Wednesday, September 30, 2015

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में भारी तादाद में लोगों ने सड़क पर उतरकर पाकिस्तान के ख‍िलाफ नारेबाजी की.!!!

 अवाम आजादी और बुनियादी हक की मांग कर रही थी.
बुनियादी हक दिए जाने की मांग
विरोध प्रदर्शन कर रहे लोग इलाके में विकास का काम न होने से नाराज थे. लोगों रोजगार और बुनियादी हक दिए जाने की मांग करते नजर आए.

विरोध-प्रदर्शन के बाद तनाव
PoK के कई इलाकों में इस तरह के प्रदर्शन हुए. मुजफ्फराबाद, गिलगित और कोटली सहित कई इलाकों में भारी विरोध-प्रदर्शन के बाद तनाव का माहौल है.

बेनकाब हुआ पाकिस्तान
एक तरफ पाकिस्तान कश्मीर में अलगावादियों को शह देता है, सीमा पार से आतंकियों की खेप भेजता है और भारत पर लोगों की भावनाओं को दबाने का आरोप लगाता है, दूसरी तरफ PoK में अवाम की आवाज को खामोश करने की साजिश रचता है. अब PoK के लोग पाकिस्तान की साजिश के खिलाफ सड़क पर उतर आए हैं, तो वह बेनकाब हो गया है.

पाकिस्तान की पुलिस व सेना पर जुल्म के आरोप
पाकिस्तान की बेड़ियों में जकड़े PoK की अवाम लूट-खसोट और बर्दाश्त के बाहर जुल्म के खिलाफ सड़कों पर उतर आई. गुलाम कश्मीर के बाशिंदे पाकिस्तानी पुलिस और सेना पर अपनी मां-बहनों को उठाकर कैंपों में ले जाने का सनसनीखेज आरोप लगा रहे हैं. इन कैंपों में ऐसे-ऐसे जुल्म किए जाते हैं, जिन्हें बता पाना मुश्किल है. वीडियो में लोग कहते हुए पाए गए हैं कि उनके मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन हुआ है और उनके साथ ज्यादती की गई है.

'पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है PoK'
पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों का कहना है कि कश्मीर किसी भी कानून की नजर से पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है. यह पाकिस्तान के कश्मीर की असल तस्वीर है. यह पाकिस्तान के खोखले दावे का सबूत है. सामने आया वीडियो कश्मीरियों को बरगलाने वाले पाकिस्तान को बेनकाब करता है. दुनिया में भारत के खिलाफ जहर उगलने वाले पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को दिखाता है.

ऐसे हैं PoK के हालात...
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में युवाओं के पास न तो नौकरी है, न ही आगे बढ़ने का दूसरा रास्ता. भविष्य अंधकारमय दिखता है. पाकिस्तानी उन्हें भारत के खिलाफ इस्तेमाल करना चाहते हैं. जो जिहाद में शामिल नहीं होते, उसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI उठा ले जाती है, फिर उनका कभी पता नहीं चलता. पाकिस्तानी इन्हें गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं.

विकास की तो बात ही छोड़िए, लोगों के पास बुनियादी अधिकार भी नहीं हैं. भारत में पाकिस्तान के हमदर्द माने जाने वाले अलगावादी हुर्रियत को भी देखना चाहिए कि जिसे वे अपना दोस्त मानते हैं, उसका असली चेहरा कैसा है.

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POK Protests to get rid of Pakistan
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Sunday, September 27, 2015

ज्यादा से ज्यादा भारतियों को इंटरनेट से जोड़ने की एक पहल - 1 करोड़ रेल यात्रियों प्रतिदिन से शुरुआत !! - सुन्दर पिचई, सीईओ, गूगल

जब मैं एक छात्र था, मैं चेन्नई सेंट्रल स्टेशन (तब मद्रास सेंट्रल के रूप में जाना जाता था) से आईआईटी खड़गपुर की दिन की रेल यात्रापसंद करता था । मुझे विभिन्न स्टेशनों पर उन्मत्त ऊर्जा की याद आज भी ताजा है और मैं भारतीय रेल के अविश्वसनीय स्तर और विस्तार पर अचम्भा करता था ।
आज गूगलप्लेक्स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

मुझे यह घोषणा करते हुए बहुत गर्व हो रहा है कि ये भारत के रेलवे स्टेशन हैं जो करोड़ों लोगों को ऑनलाइन लाने में मदद करेंगे । पिछले साल, भारत में 10 करोड़ लोगों ने पहली बार इंटरनेट उपयोग शुरू किया है । इसका मतलब यह है कि भारत में अब चीन को छोड़ कर हर देश से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं । पर चौंकाने वाली बात ये है की भारत में अभी भी 100 करोड़ से ज़्यादा लोग ऑनलाइन नहीं हैं । 

हम इन 100 करोड़ भारतवासियों को ऑनलाइन लाने में मदद करना चाहते हैं - ताकि उन्हें पूरे वेब तक पहुँच मिल सके, और वहां मौजूद जानकारी और अवसर भी । और किसी पुराने कनेक्शन से नहीं - तेज़ ब्रॉडबैंड से ताकि वे वेब का सबसे अच्छा अनुभव कर सकें । इसलिए आज, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के हमारे U.S. मुख्यालय में उपस्थित होने के अवसर पर, और उनकी डिजिटल इंडिया पहल के अनुरूप, हमने भारत भर में 400 रेलवे स्टेशनों में सार्वजनिक उच्च गति वाई-फाई उपलब्ध कराने के लिए एक नई परियोजना की घोषणा की है ।

हमारी पहुंच और ऊर्जा टीम की, भारतीय रेलवेज, जो कि दुनिया के सबसे बड़े रेलवे नेटवर्कों में से एक चला रही है, और रेलटेल, जो व्यापक फाइबर नेटवर्क के माध्यम से रेलवायर जैसी इंटरनेट सेवाएं प्रदान करता है, के साथ काम करते हुए आने वाले महीनों में पहले स्टेशनों को ऑनलाइन लाने की योजना है। यह नेटवर्क 2016 के अंत से पहले भारत में सबसे व्यस्त स्टेशनों में से 100 को कवर करने के लिए तेजी से विस्तार करेगा, और शेष स्टेशन उसके बाद जल्द ही कवर होंगे । 

जब सिर्फ पहले 100 स्टेशन ऑनलाइन होंगे, तब भी इस परियोजना के माध्यम से हर दिन 1 करोड़ से अधिक लोगों के लिए वाई-फाई उपलब्ध होगा। यह भारत में सबसे बड़ी सार्वजनिक वाई-फाई परियोजना होगी, और संभावित उपयोगकर्ताओं की संख्या के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी परियोजनाओं में गिनी जाएगी । यह वाई-फाई तेज़ भी होगा - भारत में अधिकतम लोग आज जो उपयोग करते हैं उसकी तुलना में कई गुना तेज़ । इस से यात्री जितनी देर इंतज़ार कर रहे हैं उतनी देर में एक उच्च परिभाषा वीडियो स्ट्रीम कर पाएंगे, अपने गंतव्य के बारे में कुछ अनुसंधान कर पाएंगे या कुछ वीडियो, एक पुस्तक या एक नया खेल डाउनलोड कर पाएंगे । सबसे अच्छी बात, यह सेवा शुरू में मुफ्त होगी, और भविष्य में इसे आत्मनिर्भर बनाने का दीर्घकालीन लक्ष्य है ताकि रेलटेल और अधिक भागीदारों के साथ अधिक स्टेशनों और अन्य स्थानों में इसका विस्तार किया जा सके । 
इस नक्शे में वो पहले 100 स्टेशन दर्शाये गए हैं जहाँ 2016 के अंत तक उच्च गति वाई-फाई होगा
हमें लगता है कि यह 30 करोड़ से अधिक भारतीय जो पहले से ही ऑनलाइन हैं और लगभग एक अरब से अधिक है जो नहीं हैं, उनके लिए इंटरनेट को सुलभ और उपयोगी बनाने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । 

पर यह सिर्फ एक हिस्सा है । अधिक भारतीयों को सस्ती, उच्च गुणवत्ता वाले स्मार्टफोन्स प्राप्त करने के लिए, जो अधिकतम लोगों के लिए इंटरनेट का उपयोग प्राथमिक तरीका है, हमने पिछले साल एंड्राइड वन फ़ोन लांच किया था । सीमित बैंडविड्थ की चुनौतियों से निपटने में मदद करने के लिए, हम हाल ही में मोबाइल वेब पृष्ठों को तेजी से और कम डेटा के साथ लोड करने की सुविधा लाये हैं,यूट्यूब ऑफ़लाइन उपलब्ध बनाया है और ऑफलाइन मैप्स जल्द ही आने वाला है ।

भारतीयों, जिनमे से कई अंग्रेजी नहीं बोलते, के लिए वेब सामग्री और अधिक उपयोगी बनाने में मदद करने के लिए और अधिक स्थानीय भाषा की सामग्री को बढ़ावा देने के लिए हमने पिछले साल भारतीय भाषा इंटरनेट एलायंस की शुरूआत की है, और हमारे उत्पादों में अधिक से अधिक स्थानीय भाषा समर्थन का निर्माण किया है - हिंदी वॉयस खोज, उन्नत हिंदी कीबोर्ड और एंड्राइड के नवीनतम संस्करण में सात भारतीय भाषाओं के लिए समर्थन में सुधार । और अंत में, सभी भारतीयों को कनेक्टिविटी का लाभ लेने में मदद करने के लिए, हमने महिलाओं, जो कि आज भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं का सिर्फ एक तिहाई भाग हैं, की मदद करने में अपने प्रयास और तेज़ किये हैं ताकि वे वेब से अधिकतम लाभ उठा सकें । 

हज़ारों युवा भारतीय हर दिन चेन्नई सेंट्रल से निकलते हैं, जैसे मैं कई साल पहले निकलता था, सीखने और जानने के लिए उत्सुक, और अवसर की तलाश में । मेरी आशा है कि यह वाई-फाई परियोजना इन सब बातों को थोड़ा आसान कर देगी । 

सुन्दर पिचई, सीईओ, गूगल 
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या........इलाहा इल्लाह !!! कातिल भी ‪#‎मुसलमान‬, और मकतूल भी #मुसलमान.!!!

या अल्लाह
सोचता हूँ कि ‪#‎परिन्दे‬ क्यू नही आते,
‪#‎कंकर‬ क्यू नही गिराते.
देखता हूँ कि ‪#‎बन्दूक‬ उठती है,गोली चलती है,
चलाने वाले की आवाज़ आती है.
‪#‎ला_इलाहा_इल्लल्लाह‬...
‪#‎गोली‬ जिस्म के पार हो जाती है,
मरने वाले की सदा आती है.
#ला_इलाहा_इल्लल्लाह....
परिंदे क्यू नही आते,
कंकर क्यू नही गिराते.
जब ‪#‎कातिल‬ का भी वही ‪#‎नारा‬,
जो ‪#‎मकतूल‬ का नारा.
कातिल का भी वही ‪#‎काबा‬,
जो मकतूल का काबा.
कातिल का भी वही ‪#‎रब‬,
जो मकतूल का रब.
कातिल का भी वही ‪#‎मज़हब‬,
जो मकतूल का मज़हब.
कातिल का भी वही ‪#‎ईमान‬,
जो मकतूल का ईमान.
कातिल का भी वही ‪#‎कुरान‬,
जो मकतूल का कुरान.
कातिल भी ‪#‎मुसलमान‬,
और मकतूल भी #मुसलमान.
कातिल कहलाये ‪#‎मुंसिफ‬,
और मकतूल ‪#‎शहीद‬.
तो #परिन्दे किसकी मदद को आयें,
#कातिल की या #मकतूल की.
#कंकर किस पर गिराये,
#कातिल पर या #मकतूल पर.
हाँ हाँ,,
परिंदे इसीलिए नही आते,
कंकर नही गिराते..
क्युँकि,
‪#‎ज़ालिम‬ भी #मुसलमान,
और ‪#‎मज़लूम‬ भी #मुसलमान.....



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Thursday, September 24, 2015

मीडिया समझ ले , सत्ता ही है पूर्ण लोकतंत्र और पूर्ण स्वराज - साभार - श्री पुण्य प्रसन्न वाजपेयी


तो मौजूदा दौर में मीडिया हर धंधे का सिरमौर है। चाहे वह धंधा सियासत का की क्यों ना हो। सत्ता जब जनता के भरोसे पर चूकने लगे तो उसे भरोसा प्रचार के भोंपू तंत्र पर ही होता है। और प्रचार का भोंपू तंत्र कभी एक राह नहीं देखता। वह ललचाता भी है । डराता भी है । साथ खड़े होने को कहता भी है। साथ खड़े होकर सहलाता भी है और सिय़ासत की उन तमाम चालों को भी चलता है, जिससे समाज में यह संदेश जाये कि जनता तो हर पांच बरस के बाद सत्ता बदल सकती है। लेकिन मीडिया को कौन बदलेगा। तो अगर मीडिया की इतनी ही साख है तो वह भी चुनाव लड़ ले । राजनीतिक सत्ता से जनता के बीच दो दो हाथ कर ले। जो जीतेगा उसी की जनता मानेगी। इस अंदाज को 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने कहना चाहा। मोदी सरकार ने अपनाना चाहा। इसी राह को केजरीवाल सरकार कहना चाहती है। अपनाना चाहती है । और पन्नों को पलटें तो मनमोहन सरकार में भी आखिरी दिनों यही गुमान आ गया था जब वह खुलै तौर पर अन्ना आंदोलन के वक्त यह कहने से नहीं चूक रही थी कि चुनाव लड़कर देख लीजिये। अभी हम जीते हैं तो जनता ने हमें वोट दिया है, तो हमारी सुनिये । सिर्फ हम ही सही हैं। हम ही सच कह रहे हैं । क्योंकि जनता को लेकर हम ही जमींदार हैं। यही है पूर्ण ताकत का गुमान । यानी लोकतंत्र के पहरुये के तौर पर अगर कोई भी स्तंभ सत्ता के खिलाफ नजर आयेगा तो सत्ता ही कभी न्याय करेगी तो कभी कार्यपालिका, कभी विधायिका तो कभी मीडिया बन कर अपनी पूर्ण ताकत का एहसास कराने से नहीं चूकेगी। ध्यान दें तो बेहद महीन लकीर समाज के बीच हर संस्थान में संस्थानो के ही अंतर्विरोध की खिंच रही है।

दिल्ली सरकार का कहना है, मानना है कि केन्द्र सरकार उसे ढहाने पर लगी है । बिहार में लालू यादव को इस पर खुली आपत्ति है कि ओवैसी बिहार चुनाव लड़ने आ कैसे गये। नौकरशाही सत्ता की पसंद नापसंदी के बीच जा खड़ी हुई है । केन्द्र में तो खुले तौर पर नौकरशाह पसंद किये जाते हैं या ठिकाने लगा दिये जाते हैं लेकिन राज्यो के हालात भी पसंद के नौकरशाहों को साथ रखने और नापसंद के नौकरशाहों को हाशिये पर ढकेल देने का हो चला है। पुलिसिया मिजाज कैसे किसी सत्ता के लिये काम कर सकता है और ना करे तो कैसे उसे बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है, यह मुबंई पुलिस कमिश्नर मारिया के तबादले और तबादले की वजह बताने के बाद उसी वजह को नयी नियुक्ति के साथ खारिज करने के तरीको ने बदला दिया। क्योंकि मारिया जिस पद के लाय़क थे वह कमिश्नर का पद नहीं था और जिस पद से लाकर जिसे कमिश्नर बनाया गया वह कमिश्नर बनते ही उसी पद के हो गये, जिसके लिये मारिया को हटाया गया । यानी संस्थानों की गरिमा चाहे गिरे लेकिन सत्ता गरिमा गिराकर ही अपने अनुकूल कैसे बना लेती है इसका खुला चेहरा पीएमओ और सचिवों को लेकर मोदी मॉडल पर अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक की रिपोर्ट बताती है तो यूपी सरकार के नियुक्ति प्रकरण पर इलाहबाद हाईकोर्ट की रोक भी खुला अंदेशा देती है कि राजनीतिक सत्ता पूर्ण ताकत के लिये कैसे मचल रही है। और इन सभी पर निगरानी अगर स्वच्छंद तौर पत्रकारिता करने लगे तो पहले उसे मीडिया हाउस के अंतर्विरोध तले ध्वस्त किया गया। और फिर मीडिया को मुनाफे के खेल में खड़ा कर बांटने सिलसिला शुरु हुआ । असर इसी का है कि कुछ खास संपादक-रिपोर्टरो के साथ प्रधानमंत्री को डिनर पसंद है और कुछ खास पत्रकारों को दिल्ली सरकार में
कई जगह नियुक्त कर सुविधाओं की पोटली केजरीवाल सरकार को खोलना पसंद है । इसी तर्ज पर क्या यूपी क्या बिहार हर जगह निगाहों में भी मीडिया को और निशाने पर भी मीडिया को लेने का खुला खेल हर जगह चलता रहा है । तो क्या यह मान लिया जाये कि मीडिया समूहो ने अपनी गरिमा खत्म कर ली है या फिर मुनाफे की भागमभाग में सत्ता ही एकमात्र ठौर हर मीडिया संस्थान का हो चला है । इसलिये जो सत्ता कहे उसके अनुकूल या प्रतिकूल जनता के खिलाफ चले जाना है या फिर सत्ता मीडिया के इसी मुनाफे के खेल का लाभ उठाकर सबकुछ अपने अनुकूल चाहती है । और वह यह बर्दाश्त नहीं कर पाती कि कोई उसपर निगरानी रखे कि सत्ता का रास्ता सही है या नहीं । इतना ही नहीं सत्ता मुद्दों को लेकर जो परिभाषा गढ़ता है उस परिभाषा पर अंगुली उठाना भी सत्ता बर्दाश्त नहीं कर पा रही है । हिन्दू राष्ट्र भारत कैसे हो सकता है , कहा गया तो सत्ता के माध्यमों ने तुरंत आपको राष्ट्रविरोधी करार दे दिया। अब आप वक्त निकालिये और लड़ते रहिये हिन्दू राष्ट्र को परिभाषित करने में । इसी के सामानांतर कोई दूसरा मीडिया समूह बताने आ जायेगा कि हिन्दू राष्ट्र तो भारतीय रगों में दौड़ता है। अब दो तथ्य ही मीडिया ने परिभाषित किये । जो सत्ता के अनुकूल, उसे सत्ता के तमाम प्रचार तंत्र ने पत्रकारिता करार दिया बाकियों को राष्ट्र विरोधी । इसी तर्ज पर किसी ने विकास का जिक्र किया तो किसी ने ईमानदारी का । अब विकास का मतलब दो जून की रोटी के बाद वाई फाई और बुलेट
ट्रेन होगा या बुलेट ट्रेन और डिजिटल इंडिया ही । तो मीडिया इस पर भी बंट गई । जो सत्ता के साथ खड़ा, वह देश-हित में सोचता है । जो दो जून की रोटी का सवाल खड़ा करता है , वह बिका हुआ है । किसी पत्रकार ने सवाल खड़ा कर दिया कि सौ स्मार्ट सिटी तो छोडिये सिर्फ एक स्मार्ट सिटी बनाकर तो बताईये कि कैसी होगी स्मार्ट सिटी । तो झटके में उसे कांग्रेसी करार दिया गया । किसी ने गांव के बदतर होते हालात का जिक्र किया तो सत्ता ने भोंपू तंत्र बजाकर बताया कि कैसे मीडिया आधुनिक विकास को समझ नहीं पाता । और जब संघ परिवार ने गांव की फिक्र की तो झटके में स्मार्ट गांव का भी जिक्र सरकारी तौर पर हो गया ।

इसी लकीर को ईमानदारी के राग के साथ दिल्ली में केजरीवाल सरकार बन गयी तो किसी पत्रकार ने सवाल उठाया कि जनलोकपाल से चले थे लेकिन आपका अपना लोकपाल कहां है तो उस मीडिया समूह को या निरे अकेले पत्रकार को ही अपने विरोधियो से मिला बताकर खारिज कर दिया गया। पांच साल केजरीवाल का नारा लगाने वाली प्रचार कंपनी पायोनियर पब्लिसिटी को ही सत्ता में आने के बाद प्रचार के करोड़ों के ठेके बिना टेंडर निकाले क्यों दे दिये जाते हैं। इसका जिक्र करना भी विरोधियो के हाथों में बिका हुआ करार दिया जाता है । जैन बिल्डिर्स को लेकर जब दिल्ली सरकार से तार जोड़ने का कोई प्रयास करता है तो उसे बीजेपी का प्रवक्ता करार देने में भी देर नहीं लगायी जाती । और इसी दौर में मुनाफे के लिये कोई मीडिया संस्थान सरकार से गलबिहयां करता है या फिर सत्ता के लगता है कि किसी एक मीडिया संस्थान से गलबहियां कर उससे पत्रकारो के बीच अपनी साख बनाये रखी जाती है तो बकायदा मंच पर बैठकर केजरीवाल यह कहने से नहीं हिचकते कि हम तो आपके साझीदार हैं

यानी कैसे मीडिया को खारिज कर और पत्रकारों की साख पर हमला कर उसे सत्ता के आगे नतमस्तक किया जाये, यह खेल सत्ता के लिये ऐसा सुहावना हो गया है जिससे लगने यही लगा है कि सत्ता के लिये मीडिया की कैडर है। मीडिया ही मुद्दा है।मीडिया ही सियासी ताकत है और मीडिया ही दुशमन है । यानी तकनीक के आसरे जन जन तक अगर मीडिया पहुंच सकती है और सत्ता पाने के बाद कोई राजनीतिक पार्टी एयर कंडिशन्ड कमरों से बाहर निकल नहीं सकती तो फिर कार्यकर्ता का काम तो मीडिया बखूबी कर सकती है। और मीडिया का मतलब भी अगर मुनाफा है या कहें कमाई है और सत्ता अलग अलग माध्यमों से यह कमाई कराने में सक्षम है तो फिर दिल्ली में डेंगू हो या प्याज । देश में गांव की बदहाली हो या खाली एकाउंट का झुनझुना लिये 18 करोड़ लोग । या फिर किसी भी प्रदेश में चंद हथेलियों में सिमटता समूचा लाभ हो उसकी रिपोर्ट करने निकलेगा कौन सा पत्रकार या कौन सा मीडिया समूह चाहेगा कि सत्ता की जड़ों को परखा जाये। पत्रकारों को ग्राउंड जीरो पर रिपोर्ट करने भेजा जाये तो क्या मौजूदा वक्त एक ऐसे नैक्सस में बंध गया है, जहां सत्ता में आकर सत्ता
में बने रहने के लिये लोकतंत्र को ही खत्म कर जनता को यह एहसास कराना है कि लोकतंत्र तो राजनीतिक सत्ता में बसता है। क्योंकि हर पांच बरस बाद जनता वोट से चाहे तो सत्ता बदल सकती है। लेकिन वोटिंग ना तो नौकरशाही को लेकर होती है ना ही न्याय पालिका को लेकर ना ही देश के संवैधानिक संस्थानों को लेकर और ना ही मीडिया को लेकर। तो आखिरी लाइन उन पत्रकारों को धमकी देकर हर सत्ताधारी अपने अपने दायरे में यह कहने से नहीं चूकता की हमें तो जनता ने चुना है। आप सही हैं तो चुनाव लड़ लीजिये । और फिर मीडिया से कोई केजरीवाल की तर्ज पर निकले और कहे कि हम तो राजनीति के कीचड़ में कूदेंगे तभी राजनीति साफ होगी। और जनता को लगेगा कि वाकई यही मौजूदा दौर का अमिताभ बच्चन है। बस हवा उस दिशा में बह जायेगी। यानी लोकतंत्र ताक पर और तानाशाही का नायाब लोकतंत्र सतह पर।

Wednesday, September 23, 2015

"सनातन धर्म "और ये छद्म धर्मनिरपेक्ष एवं पैसों पर नाचने वाले,नेता व पत्रकार !! - पीतांबर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. - 9414657511

                    देश के गद्दार कितने प्रकार के हो सकते हैं , इस विषय पर भी देश में विस्तार से चर्चा होनी चाहिए जी ! ये इस लिए आवश्यक है क्योंकि देश के दुश्मन नित नए प्रयोग करते रहते हैं !क्या पत्रकारों और नक़ली नेताओं के रूप में देश द्रोही देश को नुक्सान नहीं पंहुचा सकते ?जबकि हम पिछले कुछ समय से देख रहे हैं कि कुछ टीवी एंकर-पत्रकार कई पार्टियों में शामिल होकर अपना "ढीठ-पुना"दिखा रहे हैं !जो नहीं शामिल हो पा रहे वो बहस कराने के नाम पर अपने कार्यक्रम में ऐसे विषय लेकर बहस करते हैं जिनसे दंगे फैलें,धर्मांतरण हो,और जाति-धर्म के नाम पर फूट फैले ! इसी उद्देश्य से पत्रकारिता कर रहे रविश कुमार ने ndtv के प्राइम-टाइम में कल एक बहस की जिसमे खूब नाटक किये गए !
                            कहने को तो उन्होंने अलग-अलग प्रवक्ता बुला रख्खे थे , लेकिन वो सब एक नाटक का हिस्सा मात्र थे !!इन सब ने ये साबित करने की नाकाम कोशिश की ,कि "सनातन-धर्म", जो अरबों वर्ष पुराना है,जिसे किसने शुरू किया ,कोई नहीं जानता,इसे कौन चला रहा है कोई पता नहीं और इसका कौन मालिक था-है या होगा कोई नहीं जानता !! उस धर्म को इन्होने किसी अभय प्रवर्तक की "सनातन-सभा "सम्पत्ति बता दिया ! यहीं पर ही नहीं रुके ये गद्दार लोग ,इन्होने सनातन धर्म को आतंक फ़ैलाने वाला साबित करने की कोशिश करी ! बिलकुल वैसे ही जैसे इन्होने r.s.s.और विश्व हिंदू परिषद को हिन्दुओं का एकमात्र रक्षक बना दिया है !और अब सारे गलत-शलत इलज़ाम उन पर थोप कर अपने मालिकों को खुश कर देते हैं जिसके बदले इनके मालिक इन्हें करोड़ों रूपये "हड्डी" की तरह फैंक देते हैं और ये फिर कोट-पेंट टाई पहन कर "पूंछ"हिलाने लग जाते है !
                           ऐसा नहीं है कि जनता इनके बुरे उद्देश्यों को समझती नहीं है , लेकिन सभी दर्शक माकूल जगह ढूंढते हैं इन्हें जवाब देने हेतु , जो उन्हें रोज़ मिलती नहीं इसीलिए जनता का गुस्सा इनपर एक साथ इकठ्ठा होकर फूट पड़ता है !जिसका ये लोग फिरसे अपने पक्ष में ढाल कर फायदा उठा लेते हैं !दूसरा  इनका षड्यंत्र ये होता है कि ये भारतीयता की बात करने वाले लोगों को अपनी बात कभी पूरी ही नहीं करने देते और विरोधी मिलकर टोकने-रोकने का काम करते हैं ताकि लोग हिन्दुस्तान का पक्ष समझ ही ना सकें !सच्चे पत्रकार नेता और सरकारें इनको दण्डित क्यों नहीं करवा पातीं ये भी समझ में नहीं आ रहा !
                        सनातन-धर्म किसी की जागीर नहीं है और न ही ये किसी की मुठ्ठी में आने वाली कोई मुलायम चीज़ है जी !!ये तो एक विचार धारा है जो स्वतः चलती है और स्वतः ही बदलती है ! दुनिया में किसी भी धर्म का प्रचार होगा तो इसका अपने-आप ही हो जाएगा !हे छद्म देश के दुश्मन , छद्म सेकुलरो,नेताओ और पत्रकारों !!तुमसे पहले ना जाने कितने आये सनातन-धर्म और भारत को नुक्सान पंहुचाने वाले , लेकिन वो कुछ भी हमारा बिगाड़ नहीं पाये !फिर तुम क्या चीज़ हो ??? 
                         आइये मित्रो ! आपका स्वागत है !आपके लिए ढेर सारी शुभकामनाएं ! कृपया स्वीकार करें !फिफ्थ पिल्लर करप्शन किल्लर नामक ब्लॉग में जाएँ ! इसे पढ़िए , अपने मित्रों को भी पढ़ाइये शेयर करके और अपने अनमोल कमेंट्स भी लिखिए इस लिंक पर जाकरwww.pitmberduttsharma.blogspot.com. है !इसे आप एक समाचार पत्र की तरह से ही पढ़ें !हमारी इ-मेल आई. डी. ये है - pitamberdutt.sharma@gmail.com. f.b.id.-www.facebook.com/pitamberduttsharma.7 . आप का जीवन खुशियों से भरा रहे !इस ख़ुशी के अवसर पर आपको हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !!
आपका अपना - पीताम्बर दत्त शर्मा -(लेखक-विश्लेषक), मोबाईल नंबर - 9414657511 , सूरतगढ़,पिनकोड -335804 ,जिला श्री गंगानगर , राजस्थान ,भारत ! इस पर लिखे हुए लेख आपको मेरे पेज,ग्रुप्स और फेसबुक पर भी पढ़ने को मिल जायेंगे ! धन्यवाद ! आपका अपना - पीताम्बर दत्त शर्मा , ( लेखक-विश्लेषक) मो. न. - 9414657511      



Sunday, September 20, 2015

"कोई सेक्स के लिए बलात्कार कर देता है ,तो किसी से सेक्स होता नहीं ", दोनों हालात घातक हैं !- पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. - 9414657511

   अन्याय कैसा भी हो दुःखदायी होता है ! समाज ने अन्याय न होने पाएं , उसके लिए कुछ नियम बनाये हुए हैं ! जैसे हमारा संविधान कुछ समय पश्चात अधूरा लगने लगता है , बिल्कुल वैसे ही सामाजिक व्यवस्था भी पुरानी होती है !इसीलिए समय-समय पर दोनों में संशोधन होते रहते हैं ! लेकिन दोनों व्यवस्थाओं में संशोधन करने के तरीके बिलकुल ही अलग-अलग हैं ! जहाँ क़ानून में संशोधन तो हमारे साँसद "महोदय" ही कर सकते हैं वहीँ सामाजिक बुराइयों को दूर करने हेतु संशोधन करना उन्हीं लोगोंका काम होता है , जो उस "बीमारी"से पीड़ित हों !
                           "सती सावित्री"जैसी भारतीय नारी को "सरिता-मनोरमा-गृह शोभा-साप्ताहिक हिंदुस्तान और धर्मयुग" जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों और लेखों ने "पश्चिमी-संस्कृति"अनुसार आधुनिक और बिकाऊ-मॉल बना दिया !इस सबके पीछे छिपे पैसे की चमक ने भी इस काम में अपना अहम रोल निभाया ! वैश्याओं का "गन्दा-धन्धा" दोनों संस्कृतियों में पुरातन काल से है ! केवल तरीकों का अंतर मात्र है !इसीलिए भारत में खुले सेक्स को बुरी चीज़ बताया गया लेकिन विदेशों में ये मनोरंजन के साधन के रूप में प्रचलित किया गया !इसीलिए हमारे नेता मुलायम सिंह जी आज भी जनता से पूछते हैं कि क्या कोई एक महिला से तीन आदमी बलात्कार कर सकते हैं ??लेकिन विदेशी संस्कृति में इसे "पार्टी मनाना या गैंग-सेक्स कहते हैं और जिसे हम बलात्कार कहते हैं वहां इसे "सरप्राईज़-सेक्स"कहा जाता है ! अंतर सोच का है !जब विदेशी संस्कृति के "पिछलग्गुओं'ने इस नारी-आधुनिकता की शुरुआत की थी तब उन्होंने ये नहीं सोचा होगा कि ये सेक्स गांव-गाँव और गली गली अपने पैर जमा लेगा !लेकिन आज की सच्चाई ये है की 4 साल के बच्चे को भी सेक्स की आवश्यकत है , बिलकुल वैसे ही जैसे उसे भोजन की आवश्यकता होती है , अपने पेट की भूख मिटाने के लिए !
                          तो अब क्या किया जाए ?? इस भयावह समस्या से निपटने हेतु , जो हमारे सामने सुरसा की तरह मुंह बाये खड़ी है ?? कितने और बलात्कारों का इंतज़ार करेंगे हम , इस समस्या के निजात हेतु कोई उपाय करने हेतु ???क्या केवल सज़ा देना ही हर मर्ज़ का इलाज होता है ??समाज कब जागेगा ?? वो कब आधुनिक बनेगा हमारे महान कोंग्रेसियों की तरह ??नेहरू जी से लेकर द्विग्विजय सिंह जी तलक बड़े अनुभवी नेता हमें "राह"दिखा चुके हैं ! अब तो दुसरे दलों के नेता भी विधानसभा में सेक्सी वीडिओ देखते पाये गए हैं ?? मैं इलज़ाम नहीं लगा रहा सिर्फ ये बताने की कशिश कर रहा हूँ कि हमें अब कबूल करना होगा कि हमें अब एक सेक्सबाज़ार की आवश्यकता है जो कानूनी हो सुरक्षित हो आधुनिक हो और हर गांव-शहर में हो! 
                        तभी हमारे "अतिसेक्सवादी ओरतें और पुरुष"उन "सेक्स-मंदिरों"में जा सकेंगे, बिना किसी रोक टोक के  बलात्कार होने भी रुक जाएंगे ! गर फिर भी कोई ऐसा घृणित काम करे तो उसे "क्रूर"सज़ा दी जाए ! ऐसा नहीं है कि हम कोई नया , कोई बड़ा कदम उठाएंगे , बल्कि आज तक जो छिप कर हो रहा है वो खुलेआम होगा ! सबको पता होगा की शराब की तरह सेक्स करने हेतु "उपयुक्त-सामान" कहाँ मिलता है!! बस इतनी सी तो बात है !!!जितने भी सेक्सी पुरुष और महिलायें हैं , और वो मेरी इस बात से सहमत हैं तो इस लेख को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ! सधन्यवाद !जय श्री राम !
                           



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Thursday, September 17, 2015

"तलाक-तलाक-तलाक बोलिए-और काम पे चलिए" !! - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) - 9414657511

      लो जी !! पाठक मित्रो !! आज के इस भाग दौड़ के ज़माने में हमारे एक मुस्लिम भाई ने बड़े ही तुरत-फुरत तरीके से अपनी तथाकथित तंग करने वाली पत्नी जी से निजात पा ली है ! वो भी "जायज़" तरीके से ! कोई न्यायालय उसे ख़ारिज नहीं कर सकता !
            हुआ यूूँ कि "पुत्तर-प्रदेश"नहीं-नहीं "उत्तर-प्रदेश के बुलन्दशहर में अलीगढ शहर का फहीम खान नामक युवक अपनी पत्नी और बच्चों के संग इस्लामाबाद मोहल्ले में किसी रिश्तेदार को मिलने आया हुआ था ! वहाँ उसका अपनी पत्नी के संग किसी छोटी सी बात को लेकर बहस हो गयी ! रूठ कर जनाब बस अड्डे पंहुच गए तो बीवी भी पीछे आ गयी तो वहाँ भी बहस शुरू हो गयी ! बात इतनी बढ़ गयी की जनाब ने बीच सड़क पर ही तीन बार तलाक-तलाक - तलाक बोला और चल दिया अकेले अपने अलीगढ को ! "शायद बेचारी "बीवी उसकी खडी सोचती ही रह गयी कि या खुद ये क्या ज़ुल्म हो गया ?? अब मेरे तीन बच्चों का क्या होगा ?सात साल से दोनों बड़े प्यार से रह रहे थे ना जाने किसका मुंह देख कर चले थे कि ज़ुल्मी तलाक ही दे गया मामूली सी नहस पर ! तीनो बच्चे और वो महिला बस अड्डे पर जोर-जोर से रो रहे थे तो लगों के पूछने पर इस महिला ने ये बात बताई !
                       महिला-आयोग तक इस बेचारी की बात कब पंहुचेगी ,ये पता नहीं ! लेकिन इस मामले में कोई क़ानून कुछ नहीं कर सकता !जैसे सऊदी-अरब के एक राजनयिक के नेपाली महिला से गैंग-रेप में फंसने पर देश का कोई क़ानून उसे रोक नहीं पाया क्योंकि एक समझोते के मुताबिक ऐसा करना संभव नहीं है ! वैसे ही मुस्लिम क़ानून के तहत इस केस में कुछ कर पाना संभव नहीं है ! तो क्या कुछ बोला या लिखा भी नहीं जाए ?? ऐसा तो हो नहीं सकता ! जैसे मोदी जी को अदालत द्वारा 2002 दंगों से बरी कर दिए जाने के बाद भी हमारे "विद्वान-टीवी एंकर-पत्रकार"भाई आज तक उन्हें लपेट लेते हैं , वैसे ही हम भी प्रश्न उठाएंगे की हिन्दू क़ानून को भी इतना आसान क्यों नहीं बना दिया जाता कि कोई "पत्नी-पीड़ित"जब चाहे अपनी मुसीबत से निजात पा लेवे जी !हिन्दू आदमी के तो माता-पिता, भाई-बहन और दोस्तों तलक को बीच में उलझा दिया जाता है !
                   हम हमारे मुस्लिम भाइयों से ये अनुरोध करना चाहते हैं कि आप ऐसे विषयों पर सोचें और आवश्यक बदलाव लाने की कोशिश करें ! आज ज़माना बदल गया है लेकिन मानवीय भावनाएं चाहे वो किसी भी धर्म की ही क्यों ना हो कभी नहीं बदलती !आपके पुराने मुस्लिम क़ानून के मुताबिक तो शायद अब उस महिला को पहले किसी दुसरे आदमी के संग 6 महीने तलक साथ रहना पड़ेगा और फिर उससे तलाक लेकर अपने पुराने शौहर के साथ रह पाएगी ! लेकिन उसके बच्चों का क्या होगा ?बाकी रिश्तेदारों का व्यवहार उनके साथ कैसा होगा खुद ही जानता है !हर समाज के युवाओं को अब आगे बढ़कर अपनी बुराइयों को समापत करना होगा ! एक वैचारिक क्रान्ति अतिआव्वश्यक है जी ! खुदा हाफ़िज़ !!!अलाह मेहर करे !
                                            





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Tuesday, September 15, 2015

"अबला क्या ऐसे सबला बनेगी "?? - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. - 9414657511

पाठक मित्रो ! कल से दो समाचार ऐसे आ रहे हैं , जिनमें एक महिला देहरादून में और एक महिला हरियाणा में "सोमरस"पीकर आम जनता और पोलिस वालों को अपना सबला होना दिखा रही हैं ! ऐसा नहीं है कि ये पहली बार हुआ हो ! हम अपने इतिहास में अगर "गहरी-नज़र" डालें तो विभिन्न कालान्तरों में कई महिलाओं ने अपने अबला होने के लेबल को हटाने की कोशिश की है ! पुरातन काल में जब माँ दुर्गा जी को क्रोध आया था तो उन्होंने माँ काली का रूप धार लिया था ! फिर उन्होंने जो राक्षसों को मारा , तो देवताओं को भी लगने लगा की हमारा भी नंबर आ सकता है तो वो भगवान शंकर से प्रार्थना करने लगे कि प्रभो आप ही हमें बचाओ ! विनती सुन भोलेनाथ माता के गुजरने वाले रास्ते में लेट गए और जैसे ही काली के पैर उनपर पड़े तो उनका क्रोध शांत हुआ और वो वापिस साधारण रूप में आये !
                         ऐसे ही कई माननीय महिलाएं अपने आपको "माता" घोषित कर देती हैं ! शुरुआत उनके घर से ही होती है उसके बच्चे , सब बड़े छोटे उसको "माताजी-माता जी "बुलाने लग जाते हैं और पत्र-पुष्प-दक्षिणा और प्रशाद चढाने लगते हैं !यहाँ तलक कि उसका पति भी उसे "माता जी "बुलाने लग जाता है ! ऐसा होते देख पहले पडोसी फिर शहर वाले और फिर दूर वाले सब "जय माता दी " करने लग जाते हैं !ये अभी अबला से सबला बनने की एक क्रिया मात्र है !इस कार्य का तीसरा तरीका आजकल नेता-अफसर बनकर भी किया जाता है !मतलब तो पुरुष पर रौब झाड़ने और अपना हुकुम चलने से होता है ! कुछ पुरुष तो अपनी महिला को घर में ही संतुष्ट कर देते हैं उसके सारे आदेश शब्दशः मानकर !और जिन महिलाओं को फिर भी न्याय नहीं मिल पाता उन्हें देश के "संविधान"के मुताबिक हमारा महिला आयोग न्याय दिलवाता है बशर्ते  में कोई बड़ी आसामी फांसी हो ! ताकि टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में दो-चार दिन बढ़िया स्थान मिल सके महिला-आयोग की सदस्य महिलाओं को ! यानी वो भी सबला दिखने का प्रयास मात्र ही हैं !
                                  नक़ली बाबे, संत,डेरे वाले और उनके "चेले-चेलियाँ" , ये सब भारतीय समाज की विकृतियाँ हैं जो विकृत हो चुके मर्द-औरत के रिश्तों को छिपकर संतुष्टि प्रदान करवाती हैं ! नक़ली तरीके से भूत-प्रेत की छाया का आना और फिर उसका जाना भी इसी बात का दूसरा उदाहरण है !आजके आधुनिक तरीकों से सेक्स प्राब्लम दूर करने वाले डॉक्टरों और मनोचिकत्स्कों का उद्ग्म हुए कितना समय हुआ है ? उससे पहले भारतीय उपमहाद्वीप में ये समस्याएं ऐसे ही हल हुआ करतीं थीं ! कोई सेब वाला बाबा था तो कोई केले वाली माता !हर धर्म के अनुयाइयों में तरह-तरह के पीर-फ़क़ीर हुआ करते थे जिनका काम ऐसी पर्सनल जिज्ञासाएँ शांत करना ही होता था !डाक्टर लोग भी मानते हैं की "हार्मोन्स"की गड़बड़ी से महिलाएं उन चंद दिनों में ज्यादा सेक्सी और गुस्से बाज़ हो जाती हैं !इनको फिर शांत करना मुश्किल काम हो जाता है !शायद इसीलिए हमारे रिश्तों में भी "देवर-भाभी और जीजा साली"का रिश्ता ऐसा बनाया गया है कि अगर कोई दुर्घटना घट जाए या कोई सेक्स प्रॉब्लम हो जाए तो ये आपस में एक-दुसरे का "भला"करते जाएँ !और किसी को कानो कान खबर भी ना हो ! पर्दा भी बना  भी हो जाए , सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे !
                        लेकिन आजकल टीवी चैनलों के बार-बार दिखाने और आप पार्टी के कार्यकर्ताओं के नाटक करने की आदत को देखकर हर "महिला-पुरुष कुछ भी करके "बस "खबर" बनना चाहते हैं ! फिर वो किसी चेनेल में बहस के दौरान पुरुष को थप्पड़ मारने की ही घटना ही क्यों ना हो !अब प्रश्न ये पैदा होता है कि "लड़ाकू-झगड़ालू-भ्रष्ट औरतों "को भी हम सच्ची-आदर्शवादी और अच्छे चरित्र वाली महिलाओं के बहाने बक्श देंगे ??क्या हम उन्हें नारी शक्ति का अपमान होना कहकर बचाएंगे ?? आप ही बताओ मित्रो !! मैं तो जय माता दी बोलूंगा !अन्यथा महिला आयोग की अध्यक्ष जी मुझे सम्मन भेज देंगी !! क्योंकि मैं भी तो एक बड़ी मशहूर हूँ ! राम-राम-राम !!!!!!!!!!
                         


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Sunday, September 13, 2015

"अब चुनावों तक तो बिहार में "बहार"आएगी ही,अल्लाह जाने क्या होगा आगे"?! - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. - 9414657511

भारत के बिहार प्रान्त में "लोकतान्त्रिक प्रक्रिया" के अधीन चुनावों का बिगुल बज गया है !लोकतान्त्रिक प्रक्रिया भी बड़ी अजीब चीज़ है साहिब ! अगर सारे बुद्धु इकठ्ठे होकर कोई फैसला करदें तो उस निर्णय पर कोई सवाल तो खड़े कर सकता है लेकिन कोई कुछ कर नहीं सकता ! नहीं ऐतबार आता तो माननीय अन्ना हज़ारे से जाकर पूछ लो !भारत के लोकतंत्र का क़ानून भी चन्द "समझदार"लोगों ने बना दिया और उसमें चंद समझदार लोग संशोधन भी करते रहते हैं ,उसे देश के 125 करोड़ लोगों को मानना ही  पड़ता है !चाहे वो उस निर्णय से सहमत हो या ना हो !अगर कोई देशवासी उस निर्णय को नहीं मानेगा तो उसे भारतीय पोलिस और न्याय-प्रणाली मिलकर "दण्ड" भी दे सकते हैं ! ये सब इसलिए होता क्योंकि हमने हमने " वोट" देकर उन  सब महानुभावों को चुना होता है !
                            ऐसी ही महान प्रक्रिया अब हमारे देश के बिहार प्रांत में होने जा रही है !जहां से बड़ी ही महान विभूतियाँ  हमें मिली हैं !सारे समाचार पत्रों, चैनलों और सोशियल मीडिया ने सभी राजनितिक दलों के "चुनावी-क्षत्रप्पों"के बारे में आपको  विस्तार से बता दिया है कि कैसे पहले जनता परिवार बना फिर टूट भी गया ! कैसे दिल्ली से केजरीवाल अपनी 'फेविकोल" लेकर आये लेकिन वो काम आती दिखाई नहीं दे रही है जी !देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी ने 40 सीटों से ही संतोष कर लिया है , क्योंकि उन्हें पता था कि अगर उन्होंने अकड़ दिखाई तो उन्हें "सच्चाई" का आईना दिखा दिया जायेगा !लेकिन अपने मुलायम ने हौसला किया और कह दिया कि हे नितीश !! क्या हुआ हम अगर संसद के चुनावों में 5 सीटें ही जीत पाये थे लेकिन बिहार के विधानसभा चुनावों में 5 सीटों पर नहीं मानेंगे !
                        दूसरी तरफ हमेशां चुप रहने वाले अनंत कुमार और भूपेन्द्र यादव जी में क्या जादू है कि पासवान-कुशवाहा और माँझी जी "कसमसा"भी रहे हैं लेकिन ये भी कह रहे हैं की कोई "झगड़ा" नहीं है ! आज 6  बजे नहीं तो कल 12 बजे सीटों की घोषणा हो जायेगी !सबकुछ भाजपा पर छोड़ दिया गया है !कुछ तो "राज़"होते हैं, इन नेताओं के बंटवारे में,जिनकी"पर्देदारी"होती है ! नहीं तो केजरीवाल जी जी मांग रख देते कि टिकटों का बंटवारा भी ओन कैमरा होना चाहिए जी !! 
                      टिकटों के बंटवारे के बाद सभी प्रकार के नेता बड़ी आसानी से आपको दर्शन देंगे , आश्वासन देंगे, खाने-पीने को देंगे, राशन-धन और कपडा देंगे और ज्यादा सारा भाषण भी देंगे ! नाच भी होगा और गान भी होगा !मालाएं पहनी भी जाएँगी और पहनाईं  भी जाएँगी ! चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों को हवा में नोटों की तरह उड़ा दिया जायेगा !पूरा बिहार "बहार"में होगा !!एम आई एम के ओवेसी भाई केवल सीमान्त बिहार में भाईचारा बढ़ाएंगे ! क्योंकि वहाँ ही भाईचारे की असली आवश्यकता है !कोई नेता का भाई होगा तो कोई बाप होगा , कोई उनकी बहन होगी तो कोई उनकी माँ होगी !! लेकिन फिर जैसे ही आपने अपना अनमोल "वोट" दे दिया.....!! उसके बाद " माँ नहीं,बेटा नहीं भाई नहीं , कुछ भी नहीं रहता है ! नेता आँखों से ऐसा ओझल हो जाता है की वो सिर्फ चैनलों और समाचार पत्रों में ही दिखाई देता है !
                                    फिर सूखा पड़ेगा,ज़मीन धँसेगी,गाड़ियां उलटेंगी, चोरियां होंगी डाके पड़ेंगे, आत्महत्याएं होंगी, भ्रष्टाचार होगा और आतंकवाद होगा जिनका सामना केवल हम आम जनता को करना होगा मेरे पाठक मित्रो लेकिन मैं आपको ये गारंटी देता हूँ कि किसी भी राजनितिक दल के नेता को कोई भी फर्क नहीं पड़ेगा , फिर चाहे वो केजरीवाल हो या सोनिया गांधी मुलायम हो या कोई मोदी ! इनको भगवान ना करे अगर स्वभाविक मौत भी आने लगेगी तो ये सब अमेरिका अपना इलाज कराने चले जायेंगे ! लेकिन आप और मैं कहाँ जाएंगे ?? हमें तो यहीं रह कर अपना जीवन-यापन करना है ! ये सब इसलिए होगा क्योंकि हम "कलयुग" में जी रहे हैं !
जय श्री राम बोलना पड़ेगा ! तो बोलो जय श्री राम !!
                       



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Thursday, September 10, 2015

हम तो पूछेंगे कि ....पानी-बिजली के अफसर , नेताओं को "मैनेज" कैसे कर लेते हैं ??? - पीताम्बर दत्त शर्मा (लेखक-विश्लेषक) मो. न. - 9414657511

पाठक मित्रो ! हमारे लोकतंत्र ने केवल हमारे नेताओं को ही "बुद्धिमान" नहीं बनाया है , बल्कि हमारे अफसरों को भी "स्मार्ट" बना दिया है ! अब हमारे बिजली और पानी सप्लाई विभाग के अफसर भली-भाँति से ये जानते हैं कि मोहल्ले से लेकर मंत्री तक से कैसे "निबटना"है ! चाहे ये नेता लोग कितने भी बड़े जन-समूह के साथ आएं , या फिर किसी मंत्री जी की कोई सिफारिश के साथ आएं , ये ऐसा "मायाजाल" बुनते हैं कि प्रार्थी अफसर की समस्या को भली-भाँति समझकर और संतुष्ट हो कर अपने घर को लौट जाता है ! काम तभी होता है जब अफसर चाहता है !
                            
                 हालात तो यहां तलक पंहुच चुके हैं कि किसी भी सरकारी दफ्तर में चले जाएँ , देखने में यही मिलेगा कि कर्मचारी जो भी कार्य कर रहा है , वो ऐसे काम कर रहा है जैसे किसी पर कोई एहसान कर रहा है ! शायद इसीलिए मोदी जी ने शपथ लेने के बाद आज की अफसर शाही को "शाबाश" दे कर और उनमें अपना विश्वास जताकर ही कार्यकाल शुरू किया !आज जिस भी युवा को देख लीजिये , वो सिर्फ अच्छी नौकरी ही चाहता है !जबकि पहले किसी भी प्रकार की नौकरी को "दोयम"दर्जे का कार्य माना जाता था !अपने "हुनर" और "कला"पर उसे "विश्वास" ही नहीं है !अपना व्यपार चलाने हेतु आज के युवा के पास अपनी "पूंजी"की भी भारी कमी है !इसीलिए सभी माता-पिता अपनी संतान को पढ़ा-लिखा कर सरकारी नौकर बनाना चाहते हैं ! क्योंकि वो देख रहे हैं कि एकबार अगर नौकरी मिल गयी तो उसे कोई हटा नहीं सकता !लेकिन नौकरी करने वाला जनहित के काम कम और आराम ज्यादा करना चाहता है !

                          मैं गया एक सरकारी दफ्तर में  देखा कि "बाबू"जी ,नए बने सरपंच,सरपंच पति और डाइरेक्टर को भी नहीं छोड़ते ! उनसे भी नकद रिश्वत नहीं तो "चाय-पानी"के नाम पर दारु पार्टी जितने पैसे लेकर उनका कहना मानते दिखाई दिए ! छोटे जनप्रतिनिधि केवल इसलिए ये लालच देते हैं कि जनता को लगे कि सरकारी कार्यालय में उनकी बहुत चलती है ! एक "इशारे" से ही उनके सरपंच - डाइरेक्टर का काम हो जाता है ! दफ्तर के सभी बाबू हमारे सरपंच - डाइरेक्टर को "नमस्कार"करते हैं !

                         जब छोटे दफ्तरों का ये हाल है तो बड़े दफ्तरों में तो निश्चय ही "बड़े खेल एवं कलाकारियां"होती होंगी ???क्योंकि भ्रष्टाचार की सभी "कलाएं"तो "ऊपर से नीचे" ही आती हैं जी !पिछले 67 सालों में सरकार चाहे किसी की भी रही हो , भ्रष्टाचार रोकने का काम किसी ने  नहीं किया है जी !देखना ये भी है कि मोदी जी के "एजेंडे"में भ्रष्टाचार को मिटाना कितने नंबर पर है ???? या फिर ये भी पूर्व प्रधानमंत्रियों की तरह "मैनेज" हो जाएंगे ??


                                

आपको हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !! भगवन आपको आशीर्वाद दे !!"5TH PILLAR CORRUPTION KILLER",नामक ब्लॉग रोज़ाना अवश्य पढ़ें,जिसका लिंक -www.pitamberduttsharma.blogspot.com. है !इसे अपने मित्रों संग शेयर करें और अपने अनमोल विचार भी हमें अवश्य लिख कर भेजें !इसकी सामग्री आपको फेसबुक,गूगल+,पेज और कई ग्रुप्स में भी मिल जाएगी !इसे आप एक समाचार पत्र की तरह से ही पढ़ें !हमारी इ-मेल ईद ये है - pitamberdutt.sharma@gmail.com. f.b.id.-www.facebook.com/pitamberduttsharma.7 . आप का जीवन खुशियों से भरा रहे !इस ख़ुशी के अवसर पर आपको हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !!
आपका अपना - पीताम्बर दत्त शर्मा -(लेखक-विश्लेषक), मोबाईल नंबर - 9414657511 , सूरतगढ़,पिनकोड -335804 ,जिला श्री गंगानगर , राजस्थान ,भारत !

2014 की कॉरपोरेट फंडिग ने बदल दी है देश की सियासत !!

चुनाव की चकाचौंध भरी रंगत 2014 के लोकसभा चुनाव की है। और क्या चुनाव के इस हंगामे के पीछे कारपोरेट का ही पैसा रहा। क्योंकि पहली बार एडीआर न...