बजाय रिवोल्यूशन का रास्ता तो अपना ही चुके हैं। और रिवोल्यूशन का मतलब ही है बड़े बदलाव। और इस बड़े बदलाव में यह भी संभव है कि झटके में चुनावी प्रचार पर पाबंदी लगाकर उसे इंटरनेट एप्लीकेशंस से ही जोड़ दिया जाए। यानी -चुनावी पार्टियों से कहा जाए कि वो सिर्फ अपने चुनावी विज्ञापन अपनी वेबसाइट या सोशल साइट्स पर दिखा सकते हैं । देश में अभी 100 करोड़ से ज्यादा मोबाइल फोन हैं, और करीब 46 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर्स और ये संख्या तेजी से बढ़ रही है। अगर ये सब बदल रहा है तो फिर गांव भी बदलने चाहिये और राजनीति को गांव की जिम्मेदारी से मुक्त कर देना चाहिये। क्योंकि जिस आदर्श ग्राम परियोजना के आसरे पीएम गांवो का हाल सुधारना चाहते थे-उसका दूसरा सच यह है कि 795 में से जिन 87 सांसदों ने दूसरा गांव गोद भी लिया उनके जरीये पहला गांव भी जर्जर ही है। तो फिर सांसदों को सांसद निधि का पैसा दिया ही क्यों जाये। यानी सांसद कोई जिम्मेदारी पूरी करते नहीं और गांवों के हालात को ठीक करना है तो सालाना 39 अरब 50 करोड रुपये जो प्रति सांसद को पांच करोड़ रुपये के हिसाब से बांटा जाता है उसे बंद कर दिया जाये। और किसी कंपनी या कारपोरेट को हर बरस 39 अरब रुपये देकर जर्जर गांवों को ठीक करने का जिम्मा सौप दिया जाये तो कही ज्यादा बेहतर होगा। क्योंकि राजनेताओं का सच तो ये हो चला है कि उनके भीतर के समाजसेवी और बिजनैसमैन का फर्क अब मिट चुका है। आलम ये है कि लोकसभा में 128 सांसद बिजनेस मैन भी है। राजयसभा में 125 सांसद बिजनेस मैन है । देश भर के 4228 विधायको में 1258 विधायक ऐसे है, जिनका अपना अलग धंधा भी है । तो कल्पना किजिये नोटबंदी के बाद किस धंधे या किस बिजनेस मैन पर कितना असर पड रहा होगा । और देश के चुने हुये नुमाइन्दों को क्या वाकई जनता से कुछ लेना देना भी है । और सांसदों या विधायको के बिजनेस मैन की कैटगरी में कारपोरेट इंडस्ट्रिस्ट से लेकर बिल्डर और कालेज स्कूल अस्पताल चलाने से लेकर होटल चलाने वाले राजनेता भी है। तो आने वाले वक्त में क्या धंधेबाजों की नेतागिरी बंद हो जायेगी। या पार्टियां उन्हें ही टिकट देगी जो वाकई समाजसेवी होगा । क्योंकि बिजनैसमैन समाजसेवी तो नहीं ही हो सकता है। तो क्या मोदी जी का समाजवाद वाकई कोई गुल खिलायेगा या उडन-छू हो जायेगा।

"5th पिल्लर करप्शन किल्लर" "लेखक-विश्लेषक पीताम्बर दत्त शर्मा "
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Monday, November 28, 2016

भ्रष्ट सिस्टम और ब्लैक मनी पर टिकी राजनीति से सफाई कैसे होगी ?

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गुरुवार के दिन राज्यसभा मेंप्रधानमंत्री मोदी को नोटबंदी पर चेतावनी दी। और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कभी गंभीर हुये कभी मुस्कुराये। और भोजनावकाश के बाद विधान पर टिके राज्यसभा का ही डिब्बा गोल हो गया क्योंकि सदन में पीएम नहीं पहुंचे। तो ऐसे में पूर्व पीएम ने भी नहीं सोचा कि सदन में आलथी पालथी मारकर तबतक बैठ जाये जब तक संकट में आये देश के निकलने का रास्ता पीएम मोदी आकर ना बताये। एक ने कहा। दूसरे ने सुना। और संसद ठप हो गई । तो 62 करोड़ नागरिक जो गांव में रहते है और करीब 29 करोड नागरिक जो शहरों की मलिन बस्स्तियों और झोपडपट्टियों में रहते हैं, उनकी जिन्दगी से तो जीने के अधिकार शब्द तक को छीना जा रहा है उस पर कब कहां किसी पीएम ने बात की। और 90 करोड़ नागरिकों से ज्यादा के इस हिन्दुस्तान का सच तो यही है कि न्यूनतम की जिन्दगी भी करप्शन और नाजायज पैसे पर टिकी है। गांव में हैडपंप लगाना हो। घर खरीदना हो । रजिस्ट्री करानी हो। सरकार की ही कल्याणकारी योजनाओं का पैसा ही बाबुओं से निकलवाना हो। बैंकों के जरीये सरकार के पैसे को बांटना हो। यानी जहां तक जिसकी सोच जाती हो वह सोच सकता है और खुलकर कह सकता है कि बिना कुछ ले देकर क्या कोई काम वाकई इस सिस्टम में होता है। दिल्ली में ही लाल डोरा की जमीन हो या जायज जमीन पर मकानबनाने का काम शुरु करना। पुलिस से लेकर इलाके के नेता वसूली के लिये कैसे टूट पड़ते हैं। किससे छुपा है। हर विभाग का एनओसी कितने में बिकता है, रेट तक तय है। नोटबंदी के दौर में टोल फ्री चाहे हो लेकिन दिल्ली से लेकर हर राज्य में पुलिसिया वसूली जारी है। ये सिस्टम ना चेक पर चलता है । ना क्रेडिट या डेबिट कार्ड पर। और यह सिस्टम चलता भी क्यों है, इस पर भी कोई पीएम तो दूर कोई मंत्री या नेता बोलना नहीं चाहता। लेकिन नोटबंदी के सवाल ने हर किसी को आम आदमी के दर्द से ऐसे जोड दिया है कि हर का सुर एक है। चाहे दोनों खिलाफ क्यों ना हो। जैसे यूपी में मायावती और मुलायम । तो क्या मायावती नोटो के हार को भूल गई। क्या शानदार दृश्य था। और समाजवादी भूल गये कैसे साइकिल की सवारी से दो करोड़ की बस के सफर पर अखिलेश यादव चुनाव प्रचार में निकल पड़े। 2012 में साइकिल पर यूपी में घूमे तो सत्ता मिली। और सत्ता दुबारा चाहिये तो साइकिल की तस्वीर दो करोड़ की बस पर लगाकर बुंदेलखंड सरीखे इलाके में भी जाने में परहेज नहीं।

जहां दो जून की रोटी अब भी सवाल है। यानी एक तरफ नेताओ के लिये भरे पेट जनता के सरोकार से जुडने की ऐसी वकालत है, जिसमें जीडीपी पर संकट दिखायी दे रहा है। लड़खड़ाती बाजार व्यवस्था नजर आ रही है। व्यापार ठप होने से माथे के बल पड रहे हैं। लेकिन इस महीन लकीर का जिक्र करने से हर कोई बच रहा है कि देश में संकट संसाधनों के खत्म होने से ही ये हालात बने हैं। इसीलिये पीएम ने रिजर्व बैक के अधिकार तक को हड़प लिया। तो फिर ऐसा सिस्टम बनाया किसने जिसमें सुप्रीम कोर्ट के वकील अरबपति हो गये। प्राइवेट अस्पताल चलाने वाले खरबपति हो गये। प्राइवेट शिक्षा संसाधन चलाने वाले अरबो खरबो के मालिक हो गये। इन्हें पैसा देता कौन है। और जो देता है वह है कौन। ये कहां किसी से छिपा है। हर पीएम जानता है। हर सरकार को इसकी जानकारी है। इसीलिये तो सुप्रीम कोर्ट तो दूर हाईकोर्ट तक क्यों कोई आम आदमी अपना केस नहीं लड़ पाता। बिना इश्योरेंस प्राइवेट अस्पताल में आम जनता इलाज नहीं करा पाती। निचली अदलत के चक्कर और बिना इश्योरेंस प्राइवेट अस्पताल मे इलाज किसी आम जनता के लिये घर-बार बेचने सरीखा हो जाता है। और यह पूरा खेल नकदी का है। तो क्या ये खेल नोटबंदी के 50 दिन के दर्द-परेशानी को सहने के बाद खत्म हो जायेगा। अगर प्रधानमंत्री मोदी भरोसा दिलाते है । हां खत्म हो जायेगा तो शायद हर कोई देश बदलने को तैयार है । लेकिन खत्म होगा नहीं । और ईमानदार भारत बनाने की भावनाओं के उभार का ये खेल है तो फिर ये भी मान लीजिए अंधेरा वाकई घना है । क्योंकि याद कीजिये ठीक 25 बरस पहले वीपी सिंह स्वीस बैंक का नाम लेते तो सुनने वाले तालियां बजाते थे। और 25 बरस बाद नरेन्द्र मोदी ने जब स्विस बैंक में जमा कालेधन का जिक्र किया तो भी तालियां बजीं। नारे लगे । 25 बरस पहले स्विस बैंक की चुनावी हवा ने वीपी को 1989 में पीएम की कुर्सी तक पहुंचा दिया। और ध्यान दें तो 25 बरस बाद कालेधन और भ्रष्टाचार की इसी हवा ने नरेन्द्र मोदी को भी पीएम की कुर्सी पर बैठा दिया। 25 बरस पहले पहली बार खुले तौर पर वीपी सिंह ने बोफोर्स घोटाले के कमीशन का पैसा स्विस बैंक में जमा होने का जिक्र अपनी हर चुनावी रैली में किया। हर मोहल्ले। हर गांव। हर शहर की चुनावी रैली में वीपी के यह कहने से ही सुनने वाले खुश हो जाते कि बोफोर्स घोटाले के कमीशन का पैसा कैसे स्विस बैंक में चला गया और वीपी पीएम बन गये तो पैसा भी वापस लायेंगे और कमीशन खाने वालो को जेल भी पहुंचायेंगे। तब वोटरों ने भरोसा किया। जनादेश वीपी सिंह के हक में गया। लेकिन वीपी के जनादेश के 25 बरस बाद भी बोफोर्स कमीशन की एक कौडी भी स्विस बैंक से भारत नहीं आयी। तो क्या 25 बरस बाद स्वीस बैक में जमा कालेधन से फिसल कर प्रधानमंत्री मोदी ने देश में जमा कालेधन का जिक्र कर जब नोटबंदी का शिकंजा कसा तो झटके में वही बाजार व्यवस्था आ गई जिसपर देश ही नहीं सियासत भी चल रही है । क्योंकि देश की इकनॉमी चलाने वाले राजनीति, कारपोरेट, औघोगिक घराने , बिल्डर से लेकर खेल और सिनेमा तक के घुरघंर है । इतना ही नहीं ड्रग, घोटाले, अवैध हथियार से लेकर आंतक और उग्रवाद तक की थ्योरी के पीछे बंधूक की नली से निकलने वाली सत्ता भी अगर कालेधन पर जा टिकी हो तो फिर नकेल कसने का तरीका नोटबंदी से कैसे निकलेगा । क्योंकि इनका कालाधन रुपये पर नहीं डॉलर पर टिका है। देश के नही दुनिया के बाजार में घुसा हुआ है। खनन से लेकर रियल इस्टेट का धंधा देश के बाहर कही ज्यादा आसान है। तो क्या कालेधन का सवाल राजनीतिक सत्ता के लिये किसी फिल्म के सुपर हिट होने सरीखा है। क्योंकि मोदी सरकार ने जिन 627 कालेधन के बैंक धारकों के नाम सुप्रीम कोर्ट को सौंपे हैं। उन नामों को भी स्विस बैंक में काम करने वाले एक व्हीसिल ब्लोअर ने निकाले । जो फ्रांस होते हुये भारत पहुंचे। 

और इन्हीं नामों को सामने लाया जाये इसपर पहले मनमोहन सरकार तो अब मोदी सरकार उलझी है। ध्यान दें तो वीपी सिंह के दौर में भी सीबीआई ने बोफोर्स जांच की पहल शुरु की और मौजूदा दौर में भी सुप्रीम कोर्ट ने 627 खाताधारकों के नाम सीबीआई को साझा करने का निर्देश देकर यह साफ कर दिया कि कालाधन सिर्फ टैक्स चोरी नहीं है बल्कि देश में खनन की लूट से लेकर सरकार की नीतियो में घोटाले यानी भ्रष्टाचार भी कालेधन का चेहरा है। जिसका जिक्र नोटबंदी के बाद से मोदी सरकार के मंत्री लगातार संसद के भीतर मनमोहन के दौर के घोटालो का जिक्र कर कह रहे है । ऐसे हालात में अगर कालेधन के इसी चेहरे को राजनीति से जोडे तो फिर 1993 की वोहरा कमेठी की रिपोर्ट और मौजूदा वक्त में चुनाव आयोग का चुनाव प्रचार में अनअकाउंटेड मनी का इस्तेमाल उसी राजनीतिक सत्ता को कटघरे में खडा करती है जो सत्ता में आने

के लिये स्वीस बैंक का जिक्र करती है और सत्ता में आने के बाद स्वीस बैंक को एक मजबूरी करार देती है । यह सवाल इसलिये बडा है क्योकि कालाधन चुनावी मुद्दा हो और कालाधन ही चुनावी प्रचार का हिस्सा बनने लगे तो फिर कालाधन जमा करने वालो के खिलाफ कार्रवाई करेगा कौन । दूसरा सवाल जब देश की आर्थिक नीतियां ही कालाधन बनाने वाली हो तो फिर व्यवस्था का सबसे बडा पाया तो राजनीति ही होगी।

Thursday, November 24, 2016

"प्रधानमंत्री जी हाज़िर हों "$$$$$ !!- लेखक-विश्लेषक-विचारक(पीताम्बर दत्त शर्मा)मो.न. +9414657511

भारतीय संसद की सभी रीतियों व परम्पराओं को तोड़ते हुए विपक्षी नेता शिकारी कुत्तों की तरह कल से संसद को चलने नहीं दे रहे !बारी-बारी से वे राज्यसभा और लोक सभा अध्यक्ष एवम अध्यक्षा की आज्ञा के बिना खड़े होकर अपने आदेश सदन की "चेयर"को सुनाने लग पड़ते हैं !एक चुप होता है तो दूसरा खड़ा हो जाता है और दूसरा चुप होता है तो तीसरा अपनी "काँव -काँव"शुरू कर देता है !बहाना तो ये है कि भारत की जनता परेशान है लेकिन कॉमरेडों और कोंग्रेसियों की यूनियनें सहकारी बैंकों में हड़ताल भी करवा रहीं हैं क्यों ?केवल एक ही रट लगाए बैठे हैं की दोनों सदन तब चलने देंगे अगर प्रधानमंत्री जी दोनों सदनों में दोनों जगह पूरी बहस में हाज़िर रहें !
                       कोई इन मूर्खों से पूछे कि एक प्रधानमंत्री एक ही समय में दोनों सदनों की बहस कैसे सुन सकता है ?सभी प्रकार के आश्वासन राज्यसभा के नेता और उपाध्यक्ष द्वारा दिए जा चुके हैं !फिर भी ये विपक्षी बहस नहीं चलने दे रहे हैं !इनकी एक और "चालाकी"  भी सामने आ रही है , वो ये कि विपक्षी लीडर तो अपना भाषण दे चुके लेकिन सत्तापक्ष के भाषण के समय व्यवधान डाल रहे हैं क्यों ?तृणमूल कोंग्रेस के एक सांसद बोल रहे थे कि मोदी जी ऐसे भाषण देते हैं जैसे हम विपक्षी लीडर आतंकवादी या काले धन रखने वाले हैं !लेकिन जनता जानती है की आपकी करनी की वजह से जनता आपको पहचान चुकी है , मोदी जी के भाषण की वजह से नहीं , ऐसा भारत की जनता का मानना है जी !
                               बहन मायावती जी ने तो मोदी जी के सर्वे को भी गलत था दिया है !वहीँ समाजवादी के श्री नरेश अग्रवाल तो मोदी जी को आश्वासन देते नज़र आये कि "मोदी जी आपको कोई नहीं मार सकता ,आप रोइये मत उत्तर-प्रदेश में आ जाइये , वहाँ "क़ानून-व्यवस्था" बड़ी बढ़िया है , हम आपको बचाएंगे "!! इतना सुनते ही सारा सदन ऐसे हंस पड़ा जैसे किसी ने कोई चुटकुला सुना दिया हो !
                           राज्य सभा का ये हाल है तो लोकसभा में राहुल गांधी जिसे " विद्वान् "क्या हाल करेंगे सदन के नियमों का ये भगवान् ही जानता है जी ! धन्य हैं ऐसे नेताओं को अपना "वोट" देकर जिताने वाले !जय हिन्द !जय भारत !राम-राम !

                                                                             सधन्यवाद !!




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Wednesday, November 23, 2016

पंडारा बॉक्स तो मोदी ने खोल ही दिया है....!!

प्रधानमंत्री मोदी चौतरफा घिरे हैं और यही उनकी सफलता है। क्योंकि जिस नेता को केन्द्र को रखकर समूची राजनीति सिमट गई है। वह नेता जनता की नजर में भारतीय राजनीति की खलनायकी में खलनायक होकर भी नायक ही दिखायी देगा। क्योंकि राजनीतिक सत्ता को चुनौती देने की स्थिति में जनतंत्र है नहीं और राजनीतिक लोकतंत्र अपने गीत गाने के लिये वक्त-दर वक्त नायक खोज कर खुद को पाक साफ दिखाने से चूका नहीं है। तो सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस हो या वामपंथी या फिर मुलायम या मायावती, संसद में सभी की जुबां पर मोदी हैं तो सड़क पर ममता और केजरीवाल के निशाने पर भी मोदी हैं। तो मोदी का कद झटके में सियासी पायदान पर सबसे उपर है। और जो दबाव धंधे वालों से लेकर गांव-खेत में दिखायी दे रहा है, उसकी बदहाली के लिये वही राजनीति जिम्मेदार है, जिसे मोदी डिगाना चाहते हैं। तो क्या पहली बार सत्ता ही जनवादी सोच लिये भ्रष्ट पारंपरिक राजनीति को ही अंगूठा दिखा रही है। यानी इतिहास के पन्नों को पलटें तो जेपी चाहे संपूर्ण क्रांति का नारा देकर चूक गये। अन्ना हजारे चाहे जनलोकपाल की गीत गाकर चूक गये। लेकिन मोदी कालाधन का राग गाते हुये चूकेंगे नहीं क्योंकि सत्ता उनके पास है। और वह सीधे राजनीतिक सत्ताधारियों के तौर तरीकों के खिलाफ बोल ही रहे है। यानी राजनीतिक दलों की जिस कमाई पर पहले सत्ता खामोश रहती थी, अब मोदी ने उस डिब्बे को खोल दिया है। तो चिटफंड से लेकर दलाली और कैश चंदे से लेकर उघोगों को लाभ पहुंचा कर कमाई पर भी सीधे बोल है। तो क्या ये रास्ता राजनीतिक सफाई का साबित होगा। या फिर राजनीति के कटघरे में मोदी अभिमन्यु साबित होंगे। क्योंकि तीन सवाल नोटबंदी के बाद देश को डरा भी रहे हैं। पहला जब सिस्टम भ्रष्ट है तो वही सिस्टम भ्रष्टाचार को खत्म कैसे करेगा। दूसरा ,जब राजनीतिक सत्ताधारियों में लूट का समाजवाद रहा है तो मोदी का जनतंत्र कैसे काम करेगा। और तीसरा 1991 से कन्ज्यूमरइज्म यानी उपभोक्तावाद के आसरे ग्रोथ देखने वाले झटके में सोशल जस्टिस कैसे करेंगे । जाहिर है तीनों सवाल 2019 के लोकसभा चुनाव के लिये रेफरेन्डम यानी जनमत संग्रह वाले हो सकते हैं। और उससे पहले कमोवेश हर राज्य के चुनाव में मोदी इसी नोटबंदी के आसरे आसमानता का जिक्र कर चुनावी जमनत संग्रह वाले हालात बनाने की दिशा में जायेंगे भी। क्योंकि सत्ता संभालने के 30 महीने बाद मोदी जिस मुहाने पर खडे है, वहां से सत्ता बरकरार रखने की जोडतोड़ में फंसना मोदी का इतिहास के पन्नों में गुम हो जाना साबित होता। और मोदी इस सच को समझ रहे हैं कि उन्होंने जो जुआ खेला है वह है तो सही लेकिन है वह जुआ ही। जिसे अभी तक रईस खेलते रहे पहली बार आम जनता भी इस सियासी जुए में भगीदार हैं। 

लेकिन मौजूदा वक्त में अगर पीएम मोदी को क्लीन चीट दे भी दी जाये तो क्या बीजेपी या बीजेपी के साथ जुडे किसी भी चेहरे को लेकर कोई कह सकता है कि कोई दागदार नहीं है। वह चेहरा चाहे मध्यप्रदेश सीएम शिवराज से लेकर छत्तीसगढ सीएम रमन सिंह या राजस्धान की सीएम वसुंधरा राजे सिंधिया का हो। या फिर पंजाब के बादल। बिहार के पासवान , महाराष्ट्र के उद्दव ठाकरे या यूपी में बीएसपी छोड बीजेपी में शामिल हुये स्वामी प्रसाद मौर्य का। यानी चेहरे चाहे बीजेपी के हो या बीजेपी के साथ अगल अलग राज्यों में साथ खडे चेहरे। दागदार तो हर कोई है। कोई व्यापम तो कोई पीडीएस। कोई ललित मोदी। तो पंजाब, बिहार. महाराष्ट्र और यूपी में बीजेपी के साथियों  का दामन भी पाक साफ नहीं है। और मोदी की नोटबंदी के खिलाफ कतारों में खड़े

मुलायम हो या मायावती। ममता बनर्जी हो या करुणानिधि या जयललिता। जब देश में हर राजनेता का दामन दागदार है तो फिर राजनीतिक ईमानदारी का पाठ नोटबंदी के जरीये पढाया जा सकता है इसे सच माने कौन। क्योंकि मोदी खुद उस राजनीतिक तालाब में खड़े हैं, जहां कालाधन राजनीति की जरुरत है। इसीलिये बीते दस बरस में 3146 करोड़ से ज्यादा कैश राजनीतिक दलों ने चंदे के तौर पर लिया। और किसी भी राजनीतिक दल ने कैश की जानकारी चुनाव आयोग को नहीं दी । फिर चुनाव आयोग के मुताबिक 20 हजार से ज्यादा कैश लेने पर जानकारी देनी होती है। तो हर राजनीतिक दलों ने सारे कैश 20 हजार से कम बताये। यानी किसी भी राजनीतिक दल ने नहीं कहा कि कैश 20 हजार से ज्यादा लिया। मायावती ने तो नब्ब फिसदी चंदा कैश में लिया। और हर से सिर्फ 20 हजार रुपये से कम बतायें। को क्या राजनीतिक सफाई की दिशा में मोदी बढ़ रहे हैं। या फिर प्रधानमंत्री ने चाहे अनचाहे विपक्ष को ही एक ऐसा हथियार दे दिया है जो सरोकार का सवाल उठाकर अभी तक के अपने दाग को इसलिये धो सकते हैं क्योंकि जनता परेशान हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर है नहीं। निर्णय लागू कराने में सिस्टम सक्षम नहीं है। 

यानी जिस राजनीतिक व्यवस्था से लोगों का मन टूट रहा था वह मन फिर से समाधान के लिये उसी राजनीतिक व्यवस्था की तरफ देखने को मजबूर हो रहा है। जबकि जनता के पैसे पर सबसे ज्यादा रईसी राजनेता ही करते हैं। मसलन कुल 4120 विधायक और 426 एमएलसी है यानी कुल 4582 विधायक, जिन्हे औसत प्रतिमाह 2 लाख वेतन और भत्ता प्रतिमाह मिलता है  । जिसे जोड़ दें तो 91,640000 रुपये बनते हैं। यानी सालाना करीब 1100 करोड । इसी तर्ज पर अगर सांसदों का भी हाल देख लें । तो लोकसभा और राज्यसभा मिलाकार कुल 776 सांसदों को हर महीने औसतन 5 लाख रुपये वेचन और भत्ते केतौर पर मिलता है। जिसे जोड़े तो 38 करोड 80 लाख रुपये होते हैं। यानी लाना 465 करोड, 360 लाख रुपये। यानी विधायकों और सांसदों के वेतन भत्ते को मिला दे तो करीब 15 अरब 65 करोड 60 लाख रुपये होंगे। और इसमें आवास , यात्रा भत्ता, इलाज, विदेशी सैर सपाटा शामिल नहीं है। लेकिन सुविधाओं की पोटली यही खत्म नहीं होती बल्कि हर चुने हुये नुमाइन्दे को सुरक्षा चाहिये। सुरक्षा के लिहाज से हर विधायक को 2 बॉडीगार्ड और एक सेक्शन हाउस गार्ड यानी 5 पुलिस कर्मी। तो कुल 7 सुरक्षाकर्मी एक विधायक के पीछे रहते हैं। हर पुलिस कर्मी को औसतन 25 हजार रुपये के लिहाज से कुल एक लाख 75 हजार होते हैं। यानी कुल 4582 विधायकों पर 1 लाख 75 हजार के लिहाज से हर महीने 80 करोड 18 लाख रुपये होते हैं। और सालाना 9 अरब 62 करोड 22 लाख रुपये। इसी तर्ज पर अगर सांसदों की सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मियों के खर्च को जोड़ लें तो सांसदों की सुरक्षा में हर बरस 164 करोड रुपये खर्च होते हैं। इसके अलवा पीएम सीएम कुछ मंत्री और कुछ राजनेताओं को जेड प्लस की सुरक्षा मिली हो होती है, उसके लिये 16 हजार सुरक्षाकर्मियों की तैनाती देश में होती है। जिनपर सालाना खर्चा 776 करोड़ के करीब होता है। यानी कुल 20 अरब का खर्चा चुने हुये नुमाइन्दो की सुरक्षा पर होता है। यानी हर साल चुने हुये नेताओ पर 50 अरब खर्च हो जाता है। और इस फेहरिस्त में राज्यपाल, पूर्व नेताओं की पेंशन, पार्टी अध्यक्ष या पार्टी नेता या फिर जिन नेताओं को सरकारें मंत्रियो का दर्जा दे देती है, अगर उन पर खर्च होने वाला देश या कहे जनता का पैसा जोड़ दिया जाये तो करीब 100 अरब रुपया खर्च हो जाता है। अब ये ना पूछिएगा गरीबों को या जनता को ही इससे मिलता क्या है।

Saturday, November 19, 2016

संसद से नहीं बैंक से निकलेगा लोकतंत्र का नया रागsaabhaar

जब संसद सड़क के सामने छोटी लगने लगे तो फिर नेताओं का रास्ता जाता किधर है। सड़क के हालात बताते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में देश के करीब 55 करोड़ लोगों ने वोट डाले लेकिन आज की तारीख में शहर दर शहर गांव दर गांव 55 करोड़ से ज्यादा लोग सड़क पर उस नोट को पाने के लिये जद्दोजहद कर रहे हैं जिसका मूल्य ना तो अनाज से ज्यादा है और ना ही दुनिया के बाजार में डॉलर या पौंड के सामने कहीं टिकता है। फिर भी पहले वोट और अब नोट के लिये अगर सड़क पर ही जनता को जद्दोजहद करनी है तो क्या वोट की तर्ज पर नोट की कीमत भी अब प्रोडक्ट नहीं सरकार तय करेगी। क्योंकि मोदी सरकार को 31 फिसदी वोट मिले। यानी खिलाफ के 69 फिसदी वोट का कोई मूल्य संसदीय राजनीति में कोई मायने रखता ही नहीं है। ठीक इसी तरह 84 फीसदी मूल्य के नोट के खत्म होने के बाद 16 फिसदी मूल्य की रकम महत्वपूर्ण हो गई। यानी रोजाना चार हजार रकम के खर्च करने का समाजवाद सड़क पर आ गया। तो क्या समाजवाद के इस चेहरे के लिये देश तैयार हो चुका है या फिर जिस संसद की पीठ पर सवार होकर लोकतंत्र का राग देश में गाया जा रहा है, पहली बार संसदीय लोकतंत्र को ही सडक का जनतंत्र ठेंगा दिखाने की स्थिति में आ गया है। और यहीं से बड़ा सवाल निकल रहा है कि आखिर बुधवार की सुबह जब संसद शुरु होगी तब राजनीतिक सत्ता के कर्णधारों का रास्ता जायेगा किस तरफ। क्योंकि संसद का महत्व तो तभी है जब संसद में जनता के हित में कोई निर्णय है। या फिर संसद के सरोकार जनता से जुड़े। और सच यही है कि पहली बार राजनीतिक सत्ता ने संसदीय राजनीति की धारा के खिलाफ निर्णय लिया है। और नया संकट उस पारंपरिक राजनीति के सामने है जो अभी तक ये सोचती रही कि संसद के दायरे से सड़क को संभाला जा सकता है। तो सवाल तीन हैं। पहला क्या संसद छोड़ सड़क की राजनीति को थामना ही अब हर राजनीतिक दल की जरुरत है। दूसरा ,क्या संसदीय राजनीति के भीतर का भ्रष्टाचार नई परिभाषा गढ रहा है। तीसरा , क्या संसदीय राजनीति का चेहरा इतना विकृत हो चला है कि पीएम ने खुद को ही जनता के साथ जोड़ लिया है। यानी दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र का मंदिर यानी संसद ही जब सड़क के जनतंत्र को संभालने की स्थिति में नही होगा तो क्या ये कहा जा सकता है कि भारत बदल रहा है । या फिर फेल भारत सफल होने के लिये छटपटा रहा है । क्योकि बीते 70 बरस की सियासत ने दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्रिक देश को बाजार में बदल दिया है। नागरिकों को कन्ज्यूमर बना दिया है। उत्पादन से बड़ा नोट हो गया है। खेती से ज्यादा कमाई सेवा क्षेत्र ने समेट ली। और संसद की नुमाइन्दगी भी रईसों के इर्द -गिर्द घुमड़ने लगी। नीतियां पैसेवालों के लिये बनने लगी। योजनाओं के दायरे में 80 फीसदी नागरिक पैकेज पर टिक गया। 20 फीसदी उपभोक्ता के लिये बजट बनाया जाने लगा तो ऐसा फैसला चाहे अनचाहे देश को ऐसे मुहाने पर खड़ा तो कर ही गया है, जहां से हर राजनेता का रास्ता अब संसद की तरफ नहीं सडक की तरफ जाता है। क्योंकि सडक की सियासत का रास्ता अभी भी एक रुपये को महत्व देता है और संसद के भीतर 500 या दो हजार के नोट मायने रखते है। और कभी नोट को ध्यान से देखिये तो सिर्फ एक रुपये की जिम्मेदारी भारत सरकार लेती है। बाकि हर नोट पर रिजर्व बैक धारक को नोट देने का वायदा करता है। ये ठीक उसी तरह है जैसे खेत खलिहानों में किसानों को बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर मिल सके इस जिम्मेदारी की बात तो भारत सरकार करती है। लेकिन उपजाये गया अनाज की कीमत बाजार में होगी क्या ये भारत सरकार नहीं बल्कि मंडी चलाने वाले दलाल तय करते हैं। तो सोचना शुरु कीजिये आखिर क्यों देश की इकनॉमी नोटों की अर्थव्यवस्था पर चलायी जा रही है। ना कि उत्पादन। खेती और मानव संसाधन पर। आखिर ऐसे हालात क्यों बनाये जा रहे है, जहां किसान की फसल नोट के सामने बेबस है। उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवा छात्र अनपढ़ करोड़पति के सामने बेबस हैं। और अपनी ही कमाई को लेने के लिये हर नागरिक बैंक के सामने बेबस हैं। तो क्या भारत की इकनामी धीरे धीरे व्यवसायिक बैंकों की खाली खातों में रकम लिखकर और भरकर आगे बढ़ कर रही है। यानी देश को बाजार में बदलने के बाद उपभोक्ता संस्कृति का असल चेहरा अब सामने आ रहा है जब बाजारों की चकाचौंध भी दुनिया के सबसे ज्यादा उपभोक्ता वाले देश में इसलिये थम गई है क्योंकि ना दिखाई देने वाली इक्नामी यानी नोट की कीमत सोना, चादी, जमीन, घर , अनाज से भी ज्यादा कीमती हो गई है और नोट के जरीये राजनीतिक सत्ता ही जनता से सिर्फ वायदा कर रही है कि अच्छे दिन आ जायेंगे। ठीक उसी तरह जैसे नोट पर रिजर्व बैक धारक को वायदा करता है। यानी सच पर अभासी सच हावी हो चला है । और अभासी सच का हथियार है बैंकिंग सर्विस । यानी बैंकिंग सर्विस ही अब देश की इकनॉमिक सर्विस होगी, ये संकेत तो साफ हो चले हैं। तो जिस बैंक की टकटकी लगाये हर आदमी आज देश में देख रहा है उस बैंकिंग सर्विस का सच भी समझ लीजिये। क्योंकि यही वह बैंक हैं, जिनसे विजय माल्या कर्ज लेकर बिना चुकाये लंदन भाग सकते है। और यही वो बैंक है, जिनसे कर्ज लेकर ना चुकता पाने पर किसान को खुदकुशी करता है। और देश के 20-30 औघोगिक घरानों के पास बैंक का सवा लाख करोड़ से ज्यादा पड़ा है लेकिन वह बैंक को लौटा नहीं रहे और बैंक ले नहीं पा रहा। तो दो सवालो को समझना होगा। पहला, बैंकों में पैसा देश के नागरिकों का ही है। दूसरा,बैंक का 90 फिसदी पैसा सरकार या उघोगपति कर्ज पर लेते हैं। यानी आज जिस तरह जनता अपने ही रुपयों को पाने के लिये नोट बदल रही हैं। अगर देश का नागरिक सोच लें कि वह बैंकों से सारा पैसा निकाल लेगा तो क्या बैक उसे सारा पैसा देने की स्थिति में होगा। यकीनन नहीं। तो जरा बैंकिंग सर्विस के जरीये उन हालातों को समझें जहा आप एक लाख रुपये बैक में जमा कराते है । बैक उघोगो से ब्याज लेकर 90 हजार रुपये कर्ज में दे देता है। 90 हजार लौटने पर बैक 81 हजार फिर ब्याज लेकर कर्जपर दे देता है। यानी जनता के पैसे से बैक ब्याज लेकर जनता के पैसे को ही उघोगों या कारपोरेट को कर्ज देता है। बैंक की अपनी लागत कुछ नहीं होती। लेकिन बैंक का टर्न ओवर बढता जाता है। औऱ इस प्रक्रिया में रुपये की कीमत गिरती जाती है। यानी अगर लोग ये सोच लें कि कि बैंक से रुपया निकाल कर वह जमीन, सोना या अनाज ही खरीद लें तो बैक के पास इतनी रकम होगी ही नहीं। यानी जो बड़े बुजुर्ग आज बैंक की लाइन में खडे होकर अपने ही पैसों के लिये तरस रहे है अगर वह ये सोच रहे होंगे कि पहले की ठीक था। जब सामान बदलकर जिन्दगी चलती थी। तो समझना होगा कि 1933 में बैंकों ने गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म इसीलिये किया। जिससे रुपये की ताकत खत्म हो जाये। यानी पहले जितना रुपया लेकर बैक में व्यक्ति जाता था उतने का सोना-चांदी मिल जाता था। अब ये संभव नहीं है कि जितना रुपया आपने बैंकों में जमा किया उस कीमत में एक बरस बाद उतना ही सामान मिल जाये जो जमा करते वक्त था। और अगर किसी देश को रुपये की जरुरत होगी तो वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ देशों को कर्ज देते हैं। देश कर्ज ना चुका पाने की स्थिति में नोट छापते हैं। और फिर महंगाई बढती है। समाज में असमानता बढ़ती है। और माना यही जाता है कि बैंकिंग सर्विस के जरीये ही सत्ता अपने नागरिको पर और ताकतवर देश कमजोर देशों पर राजकर अपनी नीतियों को लागू कराते है । तो लोकतंत्र का नया राग संसद से नहीं बैंक से मिलने वाले नोट पर जा टिका है।

साभार सधन्यवाद !!

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2014 की कॉरपोरेट फंडिग ने बदल दी है देश की सियासत !!

चुनाव की चकाचौंध भरी रंगत 2014 के लोकसभा चुनाव की है। और क्या चुनाव के इस हंगामे के पीछे कारपोरेट का ही पैसा रहा। क्योंकि पहली बार एडीआर न...