Thursday, January 31, 2013

" संघ " को चाहिए- अब राम-कृष्ण-गाय-मन्दिर और अपना इतिहास को छोड़,- वर्तमान में जीना सीखे और सिखाये.!!

         वर्तमान में रहने-खाने-पीने-सोने और विचरने वाले सभी मित्रों को मेरा आधुनिक नमस्कार यानी कि " HI-हाय... !!
                  निश्चितरूप से हमें अपने इतिहास,रीती-रिवाजों,सभ्यता और ग्रंथों से बहुत कुछ सीखने को मिलता है और इनको हमें हमेशां अपने जीवन का आधार बनाकर चलना चाहिए !! लेकिन अगर हम इसे एक निश्चित अवधि से ज्यादा देर तक पकडे रहेंगे तो हम विश्व के दुसरे देशों से पिछड़ जायेंगे !!
               भारत में R.S.S. ने हिन्दू सभ्यता सँभालने, बढानेऔर इसका प्रचार करने में एक विशेष भूमिका निभाई है इसमें कोई शक नहीं है ! भारतीय राजनीती में भी इसका अच्छा-खासा प्रभाव रहा है !! पहले जनसंघ और आजकल भाजपा में इसका पूरन कंट्रोल रहा है !! तो इस करणवश भारत की तरक्की और भारत की कमियों में भी इसका योगदान भी माना जाना चाहिए !!
                जब हमारा ये हमारा देश गुलाम था,और जब ये आज़ाद हुआ तब के जवान - बूढ़े और बच्चे जो थे , उन्होंने ही तो देश औरअपने समाज-परिवार को चलाया था..! एक गीत में कहा भी गया था कि " हम लाये हैं , तूफ़ान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना , मेरे बच्चो सम्भाल के"....!! लेकिन मैं दावे के साथ कहता हूँ कि 1947 के समय के " जवानों और बच्चों " ने ही देश को इस हाल में पंहुचाया है की जिधर देखो उधर गंदगी ही गंदगी नज़र आती है, पिछड़ापन दिखाई देता है !!! चाहे वो शिक्षा- राजनीती- रीती-रिवाज़ और हमारा समाज हो या फिर हमारी विदेश नीति हो या हमारा सिनेमा जगत सब बुराई की चरम सीमा पर पंहुच गए हैं !!
                      जो लोग आज 65 साल से ज्यादा उम्र के " घाघ-बूढ़े " महिला-पुरुष उन्हीं में से ही तो किसी ने अपने भाई,बहन,माता-पिता और सन्तान को लूटा और आजके अमीर बने...?? उन्होंने ने ही तो अपने परिवार की महिलाओं से बलात्कार किये...?? उन्होंने ही तो घर व देश चलाया....?? जितनी भी आज कमियाँ हैं वो सब इनकी वजह से ही तो हैं.......??? रिश्वतें किसने लीं व दीं,दारु पीकर, पैसे लेकर, जाती-इलाका-धर्म और पार्टी देखकर बुरे नेताओं को वोट किसने दिए....?? इन्हीं बूढों ने...!! और उपदेश बच्चों व आजके जवानों को दिए जा रहे हैं....????
                           आज ..  हमें बदलाव चाहिए तो भविष्य को देखते हुए, भूतकाल से सीखते हुए वर्तमान में जीना होगा !! आज समस्याएँ ना तो युद्ध से हल होंगीं और ना ही धर्म-जाति के नाम पर आपस में लड़ने से !! समस्या हल होगी " वोट " नामक हथियार के उचित उपयोग से !! बड़े से बड़े नेता को हम अगर हटाना चाहते हैं तो एक ही तरीका है.....कि उसका भाषण मत सुनो.., उसे देखने मत जाओ ..., और उसे अपना वोट मत दो..!! चाहे वो आपकी पार्टी-जाति-धर्म और इलाके का ही क्यों न हो...!!
                             इसीलिए मेरा मानना   है कि   "संघ" को  अब धर्म,धर्मस्थलों,महापुरुषों के नामपर चंदा इकठ्ठा करना छोड़, वर्तमान स्वरूप अनुसार अपने सहयोगी संगठनों को ढालना होगा !! क्योंकि और किसीको हो या न हो लेकिन हम स्वयंसेवकों को तो R.S.S. से बहुत उमीदें हैं...!! बोलने से ज्यादा जब हमारी सरकार आये , तो हम करके दिखाएँ !!
                            आपका क्या कहना है ,इस विषय पर...??
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Wednesday, January 30, 2013

" हृन्याक्ष-रावण-कंसऔर दक्ष बनो,ताकि हरी को आना पड़े आपके पास "...!! रोना-धोना छोड़ो ..!!

   प्रिय मित्रो,सादर नमस्कार !                                                                                                                     हमारे ग्रन्थ हमें इंसान बनाने हेतु ना जाने कितने रास्ते बताते हैं !लेकिन हम बुराइयों के सामने हार जाते हैं !! हमने ये भी देखा-सुना और पढ़ा है कि बुरे आदमियों के सामने भगवान भी नतमस्तक हो जाते थे, ये आजके मंत्री -संत्री फिर किस खेत की मूली हैं ?
                     जब जाने से इस सृष्टि का निर्माण हुआ है तब से लेकर आज तक ना जाने कितनी बार श्री विष्णु जी को अवतार लेने पड़े हैं , ना कितने साधू-संत हुए और ना जाने कितने ग्रन्थ लिखे जा चुके हैं !! इंसान को सुधारने हेतु ना जाने कितने प्रकार के धरम और पंथ भी चलाये गए...?? लेकिन ये इंसान भी " कमाल " का जानवर है !! गधा -घोडा-हाथी-कुत्ता और तोता आदि सीखकर वैसा ही करने लगता है , जैसा सिखाया जाता है , लेकिन ये इंसान तो अपनी अकल लगाकर हर जगह अपनी " सहूलियत ' वाला रास्ता बना ही लेता है !! यही नहीं ज़रुरत पड़ने पर तो ये अपने " ग्रन्थ-गुरु और भगवान् को भी गलत साबित कर देता है !!
                            इसीलिए मैं कहता हूँ कि मित्रो देवता और इन्सान बनना छोड़ो,राक्षस बनो...!! क्योंकि इन्होने अपनी ताकत बढ़ाने हेतु तपस्या करके जो शक्तियां और हथियार प्राप्त किये , उनका समय आने पर भरपूर उपयोग भी किया !! तभी तो भगवान को स्वयं आना पड़ता था  !! हमारे नेता नित नए हथियार बना भी रहे हैं और खरीद भी रहे हैं ! लेकिन उपयोग पिछले 35 सालों से कर नहीं पा रहे क्यों ?? क्या सिर्फ संयुक्त राष्ट्रसंघ में वीटो पावर वाली सीट पाने हेतु डरपोक बने हुए हैं ??? 
                 पंजाब-काश्मीर-आसाम का और नक्सलवाद का आतंक भी इसीलिए सहा जा रहा है ?? क्यों..............
                                     क्यों मित्रो !! आपका क्या कहना है ,इस विषय पर...??
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Monday, January 28, 2013

प्रसिद्धि का शार्टकट ........????





हर बार विश्व पुस्तक मेले के आयोजन का होना जैसे एक घटना को घटित कर देता है मुझमें और मैं हो जाता हूँ सतर्क हर तरफ़ चौकन्नी निगाह …………कौन , कहाँ और कैसे छप रहा है , किसने क्या जुगाड किया, किसने पैसे देकर खुद को छपवाया, किसने सच में नाम कमाया और किसने अनुचित हथकंडे अपनाये और पा ली प्रसिद्धि, किसने वर्जित विषय लिखे और पहुँच गये मशहूरियत के मुकाम पर …………देख देख मुझमें खून का उबाल चरम सीमा पर पहुँचने लगता है और मैं डूब जाता हूँ विश्लेषण के गणित में………

लिखना वो भी निरन्तर उस पर उसकी साधना करना, अराधना करना मुझ जैसे निष्क्रिय के बस की बात तो नहीं जब सुबह एक बार तस्वीर के आगे नतमस्तक नहीं होता तो यहाँ इसकी अराधना कैसे की जाये और कौन इन पचडों मे पडे । ये तो गये ज़माने की बातें हैं और आज का वक्त तो वैसे भी इंटरनैट का वक्त है ………जहाँ जैसे ही कोई विचार उतरे चाहे उसमें तुक हो या नहीं सीधा चिपका दो दीवार पर और हो जाओ शुरु अपने मन की भडास निकालना …………अब इसमें कोई मोल थोडे लगता है सो हम भी इसी तरह कर लेते हैं एक दिन में ना जाने कितनी बार अराधना शब्दों की और खुद को साबित कर देते हैं महान लिक्खाड्……आज के वक्त में जो जितना ज्यादा बात करे, चाहे तीखी या मीठी वो ही प्रसिद्धि के सोपान चढता है और वहीँ सबसे ज्यादा चटखारे लेने वालों की भीड नज़र आती है ………बस इस बात को गिरह में बाँध हमने भी जोर -शोर से धावा बोल दिया और लगे बतियाने, ताज़ा -ताज़ा माल परोसने, कभी घर की तो कभी बाहर की बात , तो कभी देश और समाज पर अपने ज्ञान का परचम फ़हराते हम किसी के भी लेखन के बखिये उधेडने में बहुत ही जल्द परिपक्व हो गये …………आहा! क्या दुनिया है ……जब चाहे जिस पर चाहे अपनी भडास निकालो और अपनी पहचान बना लो क्योंकि सीधे रास्ते पर चलकर कितने मुकाम पाते हैं …………उन जैसों को तो कोई पूछता भी नहीं और यदि गलती से कोई पूछ भी ले तो सारे परिदृश्य पर असर पडता हो ऐसा भी नज़र नहीं आता तो सुगम , सरल , सहज रास्ता क्यों ना अपनाया जाये और प्रसिद्धि के मुकाम पर खुद को क्यों ना पहुँचाया जाये और उसका सबसे आसान रास्ता एक ही है …………आप चाहे कवि हों या कथाकार या लेखक आपको आलोचना करना आना चाहिये ………कोई चाँद को चाँद कहे तो भी आपमें उसके नज़रिये को बदलने का दमखम होना चाहिये………जहाँ से उसे चाँद में भी दाग साफ़ - साफ़ नज़र आ जाये और वो आपके लेखन का, आपकी आलोचना का कायल हो जाये और सफ़लता की सीढी का ये पहला कदम है बस इतना काफ़ी है और ये हमने बखूबी सीख लिया और चल पडे मंज़िल की ओर …………

अपनी धुन में हमने भी लिख मारी काफ़ी कवितायें, तुकबंदियाँ और आलेख …………आहा ! एक एक शब्द पर वाह- वाही के शब्दों ने तो जैसे हमारे मन की मुरादों में इज़ाफ़ा कर दिया । बडे - बडे कवियों , लेखकों से तुलना उत्साह का संचार करने लगी ……चाहे पुराने हों या समकालीन ………अब तो हमारा आकाश बहुत विस्तृत हो गया जहाँ हमें हमारे सिवा ना कोई दूसरा दिखता था ………समतुल्य तो दूर की बात थी …………अब जाकर सोचा हमने भी चलो अब छपना चाहिये क्योंकि अभी तक तो एक पहला पडाव ही तो पार किया था …………इंटरनैट महाराज की कृपा से ।

और करने लगे हम भी जुगाड किसी तरह छपने का और पुस्तक मेले में विमोचित होने का …………आहा ! कितना गौरान्वित करता वो क्षण होता होगा जब अपार जनसमूह के बीच खुद को खडे देखा जाये, सम्मानित होते देखा जाये …………बस इस आशा की किरण ने हमें प्रोत्साहित किया और हम चल पडे ………यूँ तो इंटरनैट महाराज की कृपा से काफ़ी प्रकाशन जानने लगे थे और छापते भी थे मगर अकेले अपना संग्रह छपवाना किसी उपलब्धि से कम थोडे था सो नामी- गिरामी प्रकाशनों से बात करके सबसे बडे प्रकाशन के द्वारा खुद को छपवाने का निर्णय किया और साथ ही प्रचार- प्रसार में भी कोई कमी नहीं होने देने का वचन लिया । दूसरी सबसे बडी बात इंटरनैट महाराज की कृपा से इतने लोग जानने लगे थे कि पुस्तक का हाथों - हाथ बिकना लाज़िमी था क्योंकि सभी आग्रह करते थे कि आपका अपना संग्रह कब निकलेगा ? कब आप उसे हमें पढवायेंगे …सो उन्हें भी आश्वस्त किया और कम से कम हजार प्रतियाँ छपवाने का निर्णय लिया जिसमें से पाँच सौ प्रतियाँ अपने लिये सुरक्षित रखीं क्योंकि चाहने वालों की लिस्ट भी तो कम नहीं थी साथ ही समीक्षा के लिये भी तो कहीं सम्मान के लिये एक - एक जगह दस - दस प्रतियाँ भी भेजनी पडती हैं तो उसके लिये भी जरूरी था और लगा दी अपनी ज़िन्दगी की जमापूँजी पूरे विश्वास के साथ अपनी चिर अभिलाषा के पूर्ण होने के लिये……………

अपने आने वाले संग्रह का प्रचार - प्रसार हमने खुद ही इंटरनैट पर करना शुरु कर दिया ताकि आम जन - जन में , देश क्या विदेशों में भी सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारे संग्रह का ही डंका बजे और सब तरफ़ से बधाइयोँ का ताँता लग गया ………शुभकामना संदेशों की बाढ आ गयी …………और हमारा मन मयूर बिन बादलों के भी नृत्य करने लगा ………एक पैर धरती पर तो दूसरा आकाश में विचरण करने लगा …………संग्रह के आने से पहले ही उसकी प्रसिद्धि ने हमारे हौसलों मे परवाज़ भर दी और हम स्वप्नलोक में विचरण करने लगे …………पुस्तक के छपने से पहले ही उसकी समीक्षायें छपवा दीं अपने जानकारों द्वारा ………यानि हर प्रचलित हथकंडा अपनाया ताकि कोई कमी ना रहे …………

और फिर आ गया वो शुभ दिन जिस दिन हमारे संग्रह का लोकार्पण होने वाला था …………बेहद उत्साहित हमारा ह्रदय तो जैसे कंठ में आकर रुक गया था , पाँव जमीन पर चलने से इंकार करने लगे थे मगर जैसे तैसे खुद को संयत किया आखिर ये मुकाम यूँ ही थोडे पाया था काफ़ी मेहनत की थी …………खुद को समझाया और चल दिये लोकार्पण हाल की तरफ़ …………खचाखच भीड से भरा हाल , कैमरे, विभिन्न मैगज़ीनों अखबारों के  पत्रकार आदि , नामी गिरामी हस्तियाँ और उनके बीच खुद को बैठा देखना किसी स्वप्न के साकार होने से कम नहीं था …………और फिर वो क्षण आया जब हमारी पुस्तक का लोकार्पण हुआ और मुख्य अतिथि ने अपना वक्तव्य दिया …………बस वो क्षण जैसे हमारे लिये वहीं ठहर गया जैसे ही मुख्य अतिथि ने कहा यूँ तो इतने संग्रहों का विमोचन किया और पढे भी और उन पर अपना वक्तव्य भी दिया मगर ऐसा संग्रह हाथ से आज तक नहीं गुजरा …………ये सुनते ही हमारे अरमान थर्मामीटर मे पारे की तरह चढने लगे …………आगे उन्होने कहा …………आज़ इंटरनैट बाबा की कृपा से रोज नये - नये लिक्खाड खुद को साबित करने में जुटे हैं । यहाँ तक कि जैसा लिखने वाले हैं वैसे ही वाह वाही करने वाले हैं वहाँ जो हर लेखक को महान कवि साबित करने मे जुटे हैं । इस इंटरनैट क्रांति ने आज रचनाओं का परिदृश्य ही बदल दिया है , कोई भी ना तो मनोयोग से लिखता है और ना ही मनोयोग से कोई उसे पढता है , सब जल्दी में होते हैं कि इसे पढ लिया अब दूसरे को भी आभास करा दें हम तुम्हें पढते हैं ताकि वो भी आप तक पहुँचता रहे और आपका खुद को तसल्ली देने का कारोबार चलता रहे । जब ऐसा वातावरण होगा जहाँ रचनायें सिर्फ़ वक्ती जामा पहने चल रही हों तो कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वहाँ से कोई महान कवि या लेखक का जन्म होगा सिर्फ़ कुछ एक आध को छोडकर । कोई कोई ही पूरी लगन , मेहनत और निष्ठा से अपने कार्य को अंजाम देता है और प्रसिद्ध भी होता है …………उनका इतना कहना था और हमारा दिल तो बल्लियों उछलने लगा और लगा आज हमारे कार्य का सही मूल्यांकन हुआ है , अब हमें प्रसिद्ध होने से और किताब के बिकने से कोई नहीं रोक सकता क्योंकि जाने माने कवि , आलोचक जब हमारे बारे में ऐसा कहेंगे तो ये सर्वविदित है कि हर कोई उस संग्रह को अपनी शैल्फ़ में सहेजना चाहेगा ………हम अपने ख्यालों के भंवर में अभी डूब -उतर ही रहे थे कि उनकी अगली पंक्ति तो जैसे हम पर , हमारे ख्यालों पर ओलावृष्टि करती प्रतीत हुयी जैसे उन्होंने कहा कि बचकानी तुकबंदियाँ , बेतुकी कवितायें , बे -सिर पैर की रचनाओं से लबरेज़ ये संग्रह सहेजने तो क्या पढने के योग्य भी नहीं है …………हमारे तो पैरों तले जमीन ही खिसक गयी …………कहीं गलत तो नहीं सुन लिया , कहीं हम सपना तो नहीं देख रहे ये देखने को खुद को ही चिकोटी काटी तो अहसास हुआ नहीं हम ही हैं ये ……हमारी तो आशाओं और सपनों की लाश का ऐसा वीभत्स पोस्टमार्टम होगा हमने तो सपने में भी नहीं सोचा था ………तो क्या जो दाद हमें इंटरनैट महाराज की कृपा से मिला करती थी वो सब झूठी थी, जो दोस्त बन सराहते थे वो सब झूठे थे ……… सोचते - सोचते हम कब तक जमीन पर बैठे रहे पता ही नहीं चला ………वो तो भला हो वहाँ के सिक्योरिटी आफ़ीसर का जो उसने हमें हिला कर वस्तुस्थिति से अवगत कराया तो देखा पूरा हाल खाली था और हम अपने 1000 किताबों के संग्रह के साथ अकेले अपने हाल पर हँस रहे थे …………कल तक दूसरों की आलोचना करने वाला , प्रसिद्धि के लिये अनुचित हथकंडे अपनाने वाला आज जमीन पर भी पाँव रखने से डर रहा था , आज उसे अपनी वास्तविक स्थिति का बोध हुआ था और जो उसने दूसरों पर कीचड उछाली थी उसे खुद पर महसूस किया था ………………और सोच रहा था ………प्रसिद्धि का शार्टकट वाकई में शार्ट होता है ……………

Saturday, January 26, 2013

क्या है हमारा राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस ???


भारत में 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस (Republic Day) मनाया जाता है और यह भारत का एक राष्ट्रीय पर्व है। हर वर्ष 26 जनवरी एक ऐसा दिन है जब प्रत्‍येक भारतीय के मन में देश भक्ति की लहर और मातृभूमि के प्रति अपार स्‍नेह भर उठता है। ऐसी अनेक महत्त्वपूर्ण स्‍मृतियां हैं जो इस दिन के साथ जुड़ी हुई है।
26 जनवरी, 1950 को देश का संविधान लागू हुआ और इस प्रकार यह सरकार के संसदीय रूप के साथ एक संप्रभुताशाली समाजवादी लोक‍तांत्रिक गणतंत्र के रूप में भारत देश सामने आया।
भारतीय संविधान, जिसे देश की सरकार की रूपरेखा का प्रतिनिधित्‍व करने वाले पर्याप्‍त विचार विमर्श के बाद विधान मंडल द्वारा अपनाया गया, तब से 26 जनवरी को भारत के गणतंत्र दिवस के रूप में भारी उत्‍साह के साथ मनाया जाता है और इसे राष्‍ट्रीय अवकाश घोषित किया जाता है।
यह आयोजन हमें देश के सभी शहीदों के नि:स्‍वार्थ बलिदान की याद दिलाता है, जिन्‍होंने आज़ादी के संघर्ष में अपने जीवन बलिदान कर दिए और विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध अनेक लड़ाइयाँ जीती।

इतिहास

भारत के संविधान को लागू किए जाने से पहले भी 26 जनवरी का बहुत महत्त्व था। 26 जनवरी को विशेष दिन के रूप में चिह्नित किया गया था, 31 दिसंबर सन् 1929 के मध्‍य रात्रि में राष्‍ट्र को स्वतंत्र बनाने की पहल करते हुए लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हु‌आ जिसमें प्रस्ताव पारित कर इस बात की घोषणा की ग‌ई कि यदि अंग्रेज़ सरकार 26 जनवरी, 1930 तक भारत को उपनिवेश का पद (डोमीनियन स्टेटस) नहीं प्रदान करेगी तो भारत अपने को पूर्ण स्वतंत्र घोषित कर देगा।
सरकार ने कुछ नहीं किया तब कांग्रेस ने उस दिन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के निश्चय की घोषणा की और अपना सक्रिय आंदोलन आरंभ किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इस लाहौर अधिवेशन में पहली बार तिरंगे झंडे को फहराया गया था परंतु साथ ही इस दिन सर्वसम्मति से एक और महत्त्वपूर्ण फैसला लिया गया कि प्रतिवर्ष 26 जनवरी का दिन पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन सभी स्वतंत्रता सैनानी पूर्ण स्वराज का प्रचार करेंगे। इस तरह 26 जनवरी अघोषित रूप से भारत का स्वतंत्रता दिवस बन गया था। उस दिन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने तक 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा।

भारतीय संविधान सभा

उसी समय भारतीय संविधान सभा की बैठकें होती रहीं, जिसकी पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को हुई, जिसमें भारतीय नेताओं और अंग्रेज़ कैबिनेट मिशन ने भाग लिया। भारत को एक संविधान देने के विषय में कई चर्चाएँ, सिफारिशें और वाद - विवाद किया गया। कई बार संशोधन करने के पश्चात भारतीय संविधान को अंतिम रूप दिया गया जो 3 वर्ष बाद यानी 26 नवंबर, 1949 को आधिकारिक रूप से अपनाया गया। 15 अगस्त, 1947 में अंग्रेजों ने भारत की सत्ता की बागडोर जवाहरलाल नेहरू के हाथों में दे दी, लेकिन भारत का ब्रिटेन के साथ नाता या अंग्रेजों का अधिपत्य समाप्त नहीं हुआ। भारत अभी भी एक ब्रिटिश कॉलोनी की तरह था, जहाँ कि मुद्रा पर ज्योर्ज 6 की तस्वीरें थी। आज़ादी मिलने के बाद तत्कालीन सरकार ने देश के संविधान को फिर से परिभाषित करने की जरूरत महसूस की और संविधान सभा का गठन किया जिसकी अध्यक्षता डॉ. भीमराव अम्बेडकर को मिली, 25 नवम्बर, 1949 को 211 विद्वानों द्वारा 2 महिने और 11 दिन में तैयार देश के संविधान को मंजूरी मिली।
विधायकों ने इस पर हस्ताक्षर किए। और इसके दो दिन बाद यानी 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू कर दिया गया। इस अवसर पर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भारत के प्रथम राष्‍ट्रपति के रूप में शपथ ली तथा 21 तोपों की सलामी के बाद इर्विन स्‍टेडियम में भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज को फहराकर भारतीय गणतंत्र के ऐतिहासिक जन्‍म की घो‍षणा की थी। 26 जनवरी का महत्त्व बना‌ए रखने के लि‌ए विधान निर्मात्री सभा (कांस्टीट्यू‌एंट असेंबली) द्वारा स्वीकृत संविधान में भारत के गणतंत्र स्वरूप को मान्यता प्रदान की ग‌ई। इस तरह से 26 जनवरी एक बार फिर सुर्खियों में आ गया। यह एक संयोग ही था कि कभी भारत का पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाया जाने वाला दिन अब भारत का गणतंत्र दिवस बन गया था। अंग्रेजों के शासनकाल से छुटकारा पाने के 894 दिन बाद हमारा देश स्‍वतंत्र राष्ट्र बना। तब से आज तक हर वर्ष राष्‍ट्रभर में बड़े गर्व और हर्षोल्लास के साथ गणतंत्र दिवस मनाया जाता है। तदनंतर स्वतंत्रता प्राप्ति के वास्तविक दिन 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। यही वह दिन था जब 1965 में हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किया गया।

कांग्रेस अधिवेशन और मुस्लिम लीग
26 जनवरी सन् 1930 को ही कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन में रावी के किनारे पूर्ण स्वतंत्रता प्रस्ताव पास करके आज़ादी का जश्न मनाया था। उसी वक़्त से सारे देश में हर साल 26 जनवरी को पूर्ण स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाने लगा था। जुलाई 1946 में संविधान सभा का चुनाव हुआ, जिसमें 296 सदस्यों की सभा में से मुस्लिम लीग को 73 और कांग्रेस को 211 स्थान मिले थे।
कांग्रेस के नेताओं ने पं. जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, सरदार बल्लभ भाई पटेल, गोविन्द बल्लभ पन्त, श्री बी. जी. खेर, डॉ. पुरुषोत्तम दास टण्डन, मौलाना अबुलकलाम आज़ाद, खान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ाँ, श्री आसफ़ अली, श्री रफ़ी अहमद किदवाई, श्री कृष्ण सिन्हा, श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुन्शी, आचार्य जे. बी. कृपलानी और श्री कृष्णमाचारी आदि थे। इसके अलावा कांग्रेस सेना मेम्बरों में कांग्रेस द्वारा नामांकित सदस्यों में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा, श्री एन. गोपाल स्वामी अयंगर, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर, डॉ. एम. आर. जयकर, श्री अल्लादि कृष्ण स्वामी अय्यर, पं. हृदयनाथ कुंजरू, श्री हरी सिंह गौड़ और प्रोफेसर के. टी.शाह आदि थे। संविधान सभा में कुछ महिलायें भी थीं, जिनमें श्रीमती सरोजिनी नायडू, श्रीमती दुर्गाबाई देशमुख, श्रीमती हंसा मेहता, और श्रीमती रेणुका राय प्रमुख थीं। मुस्लिम लीग में नवाबज़ादा लियाक़त अली ख़ाँ, ख़्वाजा नाज़िमुद्दीम, श्री एच. एस. सुहरावर्दी, सर फ़िरोज़ ख़ाँ नून और मोहम्मद जफ़रुल्ला ख़ाँ, प्रमुख थे। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इस सभा के अध्यक्ष थे। 9 दिसम्बर सन् 1946 को संविधान सभा का पहला अधिवेशन होना निश्चित हुआ। मुस्लिम लीन ने दो संविधान सभाओं की माँग की जिसमें से एक पाकिस्तान के लिए बनाई और दूसरी भारत के लिए।

भारत का विभाजन
3 जून सन् 1947 को माउण्ट बेटन योजना प्रस्तुत की गई, जिसमें प्रस्ताव किया गया कि भारत को दो भागों, भारत और पाकिस्तान में बाँट दिया जाए। कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने ही इस योजना को स्वीकार कर लिया। अप्रैल सन् 1947 में बड़ौदा, बीकानेर, उदयपुर, जोधपुर, रीवा और पटियाला के देशी राज्यों के प्रतिनिधि संविधान सभा में सम्मिलित हो चुके थे। और 14 जुलाई सन् 1947 तक केवल दो देशी राज्यों जम्मू–कश्मीर और हैदराबाद को छोड़कर बाकी देशी राज्यों के प्रतिनिधि संविधान सभा में भाग लेने आ गए थे। 15 अगस्त सन् 1947 को भारत के दो टुकड़े भारत और पाकिस्तान से होकर भारत आज़ाद हुआ। पं. जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने और लाल क़िले पर तिरंगा झण्डा फहराया। अक्टूबर सन् 1947 तक जम्मू और कश्मीर भी भारत में शामिल हो गया और नवम्बर सन् 1948 में हैदराबाद भी।

संविधान पारित
इस प्रकार संसद भारत की मुकम्मल प्रतिनिधि सभा बन गई। 29 अगस्त सन् 1947 के प्रस्ताव के अनुसार एक प्रारूप समिति क़ायम की गई, जिसके सात मेम्बर थे और डॉ. बी. आर. अम्बेडकर उसके चेयरमैन थे। इस समिति ने 21 फ़रवरी सन् 1948 को अपना निर्णय प्रस्तुत कर दिया, जो 4 नवम्बर, सन् 1948 को संसद के सामने रखा गया। इस पर 9 नवम्बर सन् 1948 से 17 अक्टूबर सन् 1949 तक दूसरी खुवांदगी (वाचन) चलती रही जिसमें 7635 धाराएँ पेश की गईं। 14 नवम्बर सन् 1949 से 26 नवम्बर सन् 1949 तक तीसरी खुवांदगी हुई और 26 नवम्बर, 1949 को संविधान पर संविधान सभा हस्ताक्षर होकर संविधान पारित हो गया। 24 जनवरी सन् 1950 को संविधान सभा का अन्तिम अधिवेशन हुआ और इसमें नये संविधान के अनुसार डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को भारतीय गणराज्य का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया। 26 जनवरी सन् 1950 से नया संविधान लागू किया गया। उसी दिन से हर साल 26 जनवरी को भारत में गणतंत्रता दिवस मनाया जाता है।

गणतंत्र की यात्रा

58 वर्ष पहले 21 तोपों की सलामी के बाद भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने फहरा कर 26 जनवरी, 1950 को भारतीय गणतंत्र के ऐतिहासिक जन्‍म की घो‍षणा की। ब्रिटिश राज से छुटकारा पाने 894 दिन बाद हमारा देश स्‍वतंत्र राज्‍य बना। तब से हर वर्ष पूरे राष्‍ट्र में बड़े उत्‍साह और गर्व से यह दिन मनाया जाता है। एक ब्रिटिश उप निवेश से एक सम्‍प्रभुतापूर्ण, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्‍ट्र के रूप में भारत का निर्माण एक ऐतिहासिक घटना रही। यह लगभग 2 दशक पुरानी यात्रा थी जो 1930 में एक सपने के रूप में संकल्पित की गई और 1950 में इसे साकार किया गया। भारतीय गणतंत्र की इस यात्रा पर एक नज़र डालने से हमारे आयोजन और भी अधिक सार्थक हो जाते हैं।

भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस का लाहौर सत्र
गणतंत्र राष्‍ट्र के बीज 31 दिसंबर, 1929 की मध्‍य रात्रि में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के लाहौर सत्र में बोए गए थे। यह सत्र पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्‍यक्षता में आयोजि‍त किया गया था। उस बैठक में उपस्थित लोगों ने 26 जनवरी को "स्‍वतंत्रता दिवस" के रूप में अंकित करने की शपथ ली थी ताकि ब्रिटिश राज से पूर्ण स्‍वतंत्रता के सपने को साकार किया जा सके। लाहौर सत्र में नागरिक अवज्ञा आंदोलन का मार्ग प्रशस्‍त किया गया। यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्‍वराज दिवस के रूप में मनाया जाएगा। पूरे भारत से अनेक भारतीय राजनीतिक दलों और भारतीय क्रांतिकारियों ने सम्‍मान और गर्व सहित इस दिन को मनाने के प्रति एकता दर्शाई।

भारतीय संविधान सभा की बैठकें
भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को की गई, जिसका गठन भारतीय नेताओं और ब्रिटिश कैबिनेट मिशन के बीच हुई बातचीत के परिणाम स्‍वरूप किया गया था। इस सभा का उद्देश्‍य भारत को एक संविधान प्रदान करना था जो दीर्घ अवधि प्रयोजन पूरे करेगा और इसलिए प्रस्‍तावित संविधान के विभिन्‍न पक्षों पर गहराई से अनुसंधान करने के लिए अनेक समितियों की नियुक्ति की गई। सिफारिशों पर चर्चा, वादविवाद किया गया और भारतीय संविधान पर अंतिम रूप देने से पहले कई बार संशोधित किया गया तथा 3 वर्ष बाद 26 नवंबर, 1949 को आधिकारिक रूप से अपनाया गया।

संविधान प्रभावी
जब भारत 15 अगस्त, 1947 को एक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र बना, इसने स्‍वतंत्रता की सच्‍ची भावना का आनन्‍द 26 जनवरी, 1950 को उठाया जब भारतीय संविधान प्रभावी हुआ। इस संविधान से भारत के नागरिकों को अपनी सरकार चुनकर स्‍वयं अपना शासन चलाने का अधिकार मिला। डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद ने गवर्नमेंट हाउस के दरबार हाल में भारत के प्रथम राष्‍ट्रपति के रूप में शपथ ली और इसके बाद राष्‍ट्रपति का काफिला 5 मील की दूरी पर स्थित इर्विन स्‍टेडियम पहुंचा जहां उन्‍होंने राष्‍ट्रीय ध्‍वज फहराया। तब से ही इस ऐतिहासिक दिवस, 26 जनवरी को पूरे देश में एक त्‍यौहार की तरह और राष्‍ट्रीय भावना के साथ मनाया जाता है। इस दिन का अपना अलग महत्‍व है जब भारतीय संविधान को अपनाया गया था। इस गणतंत्र दिवस पर महान भारतीय संविधान को पढ़कर देखें जो उदार लोकतंत्र का परिचायक है, जो इसके भण्‍डार में निहित है।

सांस्‍कृतिक कार्यक्रम और आयोजन
गणतंत्र दिवस हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रीय त्योहार है, इस दिन राष्ट्रपति इंडिया गेट पर भारत के सब राज्यों से आए हुए प्रतिनिधियों तथा भारत की तीनों सेनाओं की सलामी लेते हैं। अनेक प्रकार की सुन्दर–सुन्दर झाँकियाँ नाच–गाने, बैण्ड–बाजे, हाथी, ऊँट, घोड़ों की सवारियाँ, टेंक, तोप, समुद्री जहाज़ और हवाई जहाज़ के नमूने कृषि और उद्योग की झाँकियाँ, स्कूली बच्चों के नाच–गाने करते हुए ग्रुप राष्ट्रपति को सलामी देते हुए चलते हैं। जो कि विजय चौक से शुरू होकर लाल क़िले तक जाते हैं। इस उत्सव में किसी दूसरे देश का कोई मेहमान बुलाया जाता है। उस दिन दर्शकों की इतनी भीड़ होती है कि इंडिया गेट पर ऐसा मालूम होता है जैसे इन्सानों का समुद्र लहरा रहा हो। रात को इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन, सेंट्रल सेक्रेटेरियट, संसद भवन तथा मुख्य सरकारी इमारतों पर रोशनी की जाती है।
असली मायनों में भारत की जनता को राज्य 26 जनवरी सन् 1950 से ही प्राप्त हुआ। 15 अगस्त सन् 1947 को हम आज़ाद ज़रूर हो गए थे लेकिन हमारा कोई संविधान लागू नहीं हुआ था और न ही कोई गणराज्य का राष्ट्रपति था।
अंग्रेज़ भारत को छोड़कर चले गए और 26 जनवरी को जनता का राज्य हुआ, इसलिए 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी को गणतंत्रता दिवस मनाते हैं। जो जवान आज़ादी की लड़ाई में शहीद हुए उनकी याद में इंडिया गेट पर अमर ज्योति जलाई जाती है।
इसके शीघ्र बाद 21 तोपों की सलामी दी जाती है, राष्‍ट्रपति महोदय द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज फहराया जाता है और राष्‍ट्रगान होता है। इस प्रकार परेड आरंभ होती है। महामहिम राष्‍ट्रपति के साथ एक उल्‍लेखनीय विदेशी राष्‍ट्र प्रमुख आते हैं, जिन्‍हें आयोजन के मुख्‍य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता है।
राष्‍ट्रपति महोदय के सामने से खुली जीपों में वीर सैनिक गुजरते हैं। भारत के राष्ट्रपति, जो भारतीय सशस्‍त्र बल, के मुख्‍य कमांडर हैं, विशाल परेड की सलामी लेते हैं। भारतीय सेना द्वारा इसके नवीनतम हथियारों और बलों का प्रदर्शन किया जाता है जैसे टैंक, मिसाइल, राडार आदि। इसके शीघ्र बाद राष्ट्रपति द्वारा सशस्‍त्र सेना के सैनिकों को बहादुरी के पुरस्‍कार और मेडल दिए जाते हैं जिन्‍होंने अपने क्षेत्र में अभूतपूर्व साहस दिखाया और ऐसे नागरिकों को भी सम्‍मानित किया जाता है जिन्‍होंने विभिन्‍न परिस्थितियों में वीरता के अलग-अलग कारनामे किए। इसके बाद सशस्‍त्र सेना के हेलिकॉप्‍टर दर्शकों पर गुलाब की पंखुडियों की बारिश करते हुए फ्लाई पास्‍ट करते हैं।

सांस्‍कृतिक परेड
सेना की परेड के बाद रंगारंग सांस्‍कृतिक परेड होती है। विभिन्‍न राज्‍यों से आई झांकियों के रूप में भारत की समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत को दर्शाया जाता है। प्रत्‍येक राज्‍य अपने अनोखे त्‍यौहारों, ऐतिहासिक स्‍थलों और कला का प्रदर्शन करते हैं। यह प्रदर्शनी भारत की संस्कृति की विविधता और समृद्धि को एक त्‍यौहार का रंग देती है। विभिन्‍न सरकारी विभागों और भारत सरकार के मंत्रालयों की झांकियां भी राष्‍ट्र की प्रगति में अपने योगदान प्रस्‍तुत करती है। इस परेड का सबसे खुशनुमा हिस्‍सा तब आता है जब बच्‍चे, जिन्‍हें राष्‍ट्रीय वीरता पुरस्‍कार हाथियों पर बैठकर सामने आते हैं। पूरे देश के स्‍कूली बच्‍चे परेड में अलग-अलग लोक नृत्‍य और देश भक्ति की धुनों पर गीत प्रस्‍तुत करते हैं। परेड में कुशल मोटर साइकिल सवार, जो सशस्‍त्र सेना कार्मिक होते हैं, अपने प्रदर्शन करते हैं। परेड का सर्वाधिक प्रतीक्षित भाग फ्लाई पास्‍ट है जो भारतीय वायु सेना द्वारा किया जाता है। फ्लाई पास्‍ट परेड का अंतिम पड़ाव है, जब भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान राष्‍ट्रपति का अभिवादन करते हुए मंच पर से गुजरते हैं।

प्रधानमंत्री की रैली
गणतंत्र दिवस का आयोजन कुल मिलाकर तीन दिनों का होता है और 27 जनवरी को इंडिया गेट पर इस आयोजन के बाद प्रधानमंत्री की रैली में एनसीसी केडेट्स द्वारा विभिन्‍न चौंका देने वाले प्रदर्शन और ड्रिल किए जाते हैं।

लोक तरंग
सात क्षेत्रीय सांस्‍कृतिक केन्‍द्रों के साथ मिलकर संस्‍कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा हर वर्ष 24 से 29 जनवरी के बीच ‘’लोक तरंग – राष्‍ट्रीय लोक नृत्‍य समारोह’’ आयोजित किया जाता है। इस आयोजन में लोगों को देश के विभिन्‍न भागों से आए रंग बिरंगे और चमकदार और वास्‍तविक लोक नृत्‍य देखने का अनोखा अवसर मिलता है।

बीटिंग द रिट्रीट
बीटिंग द रिट्रीट गणतंत्र दिवस आयोजनों का आधिकारिक रूप से समापन घोषित करता है। सभी महत्‍वपूर्ण सरकारी भवनों को 26 जनवरी से 29 जनवरी के बीच रोशनी से सुंदरता पूर्वक सजाया जाता है। हर वर्ष 29 जनवरी की शाम को अर्थात गणतंत्र दिवस के बाद अर्थात गणतंत्र की तीसरे दिन बीटिंग द रिट्रीट आयोजन किया जाता है। यह आयोजन तीन सेनाओं के एक साथ मिलकर सामूहिक बैंड वादन से आरंभ होता है जो लोकप्रिय मार्चिंग धुनें बजाते हैं। ड्रमर भी एकल प्रदर्शन (जिसे ड्रमर्स कॉल कहते हैं) करते हैं। ड्रमर्स द्वारा एबाइडिड विद मी (यह महात्मा गाँधी की प्रिय धुनों में से एक कहीं जाती है) बजाई जाती है और ट्युबुलर घंटियों द्वारा चाइम्‍स बजाई जाती हैं, जो काफ़ी दूरी पर रखी होती हैं और इससे एक मनमोहक दृश्‍य बनता है। इसके बाद रिट्रीट का बिगुल वादन होता है, जब बैंड मास्‍टर राष्‍ट्रपति के समीप जाते हैं और बैंड वापिस ले जाने की अनुमति मांगते हैं। तब सूचित किया जाता है कि समापन समारोह पूरा हो गया है। बैंड मार्च वापस जाते समय लोकप्रिय धुन सारे जहाँ से अच्‍छा बजाते हैं। ठीक शाम 6 बजे बगलर्स रिट्रीट की धुन बजाते हैं और राष्‍ट्रीय ध्‍वज को उतार लिया जाता हैं तथा राष्‍ट्रगान गाया जाता है और इस प्रकार गणतंत्र दिवस के आयोजन का औपचारिक समापन होता हैं।
क्या है हमारा राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस ?

(चित्र : प्रथम गणतंत्र दिवस, 1950 की कुछ झलकियाँ)

भारत में 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस (Republic Day) मनाया जाता है और यह भारत का एक राष्ट्रीय पर्व है। हर वर्ष 26 जनवरी एक ऐसा दिन है जब प्रत्‍येक भारतीय के मन में देश भक्ति की लहर और मातृभूमि के प्रति अपार स्‍नेह भर उठता है। ऐसी अनेक महत्त्वपूर्ण स्‍मृतियां हैं जो इस दिन के साथ जुड़ी हुई है।
26 जनवरी, 1950 को देश का संविधान लागू हुआ और इस प्रकार यह सरकार के संसदीय रूप के साथ एक संप्रभुताशाली समाजवादी लोक‍तांत्रिक गणतंत्र के रूप में भारत देश सामने आया।
भारतीय संविधान, जिसे देश की सरकार की रूपरेखा का प्रतिनिधित्‍व करने वाले पर्याप्‍त विचार विमर्श के बाद विधान मंडल द्वारा अपनाया गया, तब से 26 जनवरी को भारत के गणतंत्र दिवस के रूप में भारी उत्‍साह के साथ मनाया जाता है और इसे राष्‍ट्रीय अवकाश घोषित किया जाता है।
यह आयोजन हमें देश के सभी शहीदों के नि:स्‍वार्थ बलिदान की याद दिलाता है, जिन्‍होंने आज़ादी के संघर्ष में अपने जीवन बलिदान कर दिए और विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध अनेक लड़ाइयाँ जीती।

इतिहास

भारत के संविधान को लागू किए जाने से पहले भी 26 जनवरी का बहुत महत्त्व था। 26 जनवरी को विशेष दिन के रूप में चिह्नित किया गया था, 31 दिसंबर सन् 1929 के मध्‍य रात्रि में राष्‍ट्र को स्वतंत्र बनाने की पहल करते हुए लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हु‌आ जिसमें प्रस्ताव पारित कर इस बात की घोषणा की ग‌ई कि यदि अंग्रेज़ सरकार 26 जनवरी, 1930 तक भारत को उपनिवेश का पद (डोमीनियन स्टेटस) नहीं प्रदान करेगी तो भारत अपने को पूर्ण स्वतंत्र घोषित कर देगा। 
सरकार ने कुछ नहीं किया तब कांग्रेस ने उस दिन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के निश्चय की घोषणा की और अपना सक्रिय आंदोलन आरंभ किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इस लाहौर अधिवेशन में पहली बार तिरंगे झंडे को फहराया गया था परंतु साथ ही इस दिन सर्वसम्मति से एक और महत्त्वपूर्ण फैसला लिया गया कि प्रतिवर्ष 26 जनवरी का दिन पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन सभी स्वतंत्रता सैनानी पूर्ण स्वराज का प्रचार करेंगे। इस तरह 26 जनवरी अघोषित रूप से भारत का स्वतंत्रता दिवस बन गया था। उस दिन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने तक 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा। 

भारतीय संविधान सभा

उसी समय भारतीय संविधान सभा की बैठकें होती रहीं, जिसकी पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को हुई, जिसमें भारतीय नेताओं और अंग्रेज़ कैबिनेट मिशन ने भाग लिया। भारत को एक संविधान देने के विषय में कई चर्चाएँ, सिफारिशें और वाद - विवाद किया गया। कई बार संशोधन करने के पश्चात भारतीय संविधान को अंतिम रूप दिया गया जो 3 वर्ष बाद यानी 26 नवंबर, 1949 को आधिकारिक रूप से अपनाया गया। 15 अगस्त, 1947 में अंग्रेजों ने भारत की सत्ता की बागडोर जवाहरलाल नेहरू के हाथों में दे दी, लेकिन भारत का ब्रिटेन के साथ नाता या अंग्रेजों का अधिपत्य समाप्त नहीं हुआ। भारत अभी भी एक ब्रिटिश कॉलोनी की तरह था, जहाँ कि मुद्रा पर ज्योर्ज 6 की तस्वीरें थी। आज़ादी मिलने के बाद तत्कालीन सरकार ने देश के संविधान को फिर से परिभाषित करने की जरूरत महसूस की और संविधान सभा का गठन किया जिसकी अध्यक्षता डॉ. भीमराव अम्बेडकर को मिली, 25 नवम्बर, 1949 को 211 विद्वानों द्वारा 2 महिने और 11 दिन में तैयार देश के संविधान को मंजूरी मिली।  
विधायकों ने इस पर हस्ताक्षर किए। और इसके दो दिन बाद यानी 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू कर दिया गया। इस अवसर पर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भारत के प्रथम राष्‍ट्रपति के रूप में शपथ ली तथा 21 तोपों की सलामी के बाद इर्विन स्‍टेडियम में भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज को फहराकर भारतीय गणतंत्र के ऐतिहासिक जन्‍म की घो‍षणा की थी। 26 जनवरी का महत्त्व बना‌ए रखने के लि‌ए विधान निर्मात्री सभा (कांस्टीट्यू‌एंट असेंबली) द्वारा स्वीकृत संविधान में भारत के गणतंत्र स्वरूप को मान्यता प्रदान की ग‌ई। इस तरह से 26 जनवरी एक बार फिर सुर्खियों में आ गया। यह एक संयोग ही था कि कभी भारत का पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाया जाने वाला दिन अब भारत का गणतंत्र दिवस बन गया था। अंग्रेजों के शासनकाल से छुटकारा पाने के 894 दिन बाद हमारा देश स्‍वतंत्र राष्ट्र बना। तब से आज तक हर वर्ष राष्‍ट्रभर में बड़े गर्व और हर्षोल्लास के साथ गणतंत्र दिवस मनाया जाता है। तदनंतर स्वतंत्रता प्राप्ति के वास्तविक दिन 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। यही वह दिन था जब 1965 में हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किया गया।

कांग्रेस अधिवेशन और मुस्लिम लीग
26 जनवरी सन् 1930 को ही कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन में रावी के किनारे पूर्ण स्वतंत्रता प्रस्ताव पास करके आज़ादी का जश्न मनाया था। उसी वक़्त से सारे देश में हर साल 26 जनवरी को पूर्ण स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाने लगा था। जुलाई 1946 में संविधान सभा का चुनाव हुआ, जिसमें 296 सदस्यों की सभा में से मुस्लिम लीग को 73 और कांग्रेस को 211 स्थान मिले थे।  
कांग्रेस के नेताओं ने पं. जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, सरदार बल्लभ भाई पटेल, गोविन्द बल्लभ पन्त, श्री बी. जी. खेर, डॉ. पुरुषोत्तम दास टण्डन, मौलाना अबुलकलाम आज़ाद, खान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ाँ, श्री आसफ़ अली, श्री रफ़ी अहमद किदवाई, श्री कृष्ण सिन्हा, श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुन्शी, आचार्य जे. बी. कृपलानी और श्री कृष्णमाचारी आदि थे। इसके अलावा कांग्रेस सेना मेम्बरों में कांग्रेस द्वारा नामांकित सदस्यों में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा, श्री एन. गोपाल स्वामी अयंगर, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर, डॉ. एम. आर. जयकर, श्री अल्लादि कृष्ण स्वामी अय्यर, पं. हृदयनाथ कुंजरू, श्री हरी सिंह गौड़ और प्रोफेसर के. टी.शाह आदि थे। संविधान सभा में कुछ महिलायें भी थीं, जिनमें श्रीमती सरोजिनी नायडू, श्रीमती दुर्गाबाई देशमुख, श्रीमती हंसा मेहता, और श्रीमती रेणुका राय प्रमुख थीं। मुस्लिम लीग में नवाबज़ादा लियाक़त अली ख़ाँ, ख़्वाजा नाज़िमुद्दीम, श्री एच. एस. सुहरावर्दी, सर फ़िरोज़ ख़ाँ नून और मोहम्मद जफ़रुल्ला ख़ाँ, प्रमुख थे। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इस सभा के अध्यक्ष थे। 9 दिसम्बर सन् 1946 को संविधान सभा का पहला अधिवेशन होना निश्चित हुआ। मुस्लिम लीन ने दो संविधान सभाओं की माँग की जिसमें से एक पाकिस्तान के लिए बनाई और दूसरी भारत के लिए। 

भारत का विभाजन
3 जून सन् 1947 को माउण्ट बेटन योजना प्रस्तुत की गई, जिसमें प्रस्ताव किया गया कि भारत को दो भागों, भारत और पाकिस्तान में बाँट दिया जाए। कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने ही इस योजना को स्वीकार कर लिया। अप्रैल सन् 1947 में बड़ौदा, बीकानेर, उदयपुर, जोधपुर, रीवा और पटियाला के देशी राज्यों के प्रतिनिधि संविधान सभा में सम्मिलित हो चुके थे। और 14 जुलाई सन् 1947 तक केवल दो देशी राज्यों जम्मू–कश्मीर और हैदराबाद को छोड़कर बाकी देशी राज्यों के प्रतिनिधि संविधान सभा में भाग लेने आ गए थे। 15 अगस्त सन् 1947 को भारत के दो टुकड़े भारत और पाकिस्तान से होकर भारत आज़ाद हुआ। पं. जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने और लाल क़िले पर तिरंगा झण्डा फहराया। अक्टूबर सन् 1947 तक जम्मू और कश्मीर भी भारत में शामिल हो गया और नवम्बर सन् 1948 में हैदराबाद भी।

संविधान पारित
इस प्रकार संसद भारत की मुकम्मल प्रतिनिधि सभा बन गई। 29 अगस्त सन् 1947 के प्रस्ताव के अनुसार एक प्रारूप समिति क़ायम की गई, जिसके सात मेम्बर थे और डॉ. बी. आर. अम्बेडकर उसके चेयरमैन थे। इस समिति ने 21 फ़रवरी सन् 1948 को अपना निर्णय प्रस्तुत कर दिया, जो 4 नवम्बर, सन् 1948 को संसद के सामने रखा गया। इस पर 9 नवम्बर सन् 1948 से 17 अक्टूबर सन् 1949 तक दूसरी खुवांदगी (वाचन) चलती रही जिसमें 7635 धाराएँ पेश की गईं। 14 नवम्बर सन् 1949 से 26 नवम्बर सन् 1949 तक तीसरी खुवांदगी हुई और 26 नवम्बर, 1949 को संविधान पर संविधान सभा हस्ताक्षर होकर संविधान पारित हो गया। 24 जनवरी सन् 1950 को संविधान सभा का अन्तिम अधिवेशन हुआ और इसमें नये संविधान के अनुसार डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को भारतीय गणराज्य का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया। 26 जनवरी सन् 1950 से नया संविधान लागू किया गया। उसी दिन से हर साल 26 जनवरी को भारत में गणतंत्रता दिवस मनाया जाता है।

गणतंत्र की यात्रा

58 वर्ष पहले 21 तोपों की सलामी के बाद भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने फहरा कर 26 जनवरी, 1950 को भारतीय गणतंत्र के ऐतिहासिक जन्‍म की घो‍षणा की। ब्रिटिश राज से छुटकारा पाने 894 दिन बाद हमारा देश स्‍वतंत्र राज्‍य बना। तब से हर वर्ष पूरे राष्‍ट्र में बड़े उत्‍साह और गर्व से यह दिन मनाया जाता है। एक ब्रिटिश उप निवेश से एक सम्‍प्रभुतापूर्ण, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्‍ट्र के रूप में भारत का निर्माण एक ऐतिहासिक घटना रही। यह लगभग 2 दशक पुरानी यात्रा थी जो 1930 में एक सपने के रूप में संकल्पित की गई और 1950 में इसे साकार किया गया। भारतीय गणतंत्र की इस यात्रा पर एक नज़र डालने से हमारे आयोजन और भी अधिक सार्थक हो जाते हैं।

भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस का लाहौर सत्र
गणतंत्र राष्‍ट्र के बीज 31 दिसंबर, 1929 की मध्‍य रात्रि में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के लाहौर सत्र में बोए गए थे। यह सत्र पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्‍यक्षता में आयोजि‍त किया गया था। उस बैठक में उपस्थित लोगों ने 26 जनवरी को "स्‍वतंत्रता दिवस" के रूप में अंकित करने की शपथ ली थी ताकि ब्रिटिश राज से पूर्ण स्‍वतंत्रता के सपने को साकार किया जा सके। लाहौर सत्र में नागरिक अवज्ञा आंदोलन का मार्ग प्रशस्‍त किया गया। यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्‍वराज दिवस के रूप में मनाया जाएगा। पूरे भारत से अनेक भारतीय राजनीतिक दलों और भारतीय क्रांतिकारियों ने सम्‍मान और गर्व सहित इस दिन को मनाने के प्रति एकता दर्शाई।

भारतीय संविधान सभा की बैठकें
भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को की गई, जिसका गठन भारतीय नेताओं और ब्रिटिश कैबिनेट मिशन के बीच हुई बातचीत के परिणाम स्‍वरूप किया गया था। इस सभा का उद्देश्‍य भारत को एक संविधान प्रदान करना था जो दीर्घ अवधि प्रयोजन पूरे करेगा और इसलिए प्रस्‍तावित संविधान के विभिन्‍न पक्षों पर गहराई से अनुसंधान करने के लिए अनेक समितियों की नियुक्ति की गई। सिफारिशों पर चर्चा, वादविवाद किया गया और भारतीय संविधान पर अंतिम रूप देने से पहले कई बार संशोधित किया गया तथा 3 वर्ष बाद 26 नवंबर, 1949 को आधिकारिक रूप से अपनाया गया।

संविधान प्रभावी
जब भारत 15 अगस्त, 1947 को एक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र बना, इसने स्‍वतंत्रता की सच्‍ची भावना का आनन्‍द 26 जनवरी, 1950 को उठाया जब भारतीय संविधान प्रभावी हुआ। इस संविधान से भारत के नागरिकों को अपनी सरकार चुनकर स्‍वयं अपना शासन चलाने का अधिकार मिला। डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद ने गवर्नमेंट हाउस के दरबार हाल में भारत के प्रथम राष्‍ट्रपति के रूप में शपथ ली और इसके बाद राष्‍ट्रपति का काफिला 5 मील की दूरी पर स्थित इर्विन स्‍टेडियम पहुंचा जहां उन्‍होंने राष्‍ट्रीय ध्‍वज फहराया। तब से ही इस ऐतिहासिक दिवस, 26 जनवरी को पूरे देश में एक त्‍यौहार की तरह और राष्‍ट्रीय भावना के साथ मनाया जाता है। इस दिन का अपना अलग महत्‍व है जब भारतीय संविधान को अपनाया गया था। इस गणतंत्र दिवस पर महान भारतीय संविधान को पढ़कर देखें जो उदार लोकतंत्र का परिचायक है, जो इसके भण्‍डार में निहित है।

सांस्‍कृतिक कार्यक्रम और आयोजन
गणतंत्र दिवस हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रीय त्योहार है, इस दिन राष्ट्रपति इंडिया गेट पर भारत के सब राज्यों से आए हुए प्रतिनिधियों तथा भारत की तीनों सेनाओं की सलामी लेते हैं। अनेक प्रकार की सुन्दर–सुन्दर झाँकियाँ नाच–गाने, बैण्ड–बाजे, हाथी, ऊँट, घोड़ों की सवारियाँ, टेंक, तोप, समुद्री जहाज़ और हवाई जहाज़ के नमूने कृषि और उद्योग की झाँकियाँ, स्कूली बच्चों के नाच–गाने करते हुए ग्रुप राष्ट्रपति को सलामी देते हुए चलते हैं। जो कि विजय चौक से शुरू होकर लाल क़िले तक जाते हैं। इस उत्सव में किसी दूसरे देश का कोई मेहमान बुलाया जाता है। उस दिन दर्शकों की इतनी भीड़ होती है कि इंडिया गेट पर ऐसा मालूम होता है जैसे इन्सानों का समुद्र लहरा रहा हो। रात को इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन, सेंट्रल सेक्रेटेरियट, संसद भवन तथा मुख्य सरकारी इमारतों पर रोशनी की जाती है।
असली मायनों में भारत की जनता को राज्य 26 जनवरी सन् 1950 से ही प्राप्त हुआ। 15 अगस्त सन् 1947 को हम आज़ाद ज़रूर हो गए थे लेकिन हमारा कोई संविधान लागू नहीं हुआ था और न ही कोई गणराज्य का राष्ट्रपति था।
अंग्रेज़ भारत को छोड़कर चले गए और 26 जनवरी को जनता का राज्य हुआ, इसलिए 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी को गणतंत्रता दिवस मनाते हैं। जो जवान आज़ादी की लड़ाई में शहीद हुए उनकी याद में इंडिया गेट पर अमर ज्योति जलाई जाती है।
इसके शीघ्र बाद 21 तोपों की सलामी दी जाती है, राष्‍ट्रपति महोदय द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज फहराया जाता है और राष्‍ट्रगान होता है। इस प्रकार परेड आरंभ होती है। महामहिम राष्‍ट्रपति के साथ एक उल्‍लेखनीय विदेशी राष्‍ट्र प्रमुख आते हैं, जिन्‍हें आयोजन के मुख्‍य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता है।
राष्‍ट्रपति महोदय के सामने से खुली जीपों में वीर सैनिक गुजरते हैं। भारत के राष्ट्रपति, जो भारतीय सशस्‍त्र बल, के मुख्‍य कमांडर हैं, विशाल परेड की सलामी लेते हैं। भारतीय सेना द्वारा इसके नवीनतम हथियारों और बलों का प्रदर्शन किया जाता है जैसे टैंक, मिसाइल, राडार आदि। इसके शीघ्र बाद राष्ट्रपति द्वारा सशस्‍त्र सेना के सैनिकों को बहादुरी के पुरस्‍कार और मेडल दिए जाते हैं जिन्‍होंने अपने क्षेत्र में अभूतपूर्व साहस दिखाया और ऐसे नागरिकों को भी सम्‍मानित किया जाता है जिन्‍होंने विभिन्‍न परिस्थितियों में वीरता के अलग-अलग कारनामे किए। इसके बाद सशस्‍त्र सेना के हेलिकॉप्‍टर दर्शकों पर गुलाब की पंखुडियों की बारिश करते हुए फ्लाई पास्‍ट करते हैं।

सांस्‍कृतिक परेड
सेना की परेड के बाद रंगारंग सांस्‍कृतिक परेड होती है। विभिन्‍न राज्‍यों से आई झांकियों के रूप में भारत की समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत को दर्शाया जाता है। प्रत्‍येक राज्‍य अपने अनोखे त्‍यौहारों, ऐतिहासिक स्‍थलों और कला का प्रदर्शन करते हैं। यह प्रदर्शनी भारत की संस्कृति की विविधता और समृद्धि को एक त्‍यौहार का रंग देती है। विभिन्‍न सरकारी विभागों और भारत सरकार के मंत्रालयों की झांकियां भी राष्‍ट्र की प्रगति में अपने योगदान प्रस्‍तुत करती है। इस परेड का सबसे खुशनुमा हिस्‍सा तब आता है जब बच्‍चे, जिन्‍हें राष्‍ट्रीय वीरता पुरस्‍कार हाथियों पर बैठकर सामने आते हैं। पूरे देश के स्‍कूली बच्‍चे परेड में अलग-अलग लोक नृत्‍य और देश भक्ति की धुनों पर गीत प्रस्‍तुत करते हैं। परेड में कुशल मोटर साइकिल सवार, जो सशस्‍त्र सेना कार्मिक होते हैं, अपने प्रदर्शन करते हैं। परेड का सर्वाधिक प्रतीक्षित भाग फ्लाई पास्‍ट है जो भारतीय वायु सेना द्वारा किया जाता है। फ्लाई पास्‍ट परेड का अंतिम पड़ाव है, जब भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान राष्‍ट्रपति का अभिवादन करते हुए मंच पर से गुजरते हैं।

प्रधानमंत्री की रैली
गणतंत्र दिवस का आयोजन कुल मिलाकर तीन दिनों का होता है और 27 जनवरी को इंडिया गेट पर इस आयोजन के बाद प्रधानमंत्री की रैली में एनसीसी केडेट्स द्वारा विभिन्‍न चौंका देने वाले प्रदर्शन और ड्रिल किए जाते हैं।

लोक तरंग
सात क्षेत्रीय सांस्‍कृतिक केन्‍द्रों के साथ मिलकर संस्‍कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा हर वर्ष 24 से 29 जनवरी के बीच ‘’लोक तरंग – राष्‍ट्रीय लोक नृत्‍य समारोह’’ आयोजित किया जाता है। इस आयोजन में लोगों को देश के विभिन्‍न भागों से आए रंग बिरंगे और चमकदार और वास्‍तविक लोक नृत्‍य देखने का अनोखा अवसर मिलता है।

बीटिंग द रिट्रीट
बीटिंग द रिट्रीट गणतंत्र दिवस आयोजनों का आधिकारिक रूप से समापन घोषित करता है। सभी महत्‍वपूर्ण सरकारी भवनों को 26 जनवरी से 29 जनवरी के बीच रोशनी से सुंदरता पूर्वक सजाया जाता है। हर वर्ष 29 जनवरी की शाम को अर्थात गणतंत्र दिवस के बाद अर्थात गणतंत्र की तीसरे दिन बीटिंग द रिट्रीट आयोजन किया जाता है। यह आयोजन तीन सेनाओं के एक साथ मिलकर सामूहिक बैंड वादन से आरंभ होता है जो लोकप्रिय मार्चिंग धुनें बजाते हैं। ड्रमर भी एकल प्रदर्शन (जिसे ड्रमर्स कॉल कहते हैं) करते हैं। ड्रमर्स द्वारा एबाइडिड विद मी (यह महात्मा गाँधी की प्रिय धुनों में से एक कहीं जाती है) बजाई जाती है और ट्युबुलर घंटियों द्वारा चाइम्‍स बजाई जाती हैं, जो काफ़ी दूरी पर रखी होती हैं और इससे एक मनमोहक दृश्‍य बनता है। इसके बाद रिट्रीट का बिगुल वादन होता है, जब बैंड मास्‍टर राष्‍ट्रपति के समीप जाते हैं और बैंड वापिस ले जाने की अनुमति मांगते हैं। तब सूचित किया जाता है कि समापन समारोह पूरा हो गया है। बैंड मार्च वापस जाते समय लोकप्रिय धुन सारे जहाँ से अच्‍छा बजाते हैं। ठीक शाम 6 बजे बगलर्स रिट्रीट की धुन बजाते हैं और राष्‍ट्रीय ध्‍वज को उतार लिया जाता हैं तथा राष्‍ट्रगान गाया जाता है और इस प्रकार गणतंत्र दिवस के आयोजन का औपचारिक समापन होता हैं।naa kewal tera - naa kewal mera ye watan , ye to sabka hai !! bhaaiyo !! sabko apni tarah se rahne , khaane , peene or apne parmatma ko apne tarike se manaane ka ek baraabar haque hai !! lekin uska prchaar karke doosre par thopne ya kisi ko daraane ka haque nilkul bhi nahi hai ...!! jai - hind !! क्यों मित्रो !! आपका क्या कहना है ,इस विषय पर...??
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Thursday, January 24, 2013

"सिसक रहा गणतन्त्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



गाकर आज सुनाता हूँ मैं,
गाथा हिन्दुस्तान की।
नहीं रही अब कोई कीमत,
वीरों के बलिदान की।।

नहीं रहे अब वीर शिवा,
राणा जैसे अपने शासक,
राजा और वजीर आज के,
बने हुए थोथे भाषक,
लज्जा की है बात बहुत,
ये बात नहीं अभिमान की।
नहीं रही अब कोई कीमत,
वीरों के बलिदान की।।

कहने को तो आजादी है,
मन में वही गुलामी है,
पश्चिम के देशों का भारत,
बना हुए अनुगामी है,
मक्कारों ने कमर तोड़ दी,
आन-बान और शान की।
नहीं रही अब कोई कीमत,
वीरों के बलिदान की।।

बाप बना राजा तो उसका,
बेटा राजकुमार बना,
प्रजातन्त्र की फुलवारी में,
उपजा खरपतवार घना,
लोकतन्त्र में गन्ध आ रही,
खद्दर के परिधान की।
नहीं रही अब कोई कीमत,
वीरों के बलिदान की।।

देशी नाम-विधान विदेशी,
सिसक रहा गणतन्त्र यहाँ,
लचर व्यवस्था देख-देखकर,
खिसक रहा जनतन्त्र यहाँ,
हार गई फरियाद यहाँ पर,
अब सच्चे इन्सान की।
नहीं रही अब कोई कीमत,
वीरों के बलिदान की।।
क्यों मित्रो !! आपका क्या कहना है ,इस विषय पर...??
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" न्याय करना सीखो ....!! कांग्रेसियों !!

"यदि सच न बोलने की और सच न स्वीकारने की गीता /कुरआन /बाइबिल या संविधान की कसम खा रखी है तो दीगर बात है ...अगर साम्प्रदायिकता को कानी आँख से देखने की कसम खा राखी है तो दीगर बात है ... वरना क्या यह गलत है कि बाबरी मस्जिद ढहाई जाने से पहले औरंगजेब ने 6000 से भी अधिक हिन्दू मंदिर नहीं तोड़े ?...क्या यह गलत है कि इस्लाम कबूल करने से मना करने पर कई सिख हिन्दुओं के सर कलम करवाए गए ? क्या यह गलत है कि अकेले जम्मू-कश्मीर में गुजरे सालों में 210 से भी अधिक मंदिर तोड़े गए ? ...क्या यह गलत है कि जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं को अपनी औरते छोड़ कर पलायन कर जाने के धमकी भरे पोस्टर हिन्दुओं के घर पर मुसलमान आतंकवादीयों ने नहीं लगाए ? ...क्या यह गलत है कि लाखों कश्मीरी हिन्दू मुसलमान आतंकियों की वजह से जम्मू -कश्मीर से बेघर होकर देश के अन्य प्रान्तों में शरणार्थी है ?...क्या यह गलत है कि जम्मू -कश्मीर में सामान्य दिन तो छोड़ दो स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर भी मुसलमान आतंकवादी तिरंगा नहीं फहराने देते ?... क्या यह गलत है कि हिन्दुओं को अपने ही देश में अपने आस्था के तीर्थ अमरनाथ दर्शन करने के लिए मुसलमान आतंकियों के हाथो बड़ी संख्या में सामूहिक क़त्ल-ए-आम का शिकार नहीं होना पड़ता ? ...क्या यह गलत है कि हिन्दुओं को अमरनाथ और वैष्णव देवी के दर्शन के लिए जज़िया नहीं देना पड़ता ? ...क्या यह गलत है कि मुसलमानों को हज यात्रा के लिए जो सब्सिडी दी जाती है उसके लिए भी धन जुटाने के लिए हिन्दुओं से भी टैक्स की उगाही होती है ? ...क्या यह गलत है कि गुजरात के चर्चित दंगों की शुरुआत गोधरा में रेल से यात्रा कर रहे 65 हिन्दू तीर्थ यात्रियों को मुसलमानों द्वारा ज़िंदा जला देने पर हुयी थी ? ...क्या यह गलत है कि मुहम्मद साहब के द्वारा स्थापित मस्जिद चरार-ए-शरीफ को एक मुसलमान आतंकी मस्तगुल ने जला कर राख कर दिया तो मुसलमान चुप रहे ? ...क्या यह गलत है कि राम जन्मभूमि (अयोध्या ) और कृष्ण जन्मभूमि (मथुरा ) पर मस्जिद नहीं बनाईं गईं ? ...क्या यह गलत है कि इस विराट भू-भाग और क्षेत्रफल वाले इस देश में मस्जिद बनाने के लिए जगह की कमी तो थी नहीं ? ...क्या यह गलत है कि कभी हिन्दुओं ने किसी मस्जिद को तोड़ कर कहीं मंदिरनहीं बनाया ? ...क्या यह गलत है कि ईसाईयों ने भी कभी कोई मंदिर या मस्जिद तोड़ कर चर्च नहीं बनाया ? ...क्या यह गलत है कि इस देश में जब और जहां-जहां मुसलमानों का राज्य था वहाँ हजारों मन्दिर तोड़े गए ...आज़ादी के बाद इस देश में जम्मू -कश्मीर में 200 से भी अधिक मंदिर तोड़े गए जबकि गुजरात में गोधरा काण्ड के बाद भड़की प्रति हिंसा में भी एक भी मस्जिद नहीं तोडी गयी ? ...क्या यह गलत है कि गुजरात में गोधरा में हिन्दू तीर्थ यात्रियों को ज़िंदा जलाने के बाद भड़की प्रति हिंसा में भी कोई मस्जिद नहीं तोड़ी गयी ?...क्या यह गलत है कि हिन्दुओं द्वारा बाबरी मस्जिद तोड़े जाने से पहले देश के विभिन्न हिस्सों में मुसलमान हजारों मंदिर तोड़ चुके थे ? ...क्या यह गलत है कि एक बाबरी मस्जिद का तोड़ा जाना हजारों मन्दिरों के तोड़े जाने से उत्पन्न प्रति हिंसा थी ? ...क्या यह गलत है कि गुजरात के दंगे गोधरा काण्ड से शुरू हुए थे और वह गोधरा में ज़िंदा गए 65 हिन्दुओं की घटना से उत्पन्न प्रति हिंसा थी ? ...अगर मुसलमानों का आतंकवाद यों ही जारी रहा और वोट बैंक की लालच में राजनीति ने साम्प्रदायिकता को कानी आँख से देखा तो प्रति हिंसा और प्रति आतंकवाद होना तय है ...जब सह अस्तित्व के सारे प्रयास असफल हो जाएँगे तो " 
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Wednesday, January 23, 2013

" अडवाणी-सुषमा-जेटली ने दिखाई अपनी नेता गिरी "... देर आयद-दुरुस्त आयद ..!!??

  राजनाथ सिंह का शुमार बीजेपी के अनुभवी और तेज-तर्रार नेताओं में होता है। बेशक अध्यक्ष बनने के बाद उनके सामने कई चुनौतियां हैं, लेकिन उनकी संगठन क्षमता सवालों से परे रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके राजनाथ इससे पहले भी बीजेपी अध्यक्ष पद संभाल चुके हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत है उनका मिलनसार व्यक्तित्व और बेदाग छवि। क्या-क्या है राजनाथ की ताकत आप भी जानें-
राजनाथ की ताकत

1. राजनाथ की छवि साफ-सुथरी है। उनके खिलाफ किसी भी तरह के भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे हैं। उनका राजनीतिक करियर अब तक बेदाग रहा है।वो पूरी तरह विवादों से मुक्त रहे हैं।
2. राजनाथ खुद को भाजपा के अलग-अलग गुटों से परे रखते हैं। यही वजह है कि उनके सभी के साथ अच्छे संबंध हैं।
3. राजनाथ कोई भी फैसला लेने से पहले आरआरएस से सलाह अवश्य लेते हैं। यानी आरएसएस का उन्हें पूरा वरदहस्त प्राप्त है।
4. राजनाथ अपनी गलतियों के लिए सहयोगियों से क्षमा मांगने में हिचकिचाते नहीं हैं। यानी उनमें अहम की भावना नहीं है।
5. राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश से आते हैं जहां लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटें हैं। यूपी की जनता उन्हें जानती और पहचानती है।
6. राजनाथ यूपी के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। ऐसे में वो राज्य की राजनीति से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। ये अनुभव लोकसभा चुनाव में उनके काम आ सकता है।
7. राजनाथ हिंदी भाषी हैं, अच्छा बोलते हैं और भाषण देने की कला में पारंगत हैं।
8. राजनाथ राजनीति को अच्छी तरह समझते हैं और इसकी बारीकियों पर ध्यान देते हुए आगे का रास्ता तय करते हैं।
9. दूसरे कई नेताओं की तरह राजनाथ की जुबान फिसलती नहीं है। उनके बयानों पर विवाद नहीं होता। धीर-गंभीर छवि उनके व्यक्तित्व से मेल खाती है।
10. राजनाथ संघ के करीबी हैं और बीजेपी में सभी बड़े नेताओं से उनके अच्छे संबंध हैं।


 राजनाथ सिंह जी को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने पर हार्दिक बधाई, उम्मीद है आपकी अध्यक्षता मे भाजपा भारत के साथ-साथ उत्तर प्रदेश मे भी पुनः जनता मे खोया विश्वास जगा पायेगी
जय हिंद
जय मां भारती
वन्दे मातरम
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Tuesday, January 22, 2013

" दिल..है कि मानता....नहीं..." राहुल जी को P.M. ...!!???

 दिल की बात मानने वाले सभी मित्रों को मेरा   हार्दिक नमस्कार !!
                            जयपुर के " चिंतन-शिविर " में कांग्रेस के भावी प्रधानमंत्री पद के दावेदार राहुल गांधी ने अपने चेलों-गुरुओं को डांटा-समझाया-फुसलाया-रुलाया और सपना भी दिखाया !! सब " भावविह्वल " होकर नाचने-गाने और नारे भी लगाने लगे !! माता श्री सोनिया जी ने भी अपने बेटे को " सत्ता रुपी ज़हर " पीने हेतु अग्रसर कर ही दिया !! 8 साल पहले का " त्याग " अब मोह बन गया ! 
                   लेकिन इतना सबकुछ घट जाने के बाद भी..." दिल है कि मानता नहीं ....हमारे राहुल बाबा प्रधानमंत्री पद पर बैठ पाएंगे..,क्योंकि जो प्रश्न इस चिंतन-शिविर में माँ-बेटे ने खड़े किये , पार्टी में व्याप्त कमियों को लेकर,उनका उत्तर ना तो कोई कांग्रेसी नेता दे पाया और ना ही ये स्वयं !! क्योंकि सवाल करने वाले भी ये, पार्टी-सरकार चलाने वाले भी ये और भविष्य के शासक भी ये ...तो कोई पागल ही होगा जो ये कहे कि महाराज और महारानी जी आप ही " वकील-जज और दोषी " हो !! हमने तो सिर्फ आपके परिवार का हुकुम ही माना है !!
                        राहुल जी ने अपने पिता जी के कई साल पहले गए " वाक्य " को भी यह कहकर सुधारने की कोशिश की कि " अब जनता के पास 100 में से 99 रूपये अवश्य पंहुचेंगे " !! लेकिन जनता पूछती है कि 100 के 100 क्यों नहीं ??? क्या राशि काफी बड़ी हो गयी है इसलिए कमीशन 20टका की बजाय 1टका हो गया...या नेताओं के पेट भर गये..??
                        मैं  सीधे-सीधे कांग्रेसियों से एक ही सवाल पूछता हूँ कि अगर आप जनता के दुःख से इतने ही दुखी हो तो कुछ सालों के लिए अपने घर क्यों नहीं आराम करते...?? अपने परिवार के सदस्य को भावी प्रधानमंत्री पद या कांग्रेसाध्यक्ष बनाने की बजाय ये घोषणा क्यों नहीं करते की जो भी संसद में ज्यादा वोटों से जीतकर आएगा वो ही इन पदों के दावेदार होंगे..??
                       क्या कांग्रेस का मन , मनमोहन जी से भर गया????? क्या अब कोई दूसरा प्रधानमंत्री पद के योग्य व्यक्ति नहीं बचा कांग्रेस में....???
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Monday, January 21, 2013

" क्या आपको ...मीडिया-मनेजर चाहिए.".!! हायर कीजिये मात्र 20,000/-प्रति माह पर !!

 प्रिय  मित्रो,नमस्कार!! भारत में चुनाव नज़दीक आ रहे हैं । सोशल-मीडिया में लाखों लोगों तक अपनी बात और राजनितिक-सामाजिक गतिविधियों को " सलीके से चित्रों और विडिओ क्लिप " द्वारा रोज़ाना पंहुचाने हेतु " हेल्प-लाईन-बिग-बाज़ार ", सूरतगढ़ पर संपर्क करें !! ताकि आपकी सफलता सुनिश्चित हो सके । क्योंकि 21वीं सदी में इंटरनेट द्वारा सस्ता और असरदार प्रचार कम समय में ही किया जा सकता है !!
 हमारी टीम के सदस्य अपने आप आपकी गतिविधियों को " वाच " कर प्रभावशाली तरीके से आपको और आपकी बात को जनता और " हाई-कमांड " के नेताओं तक पंहुचायेंगे !! जिनमे संपादक,केमरा-मैनऔर साउंड-रिकार्डर शामिल रहेंगे !! अगर आपको ज़रुरत हो तो हमारे आदमी आपके लिए " इवेन्ट-मेनेजमेंट " और सर्वे  भी करवा देंगे !!
                                हम सोशल-मीडिया की कई वेबसाईटों,ब्लॉग,पेज,ग्रुप,गूगल+,फेसबुक                                    और ट्विटर से जुड़े हुए हैं !! टिकेट लेने के इच्छुक नेता अपने वीडियो-प्रोफाईल तैयार करवाने हेतु आज ही मिलें :- पीताम्बर दत्त शर्मा, मोबाईल नंबर-9414657511,सूरतगढ़ !! हमारा स्टाफ राजस्थान,हरियांना,पंजाब और दिल्ली में सक्रीय है !!
                           प्रिय मित्रो, सादर नमस्कार !! कृपया आप मेरा ये ब्लाग " 5th pillar corrouption killer " रोजाना पढ़ें , इसे अपने अपने मित्रों संग बाँटें , इसे ज्वाइन करें तथा इसपर अपने अनमोल कोमेन्ट भी लिख्खें !! ताकि हमें होसला मिलता रहे ! इसका लिंक है ये :- www.pitamberduttsharma.blogspot.com.

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आखिर अंबेडकर को पीएम के तौर पर देखने की बात कभी किसी ने क्यों नहीं की ? -साभार :- श्री मान पुण्य प्रसुन्न वाजपेयी जी !

नेहरु की जगह सरदार पटेल पीएम होते तो देश के हालात कुछ और होते । ये सवाल नेहरु या कांग्रेस से नाराज हर नेता या राजनीतिक दल हमेशा उठाते रहे ...